इस सूत्र में ईश्वर प्रणिधान का फल बतलाया है। समस्त क्रियाओं को ईश्वरार्पित करना, उनका लौकिक फल न चाहना, उसकी विशेष भक्ति करना आदि, ईश्वर प्रणिधान है। ईश्वर की विशेष भक्ति का अभिप्राय विशेष प्रेम प्रीति है = संसार के समस्त पदार्थों से अधिक ईश्वर से प्रेम करना। ईश्वर प्रणिधान करने से साधक को आनन्द, ज्ञान, बल आदि की प्राप्ति और उसके अज्ञान, दुःख आदि विघ्नों का नाश होता है। व्यासभाष्य में लिखा है कि योगी देशान्तर, देहान्तर और कालान्तर में अभीष्ट पदार्थों को जान लेता है। इसका तात्पर्य यह है कि तीन पदार्थ अनादि हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। इन तीनों पदार्थों का जानना आवश्यक है। इनके विशुद्ध ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। देशान्तर, देहान्तर और कालान्तर में ये तीन ही पदार्थ होते हैं। इन तीन का जानना योगी के लिये अभीष्ट है। ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से इनको अच्छे प्रकार से जान लेता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि देशान्तर, देहान्तर और कालान्तर में जो कुछ भी पदार्थ मात्र है योगी उस पदार्थ मात्र को यथावत् जान लेता है अर्थात् ईश्वरवत् सर्वज्ञ हो जाता है।
यहाँ पर एक शंका हो सकती है कि जब ईश्वर प्रणिधान से ही समाधि की सिद्धि हो जाती है तो अन्य योगाङ्गों का अनुष्ठान क्यों किया जाता है ? इसका समाधान यह है कि योग के अन्य अङ्ग ईश्वरप्रणिधान के सहायक हैं। उनके अनुष्ठान के बिना ईश्वर प्रणिधान नहीं हो सकता। ईश्वर प्रणिधान के बिना अन्य योगाङ्गों का भी पालन नहीं हो सकता। इसलिये परस्पर के सहयोग से अन्योन्य की सिद्धि होती है। इतना अन्तर है कि ईश्वरप्रणिधान समाधि प्राप्ति का विशेष साधन है।
इस प्रसंग में एक प्रश्न उठता है कि ईश्वर अपने उपासकों को ही विशेष सहायता क्यों देता है ? इसका उत्तर यह है कि ईश्वर न्यायकारी है। जिसके ज्ञान, कर्म और उपासना का जितना फल उचित है, उसको उतना विशेष फल देता है, उससे विरुद्ध नहीं॥४५॥