इस सूत्र में अपरिग्रह पालन का फल बतलाया है। जब व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों में उपार्जन दोष, रक्षण दोष, क्षय दोष, संग दोष और हिंसा दोष देखता है तो उसकी विषय भोग में रुचि नहीं रहती। ऐसी स्थिति में वह अपने जीवन के विषय में विचारना प्रारम्भ करता है कि मैं भूतकाल में कौन था और कैसे था ? यह जीवन क्या है और कैसा है ? आगे भविष्य में हम सभी कैसे होंगे ? भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान जीवन विषयक जिज्ञासा उत्पन्न होती है। इसका परिणाम यह होता है कि आत्मा क्या है, शरीर क्या है, इन्द्रियाँ क्या हैं और भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान काल में इनकी क्या-क्या स्थिति रहती है। मेरा कल्याण कैसे हो सकता है और मैं दुःखों से कैसे छूट सकता हूँ इत्यादि विषयों को जानने का प्रयास करता है। विषय भोगों में विविध दुःख देखकर भोगमार्ग को छोड़कर योगमार्ग पर चलने लगता है। इस विषय में दो प्रकार की विचारधारायें हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि योगाभ्यासी व्यक्ति यह जान जाता है कि मेरा पूर्वजन्म में मनुष्य, पशु आदि योनियों में से कौन सा शरीर था। मेरे माता-पिता कौन थे, परिवार में कौन-कौन थे और कितने थे, परिवार किस नगर में था, इन सब बातों को यथावत् जान लेता है। दूसरी विचारधारा यह है कि योगाभ्यासी पूर्व जन्म की उक्त बातों को उक्त प्रकार से नहीं जान सकता।
पुनर्जन्मों की स्मृति होती है वा नहीं, यह अभी और परीक्षा की अपेक्षा रखता है। इस विषय में योगदर्शन ३।१८ के प्रसङ्ग में लिख दिया है, वहाँ पर देख लेवें। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस विषय में अपने विचार सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के पुनर्जन्म विषय में लिखे हैं। वे प्रमाण भी उसी सूत्र के व्याख्यान में लिख दिये हैं, वहीं देख लेवें॥३९॥