इस सूत्र में विचलित न होने वाली विवेकख्याति को 'मोक्ष का उपाय' बतलाया है।मोक्ष का उपाय होने के कारण विवेकख्याति के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिये। प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्दप्रमाण से वस्तु का स्वरूप जाना जाता है। जो अनुमान और शब्द प्रमाण से ज्ञान होता है उसकी गणना विवेकख्याति में नहीं है। क्योंकि उस ज्ञान से आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और शरीर के स्वरूप की पृथक्-पृथक् अनुभूति नहीं होती। परन्तु विवेकख्याति से इन पृथक्-पृथक् पदार्थों की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है इसलिये विवेकख्याति को मोक्ष का विशेष उपाय कहा है। अविप्लवा विवेकख्याति की प्राप्ति के लिये सम्प्रज्ञात समाधि का विशेष अभ्यास करना पड़ता है। सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति अभ्यास वैराग्य से होती है। सम्प्रज्ञात समाधि की अपरिपक्व अवस्था में विवेकख्याति विचलित होती रहती है। सांसारिक विषय भोगों के संस्कार इसके विचलित होने के कारण हैं। जब तक वे संस्कार दग्धबीजभाव को प्राप्त नहीं होते तब तक विवेकख्याति अस्थिर होती रहती है। दीर्घकालपर्यन्त योगाभ्यास करते रहने से अशुभ संस्कार दग्धबीजभाव की अवस्था में चले जाते हैं। इस स्थिति में विवेकख्याति सतत स्थिर बनी रहती है। यही मोक्ष का उपाय है। इसी को 'अविप्लवा विवेकख्याति' कहते हैं ।
जब व्यक्ति को वैराग्य होता है, तब उसका ज्ञान बढता रहता है परन्तु लौकिक संस्कारों के कारण सम्प्रज्ञात समाधि मध्य-मध्य में भंग होती रहती है। यह विवेकख्याति की विप्लव अवस्था है। इसको यम-नियमों के पालन से, ईश्वरप्रणिधानादि साधनों से अविप्लव अवस्था में ले जाना चाहिये। इससे मिथ्याज्ञान की निवृत्ति और परवैराग्य की उत्पत्ति होती है। परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और ईश्वरसाक्षात्कार होता है। ईश्वरसाक्षात्कार से योगी मोक्ष का अधिकारी बनता है तब मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि ईश्वरसाक्षात्कार होते ही योगी मोक्ष का भागी नहीं होता। मोक्ष का अधिकारी बनने के लिये दीर्घकालपर्यन्त अभ्यास की अपेक्षा रहती है। योगदर्शनकार ने ३/९ में यह कहा है कि व्युत्थानसंस्कार के अभिभूत होने पर और निरोधसंस्कारों के उद्बुद्ध होने से असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि होती है और व्युत्थानसंस्कारों से निरोधसंस्कारो के अभिभूत होने से असम्प्रज्ञात समाधि भंग हो जाती है। इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वरसाक्षात्कार होते ही मोक्ष नहीं होता। यह बात पूर्व लिखी गई है कि विवेकख्याति परम्परा से मोक्ष का उपाय है और असम्प्रज्ञात समाधि साक्षात् मोक्ष का उपाय है।। २६।।