इस सूत्र में अहिंसा का फल बताया है। जब योगाभ्यासी शरीर, वाणी और मन से सभी प्राणियों के प्रति वैरभाव को छोड़कर प्रेम से वर्त्तता है और अभ्यास करते-करते अहिंसा की परिपक्व अवस्था में पहुँच जाता है तब सभी प्राणियों के प्रति उसका वैरभाव नितान्त समाप्त हो जाता है। और जो मनुष्य उस योगी के उपदेश को, जीवन चरित्र को समझते हैं, उसका सङ्ग करते हैं और योगी के आचरण के अनुसार अपना आचरण बनाते हैं उनका भी वैरभाव छूट जाता है। परन्तु योगी के समीप रहने मात्र से किसी का भी वैरभाव नहीं छूटता।
श्री कृष्ण जी को योगी माना जाता है। उन्होंने दुर्योधन को बार-बार उपदेश देकर युद्ध न करने को कहा। परन्तु श्रीकृष्ण जी की सम्मति मानना तो दूर, बल्कि दुर्योधन ने तो श्रीकृष्ण जी को ही बन्धक बनाने का प्रयत्न किया। इससे ज्ञात होता है कि योगी श्रीकृष्ण जी के प्रति दुर्योधन का वैरभाव नहीं छूटा। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को योगी माना जाता है। उनके ऊपर बार-बार अनेक लोगों ने आक्रमण किये और अन्त में उनका देहावसान ही कर दिया। स्वामी जी के समीप आने मात्र से किसी का भी वैरभाव नहीं छूटा।।
वेद में युञ्जन्ति ब्रघ्नमरुषं चरन्तं परि तस्थुषः। रोचन्ते रोचना दिवि॥ ऋ० १/६/१॥ ईश्वर को अरुष = हिंसारहित कहा है और शन्नो मित्रः.. .........॥ यजु० ३६ / ९।। सबका मित्र भी कहा है। ईश्वर कभी भी किसी भी प्राणी से वैर नहीं करता। सदा समस्त प्राणियों के साथ मित्रता से ही रहता है और ईश्वर सर्वव्यापक है। सभी सदा उसके समीप ही रहते हैं। इस स्थिति में मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प, बिच्छु आदि सबका वैरभाव छूट जाना चाहिये था। परन्तु आज तक कभी भी समस्त प्राणियों का वैरभाव नहीं छूटा और न आगे छूटेगा। इसलिये ऐसा अर्थ करना असंगत है।
व्यासभाष्य में लिखा है "सर्वप्राणिनां भवति।"
इसका अभिप्राय यह है कि जो मनुष्य योगी के उपदेश को सुनते हैं, समझते हैं। उसके व्यवहार को देखते हैं और उसके आचरण के अनुसार अपना आचरण बनाते हैं उन सबका आचरणानुसार वैरभाव छूट जाता है।
श्री व्यास जी योगदर्शन के भाष्यकार महाभारत के युद्धकाल में विद्यमान थे, अनेक लोगों की यह मान्यता है। उनके उपदेश वा संगमात्र से दुर्योधन और उन योद्धाओं का वैरभाव क्यों नहीं छूटा ? इसलिये यह मानना ठीक नहीं कि योगी के समीप रहने मात्र से शेर और बकरी का, सर्प और नेवले का, कौए और उल्लू इत्यादि का योगी के प्रति वैरभाव छूट जाता है और वे सभी परस्पर वैरभाव छोड़कर मित्र बन जाते हैं।
सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान् प्रियान्पाणिने-
र्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्।
छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गलम् –
अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः ?। पंचतंत्र मित्रसम्प्राप्ति ३६॥
भावार्थ व्याकरणशास्त्र के कर्त्ता पाणिनि मुनि को सिंह ने मार डाला था। मीमांसा के प्रवर्तक जैमिनि मुनि को सहसा एक हाथी ने कुचल डाला था और छन्दशास्त्र के प्रवर्तक आचार्य पिङ्गल को समुद्र के किनारे किसी ग्राह (मगरमच्छ) ने मार डाला था। अतः यह सिद्ध है कि अज्ञानी अविवेकी तथा क्रोधी पशुओं को किसी के गुणों से प्रयोजन ही क्या हो सकता है ? (पशुओं को किसी के गुण से कोई प्रयोजन नहीं होता है)॥३५॥