अनित्ये कार्ये नित्यख्यातिः तद्यथा - ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः, दिवौकस इति। तथाऽशुचौ परमबीभत्से काये शुचिख्यातिः, उक्तं च – अमृता स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निः स्यन्दान्निधनादपि।
कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता शुचिं विदुः॥
इत्यशुचौ शुचिख्यातिर्दृश्यते। नवेव शशाङ्कलेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयन्तीवेति कस्य केनाभिसंबन्धो, भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्यय इति। एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययस्तथैवानर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः।
तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति - परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः (२।१५ ) इति। तत्र सुखख्यातिरविद्या।
तथानात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे, पुरुषोकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति। तथैतदत्रोक्तम् - व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्व - मात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य संपदमनुनन्दत्यात्मसंपदं मन्वानस्तस्य व्यापदमनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्वानः, स सर्वोऽप्रतिबुद्ध इति।
एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसंतानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति। तस्याश्चामित्रागोष्पद्वद्वस्तुसतत्त्वं विज्ञेयम्। यथा नामित्रो मित्राभावो न मित्रमात्रं किं तु तद्विरुद्धः सपत्नः। तथाऽगोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं किंतु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम्। एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः किं तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति॥५॥
व्या० भा० अ० - अनित्य पदार्थों में नित्य पदार्थ का ज्ञान (अविद्या है)। जैसे कि पृथिवी नित्य, चन्द्र तारों सहित द्युलोक नित्य, देवगण नित्य हैं, ऐसा। उसी प्रकार अशुद्ध अतिघृणित शरीर में शुद्धज्ञान। और कहा है - स्थान (उदर स्थान) के कारण, उपादान (रजवीर्य) के कारण, उपष्टम्भ (रसरक्तादि) का आश्रय होने के कारण, निःस्यन्द ( मलमूत्र स्वेदादि) के कारण और निधन (मृत्यु) के कारण व शुद्धि की अपेक्षा रखने के कारण विद्वान् शरीर को अशुद्ध मानते हैं। इस प्रकार अशुद्ध शरीर में शुद्ध ज्ञान देखा जाता हैं।
चन्द्रमा की नवीन कला के समान मनोरम यह कन्या मधु और अमृत के अवयवों से बनी हुई के समान, चन्द्रमा को फोड़कर निकली हुई सी प्रतीत होती है। नीलकमल की पंखुडियों के समान विशाल नेत्रवाली शृंगाररसविलास से युक्त दृष्टियों के द्वारा मानों प्राणिजगत् को तृप्त कर रही हो। इस प्रकार किस (अपवित्र शरीर) का किस (मधु अमृत चन्द्र) के साथ सम्बन्ध है ? इस प्रकार अशुद्ध शरीर में शुद्धि का विरुद्ध ज्ञान होता है। इसी प्रकार इसके द्वारा अपुण्य में पुण्य का ज्ञान और अनर्थ में अर्थ का ज्ञान व्याख्यात हुआ।वैसे ही दुःख में सुख का ज्ञान 'परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ' (२/१५) के द्वारा कहेगा। उसमें सुख ज्ञान 'अविद्या' है।
इसी प्रकार अनात्मा में आत्मख्याति अर्थात् बाह्योपकरण चेतन (बन्धु, बान्धव, पशु आदि) अचेतन (भूमि, धन, सम्पत्ति आदि) भोग के आधार शरीर को, पुरुष के उपकरण मन को, जो कि आत्मा नहीं हैं उनको आत्मा जानना 'अविद्या' है। इसी प्रकार इस विषय में कहा गया है कि पुत्र, मित्र, पशु आदि व्यक्त, धन सम्पत्ति भूमि आदि अव्यक्त पदार्थों को अपना स्वरूप मानकर उनकी सम्पन्नता पर अपनी सम्पन्नता जानता हुआ प्रसन्न होता है। उनकी विपन्नता में अपनी विपन्नता मानता हुआ शोक करता है, ऐसा मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति अज्ञानी है।
इस क्लेश सन्तान और फल सहित कर्माशय की चार भागों में रहने वाली यह अविद्या मूल है। अमित्र, अगोष्पद के समान इस अविद्या की सत्ता जाननी चाहिए। 'अमित्र' का अर्थ न मित्र मात्र है, न मित्र का अभाव है किन्तु उन से विरुद्ध शत्रु है। इसी प्रकार 'अगोष्पद' का अर्थ न गोष्पद का अभाव है, न गोष्पदमात्र है अपितु उन दोनों से भिन्न देश ही है। 'अविद्या' भी इसी प्रकार न प्रमाण है, न प्रमाणाभाव है किन्तु विद्याविरुद्ध ज्ञानान्तर है॥५॥