Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 37

2/37
Sutra
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानं ।। २.३७ ।।

Bhashya

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Word Meaning

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥

शब्दार्थ - (अस्तेय-प्रतिष्ठायाम्) जब योगी मन-वाणी - शरीर से अच्छे प्रकार से चोरी का परित्याग कर देता है तब (सर्व - रत्न - उपस्थानम् ) सब उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है।

अर्थात् जो-जो उत्तम पुरुषार्थ करता है उसका उत्तम फल उसको मिलता है और उसके चोरी के परित्याग करने से अन्य मनुष्य उसको उत्तम पदार्थ देते हैं। ईश्वर की ओर से भी ज्ञान, बल और सुख की प्राप्ति होती है।

सूत्रार्थ - जब योगी मन-वाणी-शरीर से अच्छे प्रकार से चोरी का परित्याग कर देता है तब सब उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती है। अर्थात् उत्तम पुरुषार्थ के अनुकूल फल प्राप्ति, अन्यों से सहायता तथा ईश्वर से ज्ञान, बल और सुख की प्राप्ति होती है।

Vyas Bhashya

सर्वदिक्स्थान्यस्योपतिष्ठन्ते रत्नानि॥३७॥

व्या० भा० अ० - इस योगी को सब दिशाओं में स्थित रत्न (उत्तम पदार्थ यथायोग्य) उपस्थित होते हैं॥३७॥

Yog Prakash

इस सूत्र में चोरी त्याग का फल बतलाया है। जब योगाभ्यासी मन, वाणी और शरीर से चोरी का नितान्त परित्याग कर देता है तो उसको यथायोग्य उत्तम पदार्थों की उपलब्धि होती है। व्यास भाष्य में अस्तेय का फल रत्नों की प्राप्ति लिखा है। रत्नों का अर्थ है उत्तम पदार्थ। चोरी का परित्याग करने वाला व्यक्ति परिश्रमी होता है इसलिये परिश्रम का फल उत्तम मिलता है। चोरी का त्याग करने वाला व्यक्ति परोपकारी होता है। अतः अन्य लोग भी उसको यथायोग्य उत्तम पदार्थ देते हैं। ईश्वर की आज्ञा का पालन करने से और उसकी उपासना करने से उसको ईश्वर की ओर से विद्या और आनन्द की प्राप्ति होती है। ये उपलब्धियाँ चोरी त्याग से और पुरुषार्थ से होती हैं, केवल चोरी त्यागने मात्र से नहीं। वेद में शुभ कर्म करने का भी विधान है, केवल अशुभ कर्म छोड़ने का नहीं।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः॥यजु० ४०/२॥

भावार्थ - वेदोक्त शुभ कर्म करते हुए ही सौ और उससे भी अधिक वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिये॥३७॥

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