Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 4

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Sutra
अविद्या क्षेत्रं उत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणां ।। २.४ ।।

Bhashya

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Word Meaning

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥४॥

शब्दार्थ - (अविद्या) मिथ्याज्ञान (क्षेत्रम्) उत्पत्ति भूमि = कारण है (उत्तरेषाम् ) पूर्वसूत्र में पढ़े 'अविद्या' शब्द से आगे अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेशों का (प्रसुप्त-तनु-विच्छिन्नउदाराणाम्) प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार अवस्था वालों का। 

सूत्रार्थ - पूर्वसूत्र में अविद्या शब्द से आगे पढ़े गये अस्मिता आदि का जो प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार अवस्था वाले हैं। उन सबका कारण 'अविद्या' है।

Vyas Bhashya

अत्राविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिरुत्तरेषामस्मितादीनां चतुर्विधविकल्पानां, प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्। तत्र का प्रसुप्तिः ? चेतसि शक्तिमात्रप्रतिष्ठानां बीजभावोपगमः, तस्य प्रबोध आलम्बने संमुखीभावः। प्रसंख्यानवतो दग्धक्लेशबीजस्य संमुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति, दग्धबीजस्य कुतः प्ररोह इति, अतः क्षीणक्लेशः कुशलश्चरमदेह इत्युच्यते। तत्रैव सा दग्धबीजभावा पञ्चमी क्लेशावस्था नान्यत्रेति। सतां क्लेशानां तदा बीजसामर्थ्यं दग्धमिति विषयस्य संमुखीभावेऽपि सति न भवेत्येषां प्रबोध इति उक्ता प्रसुप्तिः, दग्धबीजानामप्ररोहश्च। तनुत्वमुच्यते-प्रतिपक्षभावनोपहताः क्लेशास्तनवो भवन्ति। तथा विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः। कथम् ? रागकाले क्रोधस्यादर्शनात्, न हि रागकाले क्रोधः समुदाचरति। रागश्च क्वचिद्दृश्यमानो न विषयान्तरे नास्ति। नैकस्यां स्त्रियां चैत्रो रक्त इत्यन्यासु स्त्रीषु विरक्तः, किं तु तत्र रागो लब्धवृत्तिरन्यत्र तु भविष्यद्वृत्तिरिति। स हि तदा प्रसुप्तनुविच्छिन्नो भवति। विषये यो लब्धवृत्तिः स उदारः।

सर्व एवैते क्लेशविषयत्वं नातिक्रामान्ति। कस्तर्हि विच्छिन्नः प्रसुप्तस्तनुरुदारो वा क्लेश इति। उच्यते-सत्यमेवैतत्। किं तु विशिष्टानामेवैतेषां विच्छिन्नादित्वम्। यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्वव्यञ्जकाञ्जनेनाभिव्यक्त इति। सर्व एवामी क्लेशा अविद्याभेदाः। कस्मात् ? सर्वेष्वविद्यैवाभिप्लवते। यदविद्यया वस्त्वाकार्यते तदेवानुशेरते क्लेशा विपर्यासप्रत्ययकाल उपलभ्यन्ते, श्रीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति॥४॥

व्या० भा० अ० -  यहाँ 'अविद्या' प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार अवस्थावाले चार प्रकार के अगले अस्मितादि क्लेशों का क्षेत्र = प्रसवभूमि है। उनमें से प्रसुप्ति क्या है ? चित्त में केवल शक्तिरूप से स्थित क्लेशों का बीजभाव को प्राप्त हो जाना (प्रसुप्ति है)। आलम्बन के उपस्थित होने पर उसका प्रवृत्त होना = जाग जाना प्रबोध है। विवेकख्यातियुक्त दग्धक्लेशबीज वाले योगी के समक्ष व्यञ्जक विषय (आलम्बन) के होने पर भी क्लेश नहीं जागता, दग्धबीज (क्लेश) का अङ्कुर = उगना कैसे होगा ? इसलिए क्षीण क्लेश (योगी) कुशल, चरमदेह कहा जाता है। वह दग्धबीजभाव नामक पाँचवीं क्लेशावस्था विवेकख्यातियुक्त योगी की ही होती है अन्य की नहीं। तब क्लेशों के उगने का सामर्थ्य दग्ध हो जाता है। अतः विषय के सम्मुख होने पर भी इन (क्लेशों) की उत्पत्ति नहीं होती। इस प्रकार (इनकी ) प्रसुप्तता एवं दग्धबीजों का न उगना कह दिया।

तनुत्व कहा जाता है - प्रतिपक्ष भावना से प्रताड़ित क्लेश निर्बल होते हैं। उसी प्रकार रुकरुक कर उस-उस रूप से पुन: प्रकट होते हैं इसलिए विच्छिन्न कहे जाते हैं। कैसे ? रागकाल में क्रोध के न दीखने से। राग के समय क्रोध प्रवृत्त नहीं होता। कहीं दीखने वाला राग विषयान्तर में नहीं है, ऐसा नहीं होता। चैत्र (नामक कोई पुरुष) एक स्त्री में रक्त (आसक्त) अन्य स्त्रियों में विरक्त है, ऐसा नहीं है अपितु उसमें राग वर्तमान है, अन्यों में भविष्य में होने वाला है। वही (राग) तब प्रसुप्त, तनु वा विच्छिन्न होता है। विषय के प्रति जो प्रकट रहता है, वह उदार है।

ये सारे ही क्लेशविषयता को नहीं छोड़ते तो विच्छिन्न, प्रसुप्त, तनु अथवा उदार क्लेश कौन हैं ? यह सत्य ही है। किन्तु अवस्था विशेष के कारण ही इनका विच्छिन्न आदि (नाम) है। जिस प्रकार प्रतिपक्ष भावना (विरोधी कारण) से निवृत्त होता है उसी प्रकार अपने अभिव्यञ्जक (कारण) से प्रकट होता है। ये सब क्लेश अविद्या के भेद हैं। क्यों ? सब में अविद्या व्याप्त है। अविद्या से जो वस्तु (विषयरूप से) उपस्थित की जाती है, क्लेश उसी का अनुगमन करते है। मिथ्याज्ञान के समय उपलब्ध होते हैं। अविद्या के क्षीण होने पर नष्ट होते हैं॥४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश इन क्लेशों की जननी अविद्या बतलाई है। अविद्या के होने पर ये क्लेश अस्तित्व में आते हैं उसके न होने पर नहीं। इन क्लेशों की पाँच अवस्थाएँ हैं, प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न उदार और दग्धबीजभाव।

प्रसुप्त -  क्लेशों का सुप्तावस्था में रहना प्रसुप्त अवस्था कहलाती है। जैसे विविध प्रकार के बीज भूमि में विद्यमान रहते हैं परन्तु जब उनके अनुकूल जल, वायु आदि होते हैं तब वे अङ्कुरित होते हैं। इसी प्रकार से व्यक्ति के मन में जन्मजन्मान्तर की वासनायें विद्यमान रहती हैं। जब वासनाओं के अनुकूल उनके उद्बोधक कारण उपस्थित होते हैं तब वे उबुद्ध हो जाती हैं। बाल्य अवस्था में काम आदि की वासनाएँ विद्यमान रहती हैं किन्तु उस समय उनके जगाने वाले शारीरिक सामर्थ्य आदि कारण नहीं होते अतः वे प्रसुप्त रहती हैं। प्रसुप्त वासनाओं का प्रायः व्यक्ति को पता नहीं चलता। जब उनके अनुकूल वातावरण होता है तब व्यक्ति जान जाता है कि मेरे मन में इस प्रकार की वासनायें हैं। ये वासनायें पूर्व जन्म की भी होती हैं और इस जन्म की भी होती हैं। इसलिये योगाभ्यासी को सावधान रहना चाहिए कि मुझ में आन्तरिक रूप से प्रसुप्त वासनायें हैं, ये चाहे जब जाग सकती हैं।

तनु - जब क्लेश सूक्ष्म रूप में रहते हैं तब तनु कहलाते हैं। क्रियायोग के द्वारा क्लेश निर्बल हो जाते हैं वे साधक के मन में विषय भोगों की ओर विशेष उत्तेजना उत्पन्न नहीं करते। इस स्थिति को तनु कहते हैं। परन्तु जब उनके अनुकूल पदार्थ बार-बार समक्ष आते हैं और साधक ध्यान नहीं देता तो पुनः वे उदार बन जाते हैं अर्थात् जाग जाते हैं। इसलिये उन तनु रूप में स्थित क्लेशों को दग्धबीजभाव की अवस्था में ले जाने के लिये प्रयास करते रहना चाहिये। क्लेशों की प्रसुप्त और तनु अवस्था में भेद यह है कि - प्रसुप्त क्लेश सोया हुआ होता है, जबकि तनु क्लेश कुछ जागा हुआ होता है। 

विच्छिन्न - जब वे प्रबल रूप में रहते हैं परन्तु उनके विरोधी क्लेश की तीव्रावस्था के कारण वे अभिभूत हो जाते हैं तब वे विच्छिन्न कहे जाते हैं। किसी एक विषय में राग की प्रवृत्ति होती है तो उससे भिन्न विषय का राग रुक जाता है। उस प्रवृत्त राग के शान्त होने पर यह रुका हुआ राग सक्रिय हो जाता है। एक राग दूसरे राग के प्रवृत्त होने पर दब जाता है और द्वेष के तीव्र होने पर भी दब जाता है। इसी प्रकार से एक विषय में द्वेष उभरता है तो अन्य विषय का द्वेष रुक जाता है। राग के तीव्र रूप से उभरने पर द्वेष रुक जाता है और उसके रुक जाने पर द्वेष उभर जाता है। इस प्रकार से एक वस्तु के प्रति राग के कारण दूसरी वस्तु के प्रति राग का न उत्पन्न होना अथवा द्वेष के तीव्र होने पर राग का रुक जाना तथा द्वेष के उदार होने पर दूसरे द्वेष का दब जाना एवं राग के उत्तेजित होने पर द्वेष का न उभरना क्लेशों की विच्छिन्न अवस्था है। जो साधक यह जानते हैं कि मेरे मन में विच्छिन्न क्लेश विद्यमान हैं वे विशेष ध्यान रखते हैं कि कभी विच्छिन्न क्लेश आक्रमण न कर देवें।

उदार - जब क्लेश तीव्र रूप से प्रवृत्त होता है तब उसको उदार कहा जाता है। जब व्यक्ति के मन में अत्यन्त तीव्र क्रोध उभरता है तो वह कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को नहीं जान सकता। यह क्लेश की उदार अवस्था है। इसी प्रकार से अस्मिता, राग, अभिनिवेश क्लेशों के विषय में भी जान लेना चाहिये।

दग्धबीजभाव - यह क्लेशों की पाँचवी अवस्था है। जैसे एक गेहूँ के बीज को अग्नि में भून देने के पश्चात् वह अनुकूल भूमि, जल, वायु को प्राप्त करके भी अङ्कुरित नहीं होता। वैसे ही योगाभ्यास के द्वारा योगी अविद्या आदि क्लेशों को शक्तिहीन बना देता है। इस अवस्था में वे क्लेश अपने अनुकूल विषय के समक्ष होने पर भी क्रियाशील नहीं होते। यह क्लेशों की दग्धबीजभाव अवस्था योगी में ही होती है, सांसारिक जनों में नहीं।

तीसरे सूत्र में समान रूप से पाँचों क्लेशों को पढ़ा था वहाँ पर यह ज्ञात नहीं होता था कि इनमें से कौन कारण है और कौन कार्य। इस सूत्र में अविद्या को कारण, अस्मितादि को कार्य रूप में बतलाया है। जब अविद्या रहती है तब ये चारों क्लेश रहते हैं। तत्त्वज्ञान के द्वारा अविद्या के नाश होने पर ये क्लेश भी निवृत्त हो जाते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि भक्तिमार्ग में विद्या की कोई आवश्यकता नहीं है, बिना विद्या के ही आत्मा मोक्ष में चला जाता है। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों में विद्या को मुक्ति का अनिवार्य साधन माना है -

विद्ययामृतमश्नुते॥ यजु० ४०–१४॥

विद्या से मोक्ष को प्राप्त करता है

ज्ञानान्मुक्तिः॥ सांख्य० ३-२३॥

ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है।

प्रमाण....तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः॥ न्यायदर्शन १ / २ / १॥

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तरापायादपवर्गः॥ न्यायदर्शन १/१/२॥

न्यायदर्शनकार महर्षि गौतम जी भी कहते है, "तत्त्वज्ञान से मुक्ति की प्राप्ति होती है, जिसका कि निम्न क्रम है ज्ञान से अज्ञान का नाश, उसके नाश से दोष (राग, द्वेष, मोह) का नाश, उसके नाश से प्रवृत्ति का नाश, प्रवृत्ति के नाश से जन्म का नाश, जन्म के नाश से दुःख का नाश, दुःख के नाश से मुक्ति होती है।इसलिये बिना विद्या के केवल भक्तिमार्ग से मुक्ति नही होती॥४॥

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