इस सूत्र में शुद्धि का शेष फल बतलाया है। शरीर की शुद्धि और आन्तरिक ( राग-द्वेष की) शुद्धि से बुद्धि की शुद्धि होती है। शरीर के अशुद्ध अथवा रोगी रहने से व्यक्ति की बुद्धि अशुद्ध और अल्प हो जाती है। क्योंकि शरीर का प्रभाव बुद्धि, मन, इन्द्रियों पर पड़ता है। जब व्यक्ति अतिरुग्ण हो जाता है अथवा मद्य आदि पदार्थों का सेवन कर लेता है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और मन, इन्द्रियाँ भी शुद्ध रूप में कार्य करना छोड़ देती हैं। शरीर के स्वस्थ, मलरहित होने पर और उत्तम पदार्थों के सेवन से बुद्धि तीव्र हो जाती है। सात्त्विक भोजन खाने से वह शुद्ध होती है और तामसिक भोजन खाने से अशुद्ध। राग, द्वेष, छल, कपट करने से बुद्धि अशुद्ध होती है और रागद्वेष आदि दोषों को छोड़ने से शुद्ध। शुद्धि का यह भी फल है कि उससे मन प्रसन्न हो जाता है और मन की एकाग्रता की सिद्धि होती है। इन्द्रियों पर विजय और आत्मसाक्षात्कार की योग्यता सिद्ध होती है। बाह्य और आन्तरिक शुद्ध अपनी और अन्यों की उन्नति का कारण है। इसलिये सभी मनुष्यों को बाह्य और आन्तरिक शुद्धि करके अपना और अन्यों का कल्याण करना चाहिये। वेद में भी पवित्र होने की प्रार्थना की गई है कि -
पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः।
पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मा॥यजु० १९/३९॥
भावार्थ - हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए जनों में ज्ञानी विद्वन्। जिस प्रकार (देवजनाः) विद्वान् जन (मनसा) विज्ञान और प्रीति से (मा) मुझ को (पुनन्तु) पवित्र करें और हमारी (धियः) बुद्धियों को (पुनन्तु) पवित्र करें और (विश्वा) सम्पूर्ण (भूतानि) भूत प्राणिमात्र मुझको (पुनन्तु) पवित्र करें वैसे आप (मा) मुझको (पुनीहि) पवित्र कीजिए॥४१॥