इस सूत्र में अहिंसादि पाँच यमों का कथन है। अहिंसा सर्वथा सर्वदा सभी प्राणियों के साथ वैरभाव को छोड़कर प्रीति से वर्त्तना, अहिंसा है। यदि किसी व्यक्ति को चोरी आदि अशुभ कर्म करने पर उसके सुधार के लिये और अन्यों के उपकार के लिये प्रेमपूर्वक उचित दण्ड दिया जाय तो वह अहिंसा है, हिंसा नहीं। माता, पिता, आचार्य आदि बालक-बालिकाओं को दोषों से दूर करने के लिये और उनको गुणवान् बनाने के लिये प्रेमपूर्वक उनको उचित दण्ड देते हैं तो वह हिंसा नहीं, अहिंसा है। इसी प्रकार से अहिंसा के विषय में सर्वत्र जानना चाहिये। अहिंसा का पालन करने से व्यक्ति अपने सूक्ष्म दोषों को जानने में और उनको दूर करने में समर्थ हो जाता है।
सत्य - जैसा देखा हो, अनुमान से जाना हो और सुना हो, वैसा ही मन और वाणी में होना सत्य है। ऐसा भी कह सकते हैं कि जो पदार्थ जैसा है, उसको वैसा ही जानना, मानना, बोलना और शरीर से उसको आचरण में लाना, सत्य है। यदि सत्य बोलने से सुनने वाला लाभ नहीं उठाता तो वहाँ पर मौन रहना ही उत्तम है। इसलिये जो वस्तु जैसी है उसको वैसी ही जानना, मानना, हितार्थ बोलना और आचरण में लाना, सत्य है। सत्य को परीक्षापूर्वक जानना और उसका सर्व हितार्थ ही प्रयोग करना, सत्य है। वस्तु के स्वरूप को विपरीत जानना, मानना, बोलना, आचरण में लाना, असत्य है। परन्तु हित के नाम से सत्य के स्थान में असत्य का आचरण करना सत्य नहीं है।
अस्तेय मन, वाणी और शरीर से चोरी का परित्याग करके उत्तम कार्यों में तन, मन, धन से सहायता करना, अस्तेय है। केवल चोरी को छोड़ देना ही अस्तेय नहीं है।
ब्रह्मचर्य - वेदों को पढ़ना, ईश्वरोपासना करना और वीर्य की रक्षा करना, ब्रह्मचर्य है।
अपरिग्रह - विषयों में उपार्जन, रक्षण, क्षय, सङ्ग, हिंसा दोष देखकर विषयभोग की दृष्टि से उनका संग्रह न करना, अपरिग्रह है। इसको इस प्रकार से भी कह सकते हैं कि हानिकारक, अनावश्यक वस्तु और अभिमानादि हानिकारक, अनावश्यक अशुभ विचारों को त्याग देना, अपरिग्रह है। जो-जो वस्तु और विचार ईश्वर प्राप्ति में बाधक हैं उन सबका परित्याग और जो-जो वस्तु, विचार ईश्वर प्राप्ति में साधन हैं उनका ग्रहण करना, अपरिग्रह है। यमों के विषय में वेद में उपदेश है -
(१) ते ह॒ँह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥ ।। यजु० ३६ / ९८॥
अर्थ - हे (दृते) अविद्यारूपी अन्धकार के निवारक जगदीश्वर वा विद्वन् ! जिससे (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणी (मित्रस्य) मित्र की (चक्षुषा ) दृष्टि से (मा) मुझको (सम्, ईक्षन्ताम् ) सम्यक् देखें (अहम्) मैं (मित्रस्य) मित्र की (चक्षुषा ) दृष्टि से (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणियों को (समीक्षे) सम्यक् देखूँ, इस प्रकार सब हम लोग परस्पर (मित्रस्य) मित्र की (चक्षुषा ) दृष्टि से (समीक्षामहे) देखें, इस विषय में हमको (दृ ँह) दृढ़ कीजिये। - महर्षि दयानन्द कृत यजुर्वेदभाष्य
(२) अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि॥ यजु० १ / ५॥
अर्थ - हे (व्रतपते !) सत्यभाषणादि व्रतों के पालक ! (अग्ने !) सत्य धर्म के उपदेशक ईश्वर ! (अहम्) धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करने की इच्छा वाला मैं जो (इदम्) इस सत्यव्रत को (अवृतात्) मिथ्या भाषण, मिथ्या आचरण, मिथ्या बात को मानने से अलग होकर (सत्यम्) जो वेद-विद्या, प्रत्यक्षादि प्रमाणों, सृष्टिक्रम, विद्वानों का संग, श्रेष्ठ विचार और आत्म-शुद्धि के द्वारा जो भ्रान्ति से रहित, सबका हितकारक, तत्त्वनिष्ठ, सत्प्रभव है और जो अच्छी प्रकार परीक्षा करके निश्चय किया जाता है, जो (व्रतम् ) सत्यभाषण, सत्याचरण, सत्य मानना रूप व्रत है, उसका (चरिष्यामि) पालन करूँगा, (तत् मे) मेरे उस व्रत का अनुष्ठान और पूरा होना, आपकी कृपा से (राध्यताम्) सिद्ध हो। जिस (उपैमि) जानने, प्राप्त करने और आचरण में लाने के लिए (शकेयम्) समर्थ होऊँ, (तत्) वह व्रत भी सब आपकी कृपा से (राध्यताम्) सिद्ध होवे। - महर्षि दयानन्द कृत यजुर्वेदभाष्य -
( ३ ) ईशा वास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥यजु० ४० / १॥
हे मनुष्य ! तू (यत्) जो (इदम्) प्रकृति से लेकर पृथिवी पर्य्यन्त (सर्वम्) सब (जगत्याम्) प्राप्त होने योग्य सृष्टि में (जगत्) चरप्राणिमात्र (ईशा) संपूर्ण ऐश्वर्य से युक्त सर्वशक्तिमान् परमात्मा (वास्यम्) आच्छादन करने योग्य अर्थात् सब ओर से व्याप्त होने योग्य है (तेन) उस (त्यक्तेन) त्याग किये हुए जगत् से (भुञ्जीथाः) पदार्थों के भोगने का अनुभव कर (किंच) किन्तु (कस्य, स्वित्) किसी के भी (धनम्) वस्तुमात्र की (मा) मत (गृधः) अभिलाषा कर। - महर्षि दयानन्द कृत यजुर्वेदभाष्य -
(४) ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत।
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत्॥ अथर्व ० ११ / ५ /१९॥
अर्थ - (देवाः) देव, ज्ञानी पुरुष (ब्रह्मचर्येण तपसा) ब्रह्मचर्य के तपोबल से (मृत्युम्) मौत को (अपाघ्नत) मार डालते हैं। (इन्द्र) परमेश्वर व आत्मा (ह) भी निश्चय से (ब्रह्मचर्येण) अपने ब्रह्मचर्य के द्वारा ही (देवेभ्यः) देवों के लिए (स्वः) सुख व तेज को (आभरत्) लाता है, प्राप्त करता है। -आचार्य अभयदेव कृत वैदिक विनय -
(५) शतहस्त समाहर सहस्त्रहस्त सं किर। अथर्व० ३ / २४/५॥
अर्थ - सौ हाथों से कमाओ और हज़ार हाथों से दान करो।