Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 33

2/33
Sutra
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनं ।। २.३३ ।।

Bhashya

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Inception

अव० - एतेषां यमनियमानाम् -

अर्थ - इन यमनियमों के -

Word Meaning

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥३३॥

शब्दार्थ - (वितर्क-बाधने) वितर्कों से बाधा उपस्थित होने पर (प्रतिपक्ष-भावनम्) विरुद्ध पक्ष का विचार करना चाहिये।

सूत्रार्थ - यम-नियमों के पालन में वितर्कों द्वारा बाधा उपस्थित होने पर विरुद्ध पक्ष का विचार करना चाहिये। अर्थात् यम-नियम के भङ्ग होने से बहुत बड़ी हानि होती है ऐसा मानकर उन वितर्कों को रोक देना चाहिये।

Vyas Bhashya

यदास्य ब्राह्मणस्य हिंसादयो वितर्कों जायेरन्हनिष्याम्यहमपकारिणमनृतमपि वक्ष्यामि, द्रव्यमप्यस्य स्वीकरिष्यामि, दारेषु चास्य व्यवायी भविष्यामि, परिग्रहेषु चास्य स्वामी भविष्यामीति। एवमुन्मार्गप्रवणवितर्कज्वरेणातिदीप्तेन बाध्यमानस्तत्प्रतिपक्षान्भावयेत् -“घोरेषु संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया शरणमुपागतः सर्वभूताभयप्रदानेन योगधर्मः। स खल्वहं त्यक्त्वा वितर्कान्पुनस्तानाददानस्तुल्यः श्ववृत्तेने”ति भावयेत्। यथा श्वा वान्तावलेही तथा त्यक्तस्य पुनराददान इत्येवमादि सूत्रान्तरेष्वपि योज्यम्॥३३॥

व्या० भा० अ० - जिस समय इस ब्राह्मण (योगी) को हिंसा आदि वितर्क उत्पन्न होवें कि मैं अपकारी की हत्या करूंगा, असत्य भी बोलूंगा, इसके द्रव्य को लूंगा (अपहरण करुँगा), इसकी स्त्री के साथ अनाचार करूंगा, इसके परिग्रह (सञ्चित धन) पर अधिकार करूँगा। इस प्रकार अति तीव्र कुमार्गोन्मुख वितर्क ज्वर के द्वारा पीड़ित होने पर उसके प्रतिपक्षों की (अर्थात् प्रतिकूल विचारों की) भावना करे। जैसे कि "घोर संसाररूपी अङ्गारों मे झुलसते हुए मैंने सब प्राणियों को अभयदान कर योगधर्म की शरण ली है। वही मैं वितर्कों को त्याग कर पुनः उनको ग्रहण करता हुआ कुत्ते के समान व्यवहार करने वाला हो गया हूँ।" जिस प्रकार कुत्ता वमन किए को ग्रहण करने वाला होता है, उसी प्रकार (मैं) छोड़े हुए को पुनः ग्रहण करने वाला हूँ। इसी प्रकार अन्य सूत्रों में कहे हुए साधनों में वितर्कों के उठने पर प्रतिपक्ष की भावना जाननी चाहिये॥३३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में वितर्कों से बाधित होने पर साधक को प्रतिपक्ष भावना का निर्देश है। जब योगाभ्यासी के मन में अहिंसादि व्रतों के विरुद्ध हिंसा आदि करने की तीव्र इच्छा हो अर्थात् वह इन अहिंसादि के विरुद्ध हिंसा आदि का आचरण करने का विचार करने लग जाय कि "मैं हिंसा करूँगा, क्योंकि इस व्यक्ति ने मेरी हानि की है।" इसी प्रकार सत्य को छोड़कर असत्य आचरण करने का विचार करे कि "मैं असत्य बोलूँगा।" ऐसी स्थिति में वह प्रतिपक्ष भावना करे कि काम, क्रोध, लोभ आदि के द्वारा उत्पन्न क्लेशों से सन्तप्त होते हुए मैंने योग की शरण ली है। पुनः उन्ही भयंकर शत्रुओं को ग्रहण कर रहा हूँ। यह मेरा आचरण कुत्ते के समान है। जैसे कुत्ता मांस आदि को खाकर पेट भर लेता है और उसका वमन करके पुनः उसी को खा लेता है। वैसा ही मैं भी हूँ। ऐसी प्रतिपक्ष भावना को उत्पन्न करे।

जन्म-जन्मान्तरों के अशुभ संस्कार अत्यन्त बलवान् होते हैं। उनको सूक्ष्मता से जानकर दीर्घकाल पर्यन्त दूर करने का प्रयास करते रहना चाहिये। योगाभ्यासी को अत्यन्त सावधान रहना चाहिये। यदि वह असावधान रहता है तो तत्काल वितर्क उग्ररूप में उभर आते हैं। प्रथम अपने दोषों को दूर करने का प्रयास अधिक करना चाहिये और दूसरों के दोषों को देखने का अभ्यास न्यून करना चाहिये। काम, क्रोध आदि दोषों से न प्रेम करना चाहिए और न ही उनको छोटा जानना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से वे प्रबल होकर आक्रमण करते हैं। समाधि भङ्ग होने पर साधक को वितर्क बाधित करते हैं। यदि साधक सावधान रहता है तो तत्काल ही इनको रोक देता है यदि इनको तत्काल नहीं रोकता तो ये बलवान् हो जाते हैं, ऐसी अवस्था में इनको दूर करना कठिन होता है। परन्तु योगाभ्यासी को सदा यह जानना चाहिये कि हिंसादि दोषों को मन के द्वारा मैं ही उठाता हूँ। ये स्वयं नहीं उठ सकते। ऐसा जानने से और इनके निराकरण के लिये प्रयत्न करने से इनका उग्ररूप दूर हो सकता है।

यदि साधक यह मानता है कि मन चेतन पदार्थ है, वह ही इन दोषों को उठाता है तो मैं क्या कर सकता हूँ ? ऐसी स्थिति में इन दोषों को रोकना कठिन है। असावधानी एवं कुसंस्कारों के कारण व्यक्ति वितर्कों को उठा लेता है और उनको रोकने का प्रयास भी करता है पुनरपि वे नहीं रुकते तो तत्काल ईश्वरोपासना प्रारम्भ कर देनी चाहिये। उससे इनको हटाने में सफलता मिलेगी। मृत्यु का स्मरण भी वितर्कों को रोकने का एक उपाय है। जैसे कि यह शरीर नाशवान् है, मृत्यु के मुख में है, पता नहीं यह किस क्षण समाप्त हो जाए। इस प्रकार मृत्यु को स्मरण करने से काम, क्रोधादि वितर्क रुक जाते हैं।

शब्दप्रमाण भी वितर्कों को रोकने का एक उपाय है। शब्दप्रमाण को स्मरण रखना चाहिए। जब वितर्क सन्तप्त करें तो शब्दप्रमाण को सत्य मानकर वितर्कों को रोक देना चाहिये। अर्थात् शब्दप्रमाण में जो बात कही है, वह सत्य है और मैं जो मानता हूँ कि विषयभोगों में सुख है, यह असत्य है। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ पर वितर्क उभरते हैं वहाँ-वहाँ शब्दप्रमाण को सत्य मानकर रोक देना चाहिये। वेद में वितर्कों के विनाश का उपदेश है। I

उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम्।

सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र॥ अथर्ववेद ८/४/२२॥

भावार्थ - हे इन्द्र ! तू उल्लू की चाल वाले (रात्रि में घूमने वाले) को, भेड़िये की चाल वाले (क्रोधी) को, कुत्ते की चाल वाले ( परस्पर झगड़ने वाले) को, चिड़िया के समान चाल वाले (कामी) को, बाज के समान चाल वाले (आक्रमणकारी) को, गृध्र के समान चाल वाले (लोभी) को पत्थर से पीसने के समान मार डाल। राक्षसों को मार दे॥३३॥

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