इस सूत्र में पाँच नियमों का कथन किया है। शौच - शौच अर्थात् शुद्धि। शुद्धि दो प्रकार की है। एक बाह्य और दूसरी आन्तरिक। शरीर, वस्त्र, स्थान, पात्र, भोजन आदि को शुद्ध रखना और धन, सम्पत्ति को न्यायपूर्वक उपार्जित करना बाहर की शुद्धि है। अविद्या, मिथ्याभिमान, राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि को दूर करना आन्तरिक शुद्धि है। बाहर की शुद्धि न्यून परिश्रम साध्य है और आन्तरिक शुद्धि अधिक परिश्रम साध्य है। बाहर की शुद्धि की अपेक्षा आन्तरिक शुद्धि करने में अधिक प्रयत्न करना चाहिये।
सन्तोष - सम्पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् जो भी उपलब्धि हो, उसी में सन्तुष्ट रहना, उससे अधिक की इच्छा न करना, सन्तोष है।
तप - धर्माचरण करते हुवे हानि-लाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि को शान्त चित्त से सहन करना, तप है। जिन उत्तम कार्यों के करने से स्वयं का और अन्यों का दुःख दूर होता है और सुख की प्राप्ति होती है उनको करते रहना और न छोड़ना, धर्माचरण है।
स्वाध्याय वेद और वेदानुकूल मोक्ष के स्वरूप को एवं उसके साधन, बाधकों को बतलाने वाले ग्रन्थों को पढ़ना-पढ़ाना और ईश्वर के स्वरूप को प्रकाशित करने वाले मन्त्रों एवं प्रणव आदि का अर्थसहित जप करना, स्वाध्याय है। -
ईश्वरप्रणिधान - समस्त विद्याओं को देने वाले परमगुरु ईश्वर में समस्त कर्मों को समर्पित कर देना, उसकी भक्ति करना, व्यवहार में उसके आदेशों का पालन करना, शरीर आदि पदार्थों को उसके मानकर धर्माचरण करना, कर्मों का लौकिक फल न चाहना, ईश्वरसाक्षात्कार को ही लक्ष्य बनाकर कार्यों को करना, ईश्वरप्रणिधान है। मोक्षप्राप्ति का ईश्वरप्रणिधान विशेष साधन है। इसका पहले उल्लेख कर दिया है। ईश्वरप्रणिधान को अच्छे प्रकार से जानकर तदनुसार आचरण करने से ईश्वर सहायता देता है। जिससे शीघ्र ही समाधि की सिद्धि और विघ्नों का निराकरण हो जाता है। योगदर्शनकार ने प्रथम पाद के २८ वें सूत्र ( ततः प्रत्यक्चेतना..... ) में ईश्वरप्रणिधान का फल बतलाया है कि इससे ईश्वर एवं जीवात्मा के स्वरूप का साक्षात्कार और विघ्न तथा उपविघ्नों का नाश होता है॥३२॥