Yogdarshanam Paad 3 / Sutra 1

3/1
Sutra
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।। ३.१ ।।

Bhashya

1 Available
Inception

अव० उक्तानि पञ्च बहिरङ्गाणि साधनानि। धारणा वक्तव्या। 

अर्थ - पाँच बहिरंग साधन बता दिये गये। अब धारणा कही जानी चाहिए –

Word Meaning

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥१॥

शब्दार्थ - (देश-बन्ध:) देश विशेष में बाँधना (चित्तस्य) चित्त को (धारणा) धारणा है। 

सूत्रार्थ - चित्त को देशविशेष अर्थात् नाभि, हृदय, मस्तक, आदि में स्थिर करना 'धारणा' है। 

Vyas Bhashya

नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, मूर्ध्नि ज्योतिषि, नासिकाग्रे, जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा॥१॥

व्या० भा० अ० - नाभि चक्र में, हृदय कमल में, मस्तकगत प्रकाश में, नासिका के अग्र भाग में, जिह्वा के अग्रभाग आदि प्रदेशों में अथवा बाह्य विषय में चित्त का केवल वृत्ति से बाँधना 'धारणा' कही जाती है॥१॥

विशेष - योगदर्शन के इस विभूतिपाद में योग के अन्तरंग साधनों धारणा, ध्यान - तथा समाधि और योगाभ्यास के द्वारा योगी को जो विभूतियाँ प्राप्त होती हैं उनका वर्णन है। योगाभ्यास के करने से जो ज्ञान, बल, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति, मन, इन्द्रियों पर विजय प्राप्तिरूप ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं, उनको 'विभूति' कहते हैं।

Yog Prakash

इस सूत्र में 'धारणा' का लक्षण किया है। किसी देश विशेष में वृत्तिमात्र = ज्ञानमात्र से चित्त को बाँधना = रोकना = स्थिर करना 'धारणा' है। धारणा के दो स्थान हैं। एक आन्तरिक और दूसरा बाह्य। नाभि, हृदय, नासिका का अग्रभाग, मस्तक आदि आन्तरिक स्थान हैं। वृक्ष, पर्वतादि बाह्य स्थान हैं। जब योगाभ्यासी यम, नियम आदि का पालन करते-करते प्रत्याहार तक पहुँच जाता है तो मन उसके अधिकार में हो जाता है। मन के अधिकार में हो जाने से साधक अपनी इच्छानुसार जहाँ पर मन को स्थिर करना चाहता है। वहाँ पर स्थिर कर लेता है।

'धारणा' का प्रयोग दो प्रकार से होता है। एक ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करने के लिए और दूसरा किसी पदार्थ के स्वरूप को जानने के लिए। जब प्रात: काल और सायंकाल ईश्वर की उपासना की जाती है तब हृदय आदि प्रदेश में चित्त को स्थिर करके की जाती है। इस स्थिति में धारणा का स्थान शरीर का एक अङ्ग है। उसमें चित्त को स्थिर करके ईश्वर का ध्यान किया जाता है। इस स्थिति में ईश्वर उपास्य है और जीवात्मा उसका उपासक है। जब साधक अपने स्वरूप को जानने के लिये शरीर के हृदय आदि अङ्ग में धारणा करता और ध्यान करता है तो इस स्थिति में उपास्य - उपासक भाव नहीं है। जब साधक अपने शरीर के विषय में विशेष रूप से जानना चाहता है तब शरीर के ही हृदय आदि अङ्ग में धारणा करता और ध्यान के माध्यम से उसके स्वरूप को जान लेता है। ईश्वर की उपासना के लिए और किसी अन्य पदार्थ के स्वरूप को जानने के लिए धारणा का प्रयोग किया जाता है। योग की ऊँची अवस्था में सीधे ही ईश्वर, जीव आदि में तीनों कार्य अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि किये जा सकते हैं।

बाहर के देश में 'धारणा' का प्रयोग - कोई व्यक्ति किसी वृक्ष के स्वरूप को जानने के लिए अपने चित्त को वृक्ष के किसी भाग में स्थिर करके उसके स्वरूप को जानना चाहता है। यह बाह्य देश में धारणा का प्रयोग है। जो बाहर के देश में धारणा की जाती है वह ईश्वरोपासना के लिए नहीं है। यद्यपि ईश्वर सर्वव्यापक है फिर भी जीवात्मा शरीर से बाहर ईश्वर के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ सकता। इसलिए ईश्वर की उपासना अपने शरीर एवं आत्मा में होती है बाहर नहीं॥१॥

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