Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 3
अव० - अथ के क्लेशाः ? कियन्तो वेति ? -
अर्थ - क्लेश कौन हैं और कितने हैं ? ( यह सूत्र द्वारा कहा गया है -)
अविद्याऽस्मिता रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः॥३॥
शब्दार्थ - (अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष-अभिनिवेशा:) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये (पञ्च-क्लेशाः) पाँच क्लेश हैं।
सूत्रार्थ - अविद्यादि ये पाँच क्लेश हैं अर्थात् ये दुःखों को उत्पन्न करते हैं।
क्लेशा इति पञ्च विपर्यया इत्यर्थः। ते स्यन्दमाना गुणाधिकारं द्रढयन्ति, परिणाम-मवस्थापयन्ति, कार्यकारणस्त्रोत उन्नमयन्ति, परस्परानुग्रहतन्त्रीभूत्वा कर्मविपाकं चाभिनिर्हरन्तीति॥३॥'क्लेश' का अर्थ पाँच विपर्यय (अर्थात् पाँच प्रकार का मिथ्याज्ञान) है।
व्या० भा० अ० - वे वर्त्तमान (प्रवृत्त हुए) गुणों के अधिकार (कार्योत्पादन रूपी गुणों के अधिकार) को बलिष्ठ बनाते है, (कार्यरूप) परिणाम को चलाते हैं, कार्य-कारण के स्रोत को उत्पन्न करते हैं, परस्पर सहयोग देकर कर्म फल को सम्पन्न करते हैं॥३॥
इस सूत्र में अविद्या आदि पाँच क्लेशों का कथन है। पाँच क्लेशों का अर्थ है, पाँच प्रकार का मिथ्याज्ञान। क्लेशों की प्रवृत्ति होने पर व्यक्ति धर्माचरण एवं ईश्वरोपासना को छोड़ देता है और अधर्माचरण एवं भोगों में फंस जाता है। उसका फल है पशु आदि विविध योनियों में जन्म लेना और भयंकर दुःखों को भोगना। कपिलाचार्य ने सांख्य दर्शन में कहा है कि "बन्धो विपर्ययात् "॥सां० ३-२४॥अर्थात् अविद्या से बन्धन की प्राप्ति होती है। अविद्या का और अधर्म का परस्पर सम्बन्ध है। अविद्या अधर्म को उत्पन्न करती है, अधर्म अविद्या को उत्पन्न करता है। ये दोनों मिलकर जीवों को जन्म-जन्मान्तर में ले जाने का कारण बनते हैं। जब तक अविद्या बनी रहती है तब तक अधर्माचरण भी बना रहता है और उसके रहते हुए जीवात्मा का जन्म-मरणादि बन्धन भी चलता रहता है। अविद्या आदि पाँच क्लेश समस्त अधर्मों और दुःखों के कारण हैं। जहाँ पर अविद्या होगी वहाँ पर अधर्माचरण और अनीश्वरोपासना अवश्य होगी और जहाँ पर अधर्माचरण और अनीश्वरोपासना होगी वहाँ पर दुःख अनिवार्य रूप से रहेगा।
यहाँ पर यह भी जानना चाहिए कि जहाँ पर विद्या होगी वहाँ धर्माचरण एवं ईश्वरोपासना अवश्य होगी। जहाँ धर्माचरण एवं ईश्वरोपासना होगी वहाँ पर सुख अवश्य होगा। प्रत्येक व्यक्ति समस्त दुःखों से छूटना चाहता है और दुःख रहित नित्यानन्द को प्राप्त करना चाहता है। यह लक्ष्य उसका तब पूरा हो सकता है जब सत्यविद्या से अविद्या का नाश और धर्म एवं ईश्वरोपासना से अधर्म तथा अनीश्वरोपासना का नाश करे। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को समस्त दुःखों से मुक्त होने एवं नित्यानन्द को प्राप्त करने के लिए शुद्धज्ञान, शुद्धकर्म और शुद्धोपासना को अपनाना चाहिए।। ३।।