Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 7

2/7
Sutra
सुखानुशयी रागः ।। २.७ ।।

Bhashya

1 Available
Word Meaning

सुखानुशयी रागः॥७॥

शब्दार्थ - (सुख-अनुशयी) सुख भोगने के पश्चात् अन्तःकरण में सुख और सुख-साधनोंके प्रति रहने वाली इच्छा = तृष्णा = लोभ (रागः) राग नामक क्लेश है। 

सूत्रार्थ - सुख भोगने के पश्चात् अन्तःकरण में सुख और सुख साधनों के प्रति रहने वाली जो इच्छा = तृष्णा, लोभ है, वह 'राग' नामक क्लेश है।

Vyas Bhashya

सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति॥७॥

व्या० भा० अ० - सुख को जानने वाले का सुखस्मरणपूर्वक सुख वा सुख के साधन में  जो आकांक्षा = तृष्णा : =  लोभ है, वह 'राग' है॥७॥

Yog Prakash

इस सूत्र में 'राग' नामक क्लेश का स्वरूप वर्णित है। जब व्यक्ति सुख और सुख के साधनों का अनुभव करता है तब सुख और उसके साधनों के संस्कार चित्त में अङ्कित हो जाते हैं। कालान्तर में उन संस्कारों को उद्बुद्ध करने वाले साधनों के उपस्थित होने से वे उद्बुद्ध हो जाते हैं। उन संस्कारों से स्मृति उत्पन्न होती है। उस स्मृति से अनुभव किये सुख और सुख साधनों को प्राप्त करने की इच्छा हो जाती है। यह राग का स्वरूप है। अर्थात् सुख और सुख साधनों के अनुभव के पश्चात् पुनः सुख भोगने के लिए उनकी प्राप्ति की इच्छा राग है ।

कोई कोई सुख, उसके साधन स्मृतिकाल में स्मरण आ जाते हैं। कुछ राग ऐसे होते हैं कि जिनके सुख और सुख साधनों की साक्षात् स्मृति नहीं होती। किन्तु परोक्ष स्मृति होती है। जैसे एक गौ का बछड़ा प्रथम बार माँ के स्तनों का दूध पीने का प्रयत्न करता है। बछड़े का दूध के प्रति जो राग उत्पन्न हुआ, उसका कारण पूर्व जन्म में अनुभव किये सुख और सुख साधनों की साक्षात् स्मृति नहीं है। राग-द्वेष रूपी क्लेशों का परस्पर सम्बन्ध बना रहता है। जब सुख और उसके साधनों में कोई बाधक उपस्थित होता है, तब उस बाधक के प्रति द्वेष उत्पन्न होता है। यदि बाधक को दूर करने का प्रयास करने पर भी वह दूर नहीं होता तो व्यक्ति सन्तप्त होकर निराश हो जाता है।

जब तक अविद्या की सत्ता बनी रहती है तब तक राग-द्वेषादि क्लेशों की परम्परा चलती रहती है। भोगों में आसक्त व्यक्ति यह मानता है कि मैं सुख और उनके साधनों के द्वारा कृतकृत्य हो जाऊँगा। परन्तु उसकी इच्छा के विपरीत दुःख बढ़ता जाता है। भोगों के भोगने से राग रूपी क्लेश दूर नहीं होता। इसको दूर करने के लिये अविद्या को दूर करना पड़ता है। भोगों को त्यागने से राग की निवृत्ति और भोगने से प्रवृत्ति होती है। सांख्यकार ने कहा है कि 'न भोगाद् रागशान्तिर्मुनिवत्।। ४।२७॥मुनि की भाँति भोगों को भोगने से राग शान्त नहीं होता।' राग दूर करने का एक उपाय यह है कि जो सुख और उसके साधन हैं वे क्षणिक हैं, ऐसा जाने। राग को दूर करने का एक अन्य उपाय ईश्वर में विद्यमान नित्यानन्द को जानना भी है। जब साधक यह समझ लेता है कि ईश्वर में दु:खरहित नित्य आनन्द है उसी की प्राप्ति के लिये योगाभ्यास करना चाहिये तब राग की निवृत्ति होती है। इसलिये राग को हटाने के लिये ईश्वर के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिये॥७॥

All Sutras