इस सूत्र में तप का फल बतलाया है। तप के विषय में पहले लिखा गया है कि धर्माचरण करने में जो बाधायें आती हैं, उनको सहना तप है। जब योगाभ्यासी शरीर, वाणी और मन से उचित रूप से तप का अनुष्ठान करता है तब शरीर स्वस्थ और बलवान् हो जाता है। इन्द्रियों में दूर से सुनने, देखने आदि का सामर्थ्य उत्पन्न हो जाता है। तप से शरीर में वह शक्ति उत्पन्न हो जाती है जिससे योगाभ्यासी दीर्घकाल पर्यन्त आसन पर बैठकर प्राणायाम और ईश्वर का ध्यान कर सकता है। जिस साधक का शरीर तपा हुआ नहीं है, वह इन कार्यों का सम्पादन नहीं कर सकता। दीर्घकाल तक आसन पर सुखपूर्वक बैठने से चित्त की एकाग्रता होती है।
इन्द्रियों की शुद्धि होने से साधक उनको अधर्माचरण से हटाकर धर्माचरण में चलाने में सफल हो जाता है। जिस साधक ने इन्द्रियों को रोकने का अभ्यास नहीं किया है वह उनको अधर्माचरण से रोक कर धर्माचरण में नहीं चला सकता। मन को राग, द्वेष आदि विषयों से हटाकर योगाभ्यास में लगाना और मानापमान को सहन करना मानसिक तप है। इस तप के कारण योगी मानसिक क्षोभ से दूर हो जाता है। इसी के द्वारा वह जन्मजन्मान्तरों की वासनाओं को तनु बनाकर उनको दग्धबीजभाव की अवस्था में ले जा सकता है अन्यथा नहीं। इस तप के अभ्यास से वह मानापमान से विचलित होकर योगमार्ग को नहीं छोड़ता। मनु महाराज ने कहा है।
सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा॥ मनु० २ / १६२॥
वही ब्राह्मण समग्र वेद और परमेश्वर को जानता है, जो प्रतिष्ठा से विष के तुल्य सदा डरता है; और अपमान की इच्छा अमृत के समान किया करता है। -सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास -
योगाभ्यासी सम्मान से विष के तुल्य डरता रहे और अपमान की इच्छा अमृत के तुल्य करता रहे। सत्य बोलना और मोक्ष शास्त्रों को पढ़ना - पढ़ाना वाणी का तप है। इससे मोक्ष का स्वरूप ज्ञात होता है। और अनेक संशयों की निवृत्ति होती है। भूखप्यास, सर्दीगर्मी आदि प्रतिकूलताओं को सहन करना शारीरिक तप है। वेद में यह उपदेश दिया गया है कि तपस्वी व्यक्ति ही ईश्वर साक्षात्कार कर सकता है, अन्य नहीं -
पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः।
अतप्ततनूर्न तदामो अश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समाशत॥१॥
तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे..........॥२॥ ॥ऋ० मं० ९। सू० ८३। म० १, २॥
भावार्थ - हे ब्रह्माण्ड और वेदों के पालन करने वाले प्रभु सर्वसामर्थ्ययुक्त सर्वशक्तिमान् ! आपने अपनी व्याप्ति से संसार के सब अवयवों को व्याप्त कर रखा है। उस आपका जो व्यापक पवित्र स्वरूप है उसको ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण, शम, दम, योगाभ्यास, जितेन्द्रिय, सत्संगादि तपश्चर्या से रहित जो अपरिपक्व आत्मा अन्तःकरणयुक्त है, वह उस तेरे स्वरूप को प्राप्त नहीं होता और जो पूर्वोक्त तप से शुद्ध हैं, वे ही इस तप का आचरण करते हुए उस तेरे शुद्ध स्वरूप को अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं॥१॥
जो प्रकाशस्वरूप परमेश्वर की सृष्टि में विस्तृत पवित्र आचरण स्वरूप तप करते हैं, वे ही परमात्मा को प्राप्त होने में योग्य होते हैं॥२॥
इसलिये शरीर, इन्द्रियों और मन से सदा श्रद्धापूर्वक तप का अनुष्ठान करना चाहिए॥४३॥