Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 48

2/48
Sutra
ततो द्वन्द्वानभिघातः ।। २.४८ ।।

Bhashya

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Word Meaning

ततो द्वन्द्वानभिघातः॥४८॥

शब्दार्थ - (ततः) आसन की सिद्धि हो जाने से ( द्वन्द्व-अनभिघातः) शीतोष्ण, भूखप्यास आदि द्वन्द्व न्यून सताते हैं (और ध्यान में सुविधा होती है)। सूत्रार्थ - आसन की सिद्धि हो जाने से शीतोष्ण, भूख-प्यास आदि द्वन्द्व न्यून सताते हैं और ध्यान लगाने में सुविधा होती है।

Vyas Bhashya

व्या० भा० शीतोष्णादिभिर्द्वन्द्वैरासनजयान्नाभिभूयते॥४८॥

व्या० भा० अ० - आसन सिद्ध होने पर (साधक) शीतोष्णादि द्वन्द्वों के द्वारा अभिभूत (बाधित) नहीं होता॥४८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में आसन सिद्धि का फल बतलाया है। आसन की सिद्धि हो जाने पर सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि बाधा नहीं डालते हैं। सर्दीगर्मी, भूख-प्यास को सहन करने की एक सीमा है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि योगाभ्यासी के शरीर को बर्फ से ढकने पर उसको शीत कोई दुःख नहीं देगी और जलती अग्नि के मध्य में बैठने पर उसको अग्नि दुःख नहीं देगी। अतिशीत में और अति उष्णता में तो योगी की मृत्यु ही हो जायेगी। इसलिये ऐसा मानना असंगत है। प्रत्येक व्यक्ति की जितनी सहन शक्ति है वह उतना ही सहन कर सकता है। भूख और प्यास के विषय में भी यह नहीं समझना चाहिये कि योगी बिना कुछ खाये पिये पूर्ण जीवन व्यतीत कर देता है। किन्तु इन द्वन्द्वों को एक सीमा तक ही सहन करने की शक्ति आ जाती है।

आसनों के और भी अनेक लाभ हैं आसन के सिद्ध हो जाने से प्राणायाम की सिद्धि होती है। बिना आसन सिद्धि के प्राणायाम की सिद्धि कठिन है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि के लिये आसन का सिद्ध होना आवश्यक है। आसीनः सम्भवात्॥वेदान्त दर्शन ४ / १/५॥सूक्ष्म विषयों को जानने के लिये और मन को वश में करने के लिये शरीर को स्थिर करना आवश्यक है।नवीन साधक इधर-उधर चलते हुए मन को एकाग्र नहीं कर सकता। बिना स्थिर आसन के नया योगाभ्यासी पाँच चित्त वृत्तियों को नहीं रोक सकता। परिपक्व समाधि वाले योगी तो चलते हुये भी चित्तवृत्तियों को रोक लेते हैं। जब व्यक्ति योग के विरुद्ध विचारों को रोकना चाहता है तो उसको आसन की आवश्यकता रहती है। क्योंकि योग के विरोधी सूक्ष्म विचार स्थिर शरीर और स्थिर बुद्धि के बिना नहीं रोके जा सकते। इसलिये योग सिद्धि के लिये आसन को सिद्ध करना आवश्यक है॥४८॥

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