इस सूत्र में अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश इन क्लेशों की जननी अविद्या बतलाई है। अविद्या के होने पर ये क्लेश अस्तित्व में आते हैं उसके न होने पर नहीं। इन क्लेशों की पाँच अवस्थाएँ हैं, प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न उदार और दग्धबीजभाव।
प्रसुप्त - क्लेशों का सुप्तावस्था में रहना प्रसुप्त अवस्था कहलाती है। जैसे विविध प्रकार के बीज भूमि में विद्यमान रहते हैं परन्तु जब उनके अनुकूल जल, वायु आदि होते हैं तब वे अङ्कुरित होते हैं। इसी प्रकार से व्यक्ति के मन में जन्मजन्मान्तर की वासनायें विद्यमान रहती हैं। जब वासनाओं के अनुकूल उनके उद्बोधक कारण उपस्थित होते हैं तब वे उबुद्ध हो जाती हैं। बाल्य अवस्था में काम आदि की वासनाएँ विद्यमान रहती हैं किन्तु उस समय उनके जगाने वाले शारीरिक सामर्थ्य आदि कारण नहीं होते अतः वे प्रसुप्त रहती हैं। प्रसुप्त वासनाओं का प्रायः व्यक्ति को पता नहीं चलता। जब उनके अनुकूल वातावरण होता है तब व्यक्ति जान जाता है कि मेरे मन में इस प्रकार की वासनायें हैं। ये वासनायें पूर्व जन्म की भी होती हैं और इस जन्म की भी होती हैं। इसलिये योगाभ्यासी को सावधान रहना चाहिए कि मुझ में आन्तरिक रूप से प्रसुप्त वासनायें हैं, ये चाहे जब जाग सकती हैं।
तनु - जब क्लेश सूक्ष्म रूप में रहते हैं तब तनु कहलाते हैं। क्रियायोग के द्वारा क्लेश निर्बल हो जाते हैं वे साधक के मन में विषय भोगों की ओर विशेष उत्तेजना उत्पन्न नहीं करते। इस स्थिति को तनु कहते हैं। परन्तु जब उनके अनुकूल पदार्थ बार-बार समक्ष आते हैं और साधक ध्यान नहीं देता तो पुनः वे उदार बन जाते हैं अर्थात् जाग जाते हैं। इसलिये उन तनु रूप में स्थित क्लेशों को दग्धबीजभाव की अवस्था में ले जाने के लिये प्रयास करते रहना चाहिये। क्लेशों की प्रसुप्त और तनु अवस्था में भेद यह है कि - प्रसुप्त क्लेश सोया हुआ होता है, जबकि तनु क्लेश कुछ जागा हुआ होता है।
विच्छिन्न - जब वे प्रबल रूप में रहते हैं परन्तु उनके विरोधी क्लेश की तीव्रावस्था के कारण वे अभिभूत हो जाते हैं तब वे विच्छिन्न कहे जाते हैं। किसी एक विषय में राग की प्रवृत्ति होती है तो उससे भिन्न विषय का राग रुक जाता है। उस प्रवृत्त राग के शान्त होने पर यह रुका हुआ राग सक्रिय हो जाता है। एक राग दूसरे राग के प्रवृत्त होने पर दब जाता है और द्वेष के तीव्र होने पर भी दब जाता है। इसी प्रकार से एक विषय में द्वेष उभरता है तो अन्य विषय का द्वेष रुक जाता है। राग के तीव्र रूप से उभरने पर द्वेष रुक जाता है और उसके रुक जाने पर द्वेष उभर जाता है। इस प्रकार से एक वस्तु के प्रति राग के कारण दूसरी वस्तु के प्रति राग का न उत्पन्न होना अथवा द्वेष के तीव्र होने पर राग का रुक जाना तथा द्वेष के उदार होने पर दूसरे द्वेष का दब जाना एवं राग के उत्तेजित होने पर द्वेष का न उभरना क्लेशों की विच्छिन्न अवस्था है। जो साधक यह जानते हैं कि मेरे मन में विच्छिन्न क्लेश विद्यमान हैं वे विशेष ध्यान रखते हैं कि कभी विच्छिन्न क्लेश आक्रमण न कर देवें।
उदार - जब क्लेश तीव्र रूप से प्रवृत्त होता है तब उसको उदार कहा जाता है। जब व्यक्ति के मन में अत्यन्त तीव्र क्रोध उभरता है तो वह कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को नहीं जान सकता। यह क्लेश की उदार अवस्था है। इसी प्रकार से अस्मिता, राग, अभिनिवेश क्लेशों के विषय में भी जान लेना चाहिये।
दग्धबीजभाव - यह क्लेशों की पाँचवी अवस्था है। जैसे एक गेहूँ के बीज को अग्नि में भून देने के पश्चात् वह अनुकूल भूमि, जल, वायु को प्राप्त करके भी अङ्कुरित नहीं होता। वैसे ही योगाभ्यास के द्वारा योगी अविद्या आदि क्लेशों को शक्तिहीन बना देता है। इस अवस्था में वे क्लेश अपने अनुकूल विषय के समक्ष होने पर भी क्रियाशील नहीं होते। यह क्लेशों की दग्धबीजभाव अवस्था योगी में ही होती है, सांसारिक जनों में नहीं।
तीसरे सूत्र में समान रूप से पाँचों क्लेशों को पढ़ा था वहाँ पर यह ज्ञात नहीं होता था कि इनमें से कौन कारण है और कौन कार्य। इस सूत्र में अविद्या को कारण, अस्मितादि को कार्य रूप में बतलाया है। जब अविद्या रहती है तब ये चारों क्लेश रहते हैं। तत्त्वज्ञान के द्वारा अविद्या के नाश होने पर ये क्लेश भी निवृत्त हो जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि भक्तिमार्ग में विद्या की कोई आवश्यकता नहीं है, बिना विद्या के ही आत्मा मोक्ष में चला जाता है। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों में विद्या को मुक्ति का अनिवार्य साधन माना है -
विद्ययामृतमश्नुते॥ यजु० ४०–१४॥
विद्या से मोक्ष को प्राप्त करता है
ज्ञानान्मुक्तिः॥ सांख्य० ३-२३॥
ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है।
प्रमाण....तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः॥ न्यायदर्शन १ / २ / १॥
दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तरापायादपवर्गः॥ न्यायदर्शन १/१/२॥
न्यायदर्शनकार महर्षि गौतम जी भी कहते है, "तत्त्वज्ञान से मुक्ति की प्राप्ति होती है, जिसका कि निम्न क्रम है ज्ञान से अज्ञान का नाश, उसके नाश से दोष (राग, द्वेष, मोह) का नाश, उसके नाश से प्रवृत्ति का नाश, प्रवृत्ति के नाश से जन्म का नाश, जन्म के नाश से दुःख का नाश, दुःख के नाश से मुक्ति होती है।इसलिये बिना विद्या के केवल भक्तिमार्ग से मुक्ति नही होती॥४॥