इस सूत्र में वितर्कों से बाधित होने पर साधक को प्रतिपक्ष भावना का निर्देश है। जब योगाभ्यासी के मन में अहिंसादि व्रतों के विरुद्ध हिंसा आदि करने की तीव्र इच्छा हो अर्थात् वह इन अहिंसादि के विरुद्ध हिंसा आदि का आचरण करने का विचार करने लग जाय कि "मैं हिंसा करूँगा, क्योंकि इस व्यक्ति ने मेरी हानि की है।" इसी प्रकार सत्य को छोड़कर असत्य आचरण करने का विचार करे कि "मैं असत्य बोलूँगा।" ऐसी स्थिति में वह प्रतिपक्ष भावना करे कि काम, क्रोध, लोभ आदि के द्वारा उत्पन्न क्लेशों से सन्तप्त होते हुए मैंने योग की शरण ली है। पुनः उन्ही भयंकर शत्रुओं को ग्रहण कर रहा हूँ। यह मेरा आचरण कुत्ते के समान है। जैसे कुत्ता मांस आदि को खाकर पेट भर लेता है और उसका वमन करके पुनः उसी को खा लेता है। वैसा ही मैं भी हूँ। ऐसी प्रतिपक्ष भावना को उत्पन्न करे।
जन्म-जन्मान्तरों के अशुभ संस्कार अत्यन्त बलवान् होते हैं। उनको सूक्ष्मता से जानकर दीर्घकाल पर्यन्त दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिये। योगाभ्यासी को अत्यन्त सावधान रहना चाहिये। यदि वह असावधान रहता है तो तत्काल वितर्क उग्ररूप में उभर आते हैं। प्रथम अपने दोषों को दूर करने का प्रयास अधिक करना चाहिये और दूसरों के दोषों को देखने का अभ्यास न्यून करना चाहिये। काम, क्रोध आदि दोषों से न प्रेम करना चाहिए और न ही उनको छोटा जानना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से वे प्रबल होकर आक्रमण करते हैं। समाधि भङ्ग होने पर साधक को वितर्क बाधित करते हैं। यदि साधक सावधान रहता है तो तत्काल ही इनको रोक देता है यदि इनको तत्काल नहीं रोकता तो ये बलवान् हो जाते हैं, ऐसी अवस्था में इनको दूर करना कठिन होता है। परन्तु योगाभ्यासी को सदा यह जानना चाहिये कि हिंसादि दोषों को मन के द्वारा मैं ही उठाता हूँ। ये स्वयं नहीं उठ सकते। ऐसा जानने से और इनके निराकरण के लिये प्रयत्न करने से इनका उग्ररूप दूर हो सकता है।
यदि साधक यह मानता है कि मन चेतन पदार्थ है, वह ही इन दोषों को उठाता है तो मैं क्या कर सकता हूँ ? ऐसी स्थिति में इन दोषों को रोकना कठिन है। असावधानी एवं कुसंस्कारों के कारण व्यक्ति वितर्कों को उठा लेता है और उनको रोकने का प्रयास भी करता है पुनरपि वे नहीं रुकते तो तत्काल ईश्वरोपासना प्रारम्भ कर देनी चाहिये। उससे इनको हटाने में सफलता मिलेगी। मृत्यु का स्मरण भी वितर्कों को रोकने का एक उपाय है। जैसे कि यह शरीर नाशवान् है, मृत्यु के मुख में है, पता नहीं यह किस क्षण समाप्त हो जाए। इस प्रकार मृत्यु को स्मरण करने से काम, क्रोधादि वितर्क रुक जाते हैं।
शब्दप्रमाण भी वितर्कों को रोकने का एक उपाय है। शब्दप्रमाण को स्मरण रखना चाहिए। जब वितर्क सन्तप्त करें तो शब्दप्रमाण को सत्य मानकर वितर्कों को रोक देना चाहिये। अर्थात् शब्दप्रमाण में जो बात कही है, वह सत्य है और मैं जो मानता हूँ कि विषयभोगों में सुख है, यह असत्य है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ पर वितर्क उभरते हैं वहाँ-वहाँ शब्दप्रमाण को सत्य मानकर रोक देना चाहिये। वेद में वितर्कों के विनाश का उपदेश है। I
उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्।
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र॥ अथर्ववेद ८/४/२२॥
भावार्थ - हे इन्द्र ! तू उल्लू की चाल वाले (रात्रि में घूमने वाले) को, भेड़िये की चाल वाले (क्रोधी) को, कुत्ते की चाल वाले ( परस्पर झगड़ने वाले) को, चिड़िया के समान चाल वाले (कामी) को, बाज के समान चाल वाले (आक्रमणकारी) को, गृध्र के समान चाल वाले (लोभी) को पत्थर से पीसने के समान मार डाल। राक्षसों को मार दे॥३३॥