इस सूत्र में 'बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी' नामक चौथे प्राणायाम का कथन है। देश, काल, संख्या के द्वारा परीक्षित बाह्य प्रदेश में होने वाला प्राणायाम इस प्राणायाम के द्वारा उल्लंघित होता है अर्थात् इस प्राणायाम के द्वारा अतिक्रान्त होता है। जब बाह्य वायु, बाहर देश से अन्दर की ओर गति करने लगती है तो यह प्राणायाम उसकी गति को रोक देता है। उसी प्रकार से आभ्यन्तर परीक्षित प्राणायाम में वायु जब भीतर से बाहर की ओर गति करती है तो यह उसकी गति को रोक देता है। इस प्रकार से दोनों प्राणायाम दीर्घ और सूक्ष्म होते हैं। बाह्याभ्यन्तर दोनों प्राणायामों को क्रम से परिपक्व बना लेने पर इस प्राणायाम के द्वारा दोनों की गति का अभाव हो जाता है। यह चौथा प्राणायाम है। जब बाह्य वायु अन्दर की ओर आती है तो उसको रोक देता है। जब आभ्यन्तर वायु बाहर की ओर आती है तो उसे भी यह रोक देता है। इसलिये इसका नाम 'बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी' है।
तीसरा प्राणायाम बाह्याभ्यन्तर दोनों देश वाले प्राणायामों के देशादि के द्वारा बिना परीक्षा किये ही गतिरोध रूप एक ही बार में किया जाने वाला देश, काल और संख्या से परीक्षित दीर्घ सूक्ष्म होता है। इस प्राणायाम में वायु को न बाहर निकाला जाता है और न भीतर भरा जाता है। तत्काल जहाँ का तहाँ रोक दिया जाता है। इससे प्राण की गति अवरुद्ध हो जाती है। कुछ काल के पश्चात् साधक को घबराहट होती है तो वह प्राण को छोड़ देता है। इससे प्राण बाहर वा भीतर जाने आने लगता है। पुनः साधक उसको रोक देता है। इस प्रकार प्राण की स्वाभाविक गति को रोकना और छोड़ देना स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है। इस प्रकार से अभ्यास में लाया हुआ यह प्राणायाम लम्बा और हल्का होता है। जो चौथा प्राणायाम - श्वास-प्रश्वास विषय अवधारण से बाह्याभ्यन्तर प्राणायामों के देश, काल, संख्या के निश्चय करने के पश्चात्, क्रम से प्राणायाम की भूमियों को जीत लेने के पश्चात्, दोनों प्राणायामों को उल्लंघित करते हुए जो गति अवरोध है, वह बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी प्राणायाम है। यही इसमें विशेषता है।
प्राणायाम के विषय में प्रथम पाद के ३४ वें सूत्र के प्रसंग और इस पाद के ४९ वें सूत्र के प्रसंग में लिखा गया है। कुछ यहाँ पर भी लिखा जाता है। यम-नियमों का पालन करते हुए आसन की सिद्धि हो जाने पर प्राणायाम करना चाहिये। आसन की सिद्धि का यह तात्पर्य नहीं है कि ४ घण्टे तक बैठने की सिद्धि होना। १५ या २० मिनिट आसन की सिद्धि होने पर भी प्राणायाम कर सकते हैं।
स्तम्भवृत्ति प्राणायाम की विधि - अच्छे प्रकार से आसन पर बैठकर श्वास-प्रश्वास जहाँ भी चल रहा हो उसको जहाँ का तहाँ रोक देना चाहिये। इस प्राणायाम में न प्राण को बाहर निकाला जाता है और न भीतर लिया जाता है। जब कुछ घबराहट हो तो उसे छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार यह एक प्राणायाम पूरा हो गया।
बाह्याभ्यान्तर विषयाक्षेपी प्राणायाम की विधि - अच्छे प्रकार से आसन पर बैठकर प्राण को बाहर निकाल देना चाहिये। यथाशक्ति बाहर रोक देना चाहिये। जब प्राण ग्रहण करने की इच्छा हो तो उसको अन्दर न लेवें किन्तु अन्दर के प्राण को बाहर निकाल देवें। इसी प्रकार से पुनः ग्रहण करने की इच्छा हो तो बाहर से प्राण को न लेवें। अन्दर के शेष प्राण को बाहर निकाल देवें। इस प्रकार से एक बार, दो बार यथाशक्ति करें। इसके पश्चात् शनैः-शनैः प्राण को अन्दर ले लेवें। जब प्राण को छोड़ने की इच्छा हो तब उस प्राण को बाहर न जाने देवें। किन्तु बाहर से और प्राण को अन्दर ले लेवें। जब प्राण को पुनः छोड़ने की इच्छा हो तो उसको बाहर न जाने देवें किन्तु बाहर से और प्राण को भीतर लेवें। इस प्रकार से एक बार, दो बार यथाशक्ति करें। जब घबराहट हो तब धीरे-धीरे प्राण को बाहर छोड़ देवें। यह 'बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी' एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार से दूसरी बार, तीसरी बार करना चाहिये। उपासना काल में निर्धारित रूप से किये जाने वाले प्राणायामों के पूर्ण होने पर श्वास-प्रश्वास की गति को स्वाभाविक रूप में स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए। यदि योगाभ्यासी के ध्यान में बाधा उपस्थित न हो तो नासिका के माध्यम से लम्बे श्वास-प्रश्वास ले सकता है। इससे शरीर की शुद्धि होती है, प्राणायाम करने का सामर्थ्य बढ़ता है और मन की तरंगों (वृत्तियों) को रोकने में सहायता मिलती है।। ५१।।