इस सूत्र में प्रत्याहार का फल बतलाया है। प्रत्याहार की सिद्धि होने पर इन्द्रियाँ पूर्णरूपेण योगी के वश में आ जाती हैं। इन्द्रियों की वश्यता के विषय में लोगों की विविध मान्यतायें हैं। कुछ लोगों की यह मान्यता है कि इन्द्रियों के शब्दादि विषयों में आसक्त न होना ही उनकी 'वश्यता' है। क्योंकि इन्द्रियों के भोग व्यक्ति को श्रेयमार्ग से दूर कर देते हैं। एक सीमा में रहकर विषयभोग करना हानिकारक नहीं है, कुछ लोगों का यह मत है कि अपनी इच्छा से शब्दादि विषयों का भोग करना 'इन्द्रियजय' है। कुछ लोगों का यह मत है कि राग-द्वेष के न रहने पर सुख - दुःख रहित शब्दादि विषयों का ज्ञान करना 'इन्द्रियजय' है। 'जैगीषव्य' का मत यह है कि चित्त की एकाग्रता के कारण इन्द्रियों के विषयभोग का अभाव ही ‘इन्द्रियजय' है। उससे इन्द्रियों की उत्कृष्ट वश्यता होती है। क्योंकि चित्त का निरोध होने पर इन्द्रियाँ निरुद्ध हो जाती हैं। उससे एक-एक इन्द्रिय को वश में करने के लिये जो भिन्न-भिन्न प्रयत्न किये जाते हैं, उनकी अपेक्षा नहीं रहती। कुछ योगाभ्यासी श्रोत्रेन्द्रिय को वश में करने के लिये पृथक् से अभ्यास करते हैं और रसना इन्द्रिय को जीतने के लिये पृथक् रूप से प्रयत्न करते हैं। चित्त को जीत लेने के पश्चात् सभी इन्द्रियाँ वश में आ जाती हैं। उनको वश में करने के लिये भिन्न-भिन्न उपाय करने की आवश्यकता नहीं रहती। इससे यह नहीं समझना चाहिये कि इन्द्रियों को वश में करने के लिये प्रयत्न नहीं करना चाहिये और चित्त को वश में करने से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। जिस प्रकार चित्त को वश में करने का प्रयास करना आवश्यक है, उसी प्रकार इन्द्रियों को वश में करने का प्रयास करना भी आवश्यक है।
प्रत्येक योगाभ्यासी को सतत यह ध्यान रखना चाहिये कि मेरी कौन सी इन्द्रिय किस विषय में सम्बद्ध होकर किस शुभ-अशुभ विषय का ग्रहण कर रही है। अथवा किस इन्द्रिय के द्वारा मैं किस शुभाशुभ विषय को ग्रहण कर रहा हूँ। यदि मैं किसी इन्द्रिय के द्वारा अशुभ विषय का ग्रहण कर रहा हूँ तो मुझे शीघ्र ही अशुभ विषय से अपनी इन्द्रिय को हटा देना चाहिये। भोजन करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि मैं शरीर की रक्षा के लिये भोजन कर रहा हूँ वा रसना इन्द्रिय की तृप्ति के लिये। इसी प्रकार से नेत्रेन्द्रिय से देखते हुए यह जानना चाहिये कि क्या मैं किसी उत्तम कार्य की सिद्धि के लिये रूप देख रहा हूँ वा नेत्रेन्द्रिय की तृष्णा शान्त करने के लिये देख रहा हूँ। इस प्रकार से साधक को इन्द्रियों पर सदा नियन्त्रण रखना चाहिये। मनु महाराज ने धर्म के दश लक्षणों में एक इन्द्रिय निग्रह को माना है और जितेन्द्रिय व्यक्ति का स्वरूप भी बतलाया है कि जो खाकर, स्पर्श करके, देखकर, सूँघकर, सुनकर न हर्ष अनुभव करता है और न शोक अनुभव करता है, वह व्यक्ति जितेन्द्रिय है। इस प्रकार चित्त को और इन्द्रियों को वश में करने का सदा प्रयत्न करना चाहिये। इससे इन्द्रियों की उत्कृष्ट वश्यता प्राप्त होती है॥५५॥