Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 23

2/23
Sutra
स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ।। २.२३ ।।

Bhashya

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Inception

अव० संयोगस्वरूपाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रववृते। -

अर्थ – 'संयोग के स्वरूप' को बतलाने की इच्छा से यह सूत्र प्रवृत्त हुआ है -

Word Meaning

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः॥२३॥

शब्दार्थ - (स्व-स्वामि-शक्त्योः) स्वशक्ति = प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थों के गुणकर्म-स्वभाव। स्वामिशक्ति = जीवात्मा और उसके गुण-कर्म-स्वभाव, इन दोनों के (स्वरूपउपलब्धि-हेतुः) स्वरूप के ज्ञान का हेतु (संयोगः) संयोग है। 

सूत्रार्थ - प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थों के गुण-कर्म-स्वभाव तथा जीवात्मा और उसके गुण-कर्म-स्वभाव। इन दोनों के स्वरूप के ज्ञान का कारण 'संयोग' है।

Vyas Bhashya

भा० पुरुष: स्वामी दृश्येन स्वेन दर्शनार्थं संयुक्तः। तस्मात्संयोगाद् दृश्यस्योपलब्धिर्या स भोगः, या तु द्रष्टुः स्वरूपोपलब्धिः सोऽपवर्गः। दर्शनकार्यावसानः संयोग इति दर्शनं वियोगस्य कारणमुक्तम्। दर्शनमदर्शनस्य प्रतिद्वन्द्वीत्यदर्शनं संयोगनिमित्तमुक्तम्। नात्र दर्शनं मोक्षकारणम्, अदर्शनाभावादेव बन्धाभावः स मोक्ष इति। दर्शनस्य भावे बन्धकारणस्यादर्शनस्य नाश इत्यतो दर्शनज्ञानं कैवल्यकारणमुक्तम्। किं चेदमदर्शनं नाम ?

१- किं गुणानामधिकारः ?

२-आहोस्विद् दृशिरूपस्य स्वामिनो दर्शितविषयस्य प्रधानचित्तस्यानुत्पादः स्वस्मिन्दृश्ये विद्यमाने दर्शनाभावः ?

३-किमर्थवत्ता गुणानाम् ?

४ - अथाविद्या स्वचित्तेन सह निरुद्धा स्वचित्तस्योत्पत्तिबीजम् ?

५-किं स्थितिसंस्कारक्षये गतिसंस्काराभिव्यक्तिः ? यत्रेदमुक्तं - प्रधानं स्थित्यैव वर्तमानं विकाराकरणादप्रधानं स्यात् तथा गत्यैव वर्तमानं विकारनित्यत्वादप्रधानं स्यात्। उभयथा चास्य प्रवृत्तिः प्रधानव्यवहारं लभते नान्यथा। कारणान्तरेष्वपि कल्पितेष्वेष समानश्चर्चः।

६-दर्शनशक्तिरेवादर्शनमित्येके; प्रधानस्यात्मख्यापनार्था प्रवृत्तिरिति श्रुतेः। सर्वबोध्यबोधसमर्थः प्राक्प्रवृत्तेः पुरुषो न पश्यति, सर्वकार्यकरणसमर्थं दृश्यं तदा न दृश्यत इति।

७-उभयस्याप्यदर्शनं धर्म इत्येके। तत्रेदं दृश्यस्य स्वात्मभूतमपि पुरुषप्रत्ययापेक्षं दर्शनं दृश्यधर्मत्वेन। भवति, तथा पुरुषस्यानात्मभूतमपि दृश्यप्रत्ययापेक्षं पुरुषधर्मत्वेनेवादर्शनमवभासते ।

८-दर्शनज्ञानमेवादर्शनमिति केचिदभिदधति। इत्येते शास्त्रगता विकल्पाः। तत्र विकल्पबहुत्वमेतत्सर्वपुरुषाणां गुणानां संयोगे साधारणविषयम्॥२३॥

व्या० भा० अ० स्वामी पुरुष, दर्शन (तत्त्वज्ञान) के लिए दृश्यरूपी स्व से संयुक्त है। उस संयोग से दृश्य की जो उपलब्धि होती है (ज्ञान होता है) वह 'भोग' कहलाता है। जो तो द्रष्टा के स्वरूप की उपलब्धि ज्ञान है, वह 'अपवर्ग' कहलाता है। दर्शनकार्य की समाप्ति होने पर संयोग का अवसान होता है इसलिए 'दर्शन' को वियोग का कारण कहा गया है। दर्शन, अदर्शन का विरोधी है, अत: 'अदर्शन' को संयोग का कारण कहा गया है। यहाँ 'दर्शन' मोक्ष का कारण नहीं कहा गया है। अदर्शन (अज्ञान) के अभाव से ही बन्ध का अभाव होता है, वह 'मोक्ष' है। दर्शन के होने पर बन्धकारण जो अदर्शन है उसका नाश होता है इसलिए दर्शन (ज्ञान) को कैवल्य का कारण कहा गया है। यह 'अदर्शन' क्या है ?

(१) क्या (सत्त्व, रजस्, तमस्) गुणों का अधिकार (अर्थात् कार्य को उत्पन्न करने का जो सामर्थ्य है, वह अदर्शन) है ? अथवा

(२) द्रष्टा स्वामी के प्रति शब्दादि विषयों को दिखाने वाले प्रधान चित्त का प्रकट न होना अर्थात् दृश्य के स्वरूप के विद्यमान रहने पर भी (दोनों स्वरूप का) जो यथार्थ ज्ञान का अभाव है, क्या वह अदर्शन है ?

(३) क्या गुणों की अर्थवत्ता अर्थात् भोगापवर्ग के सम्पादन में युक्त रहना (प्रवृत्त रहना अदर्शन) है ?

(४) अथवा स्वचित्त के साथ (प्रलयकाल में) निरुद्ध एवं (सर्गकाल में) बने चित्त की अभिव्यक्ति का कारण जो अविद्या है, वही अदर्शन है ?

(५) किंवा स्थिति (प्रलय) संस्कारों के क्षीण होने पर गति (सृष्टिकाल के) संस्कार की अभिव्यक्ति अदर्शन है ? जिसके विषय में कहा गया है कि प्रधान स्थिति में रहने पर विकारों के न करने के कारण प्रधान नहीं कहलायेगा। उसी प्रकार गति में ही रहने पर विकारों के नित्य होने से प्रधान नहीं कहलायेगा। (स्थितिगत इन) दोनों प्रकार से इसकी प्रवृत्ति के रहने पर यह प्रधान कहलाता है। अन्यथा (अर्थात् अन्य प्रकार से रहने पर) प्रधान कहला नहीं सकता। अन्य कारणों की कल्पना करने पर भी यही बात रहेगी (अर्थात् परमाणु से सृष्टि मानने पर भी यही स्थिति रहेगी)।

(६) दर्शनशक्ति (बुद्धि) ही अदर्शन है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। "प्रधान की प्रवृत्ति अपने को ख्यापित करने के लिए है" इस श्रुति के अनुसार (वे ऐसा मानते हैं)। इसलिए कि सब ज्ञेयों को जानने में समर्थ पुरुष (प्रधान = बुद्धि की) प्रवृत्ति से पूर्व नहीं देखता। सब कार्यों को करने में समर्थ दृश्य तब (बुद्धि की प्रवृत्ति से पूर्व ) नहीं दिखाई देता।

(७) कुछ लोग मानते हैं कि अदर्शन द्रष्टा व दृश्य इन दोनों का ही धर्म है। इन दोनों में से अदर्शन, दृश्य का निजी धर्म होने पर भी पुरुष ज्ञान की अपेक्षा से (पुरुषाधीन होने के कारण) ही दृश्य धर्म के रूप में होता है। इसी प्रकार अदर्शन पुरुष का निजी धर्म न होने पर भी दृश्यज्ञान की अपेक्षा से (दृश्य बुद्धिवृत्ति के ज्ञान की अपेक्षा के कारण) पुरुष धर्मरूप से अवभासित होता है। 

(८) दर्शन ज्ञान ही अदर्शन है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं। अदर्शन के विषय में ये शास्त्रगत आठ पक्ष हैं। उन बहुत विकल्पों में, सब पुरुषों का, (जीव के साथ) गुणों के संयोग के विषय में समान मत है॥२३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में स्व-स्वामी के स्वरूप की उपलब्धि का कारण संयोग बतलाया है। 'स्व' शब्द से प्रकृति और उससे उत्पन्न पदार्थों का ग्रहण होता है। 'स्वामी' शब्द से जीवात्मा का ग्रहण होता है।

अज्ञानता के कारण व्यक्ति मन, इन्द्रियों, शरीर आदि के द्वारा विषय भोग में लिप्त होता है तो वह दृश्य की उपलब्धि है। उसका नाम 'भोग' है। जब शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म और शुद्धोपासना से अपना और ईश्वर का साक्षात्कार करता है तो वह पुरुष के स्वरूप की उपलब्धि है, उसका नाम 'मोक्ष' है। वास्तविक ज्ञान से अर्थात् प्रकृति, विकृति, आत्मा और परमात्मा के ज्ञान से संयोग का नाश होता है। इसलिये वास्तविक ज्ञान संयोग का नाशक माना जाता है। विशुद्ध ज्ञान अज्ञान का विरोधी है और अज्ञान संयोग का कारण है। जब शुद्ध ज्ञान से अज्ञान का नाश हो जाता है तब मोक्ष की सिद्धि हो जाती है। यहाँ पर ज्ञान का तात्पर्य प्रकृति, जीवात्मा और ईश्वर के स्वरूप का साक्षात्कार करना है अर्थात् व्यावहारिक रूप से जानना है, शाब्दिक रूप से नहीं। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि केवल ज्ञान से मुक्ति नहीं होती। शुद्ध निष्काम कर्म और शुद्धोपासना ये भी मुक्ति के अनिवार्य साधन हैं।

वेद में मुक्ति के तीन साधन माने हैं।

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभय्ँ सह।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥ यजुः ४० /१४॥

भावार्थ - जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ साथ ही जानता है वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तरके विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। (सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास) शुद्ध ज्ञान-कर्म-उपासना से तीन पदार्थों का वास्तविक ज्ञान, उससे अशुद्ध ज्ञान-कर्म-उपासना की निवृत्ति और समस्त दुःखों का विनाश तथा नित्यानन्द की प्राप्ति होती है। यह मोक्ष का स्वरूप है। जीवात्मा केवल अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके मुक्त नहीं हो सकता। अज्ञान का नाश ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से होता है, केवल जीवात्मा के अपने ज्ञान से नहीं। केवल ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति ही मोक्ष नहीं है, किन्तु ज्ञान, आनन्द और स्वतन्त्रता की प्राप्ति मोक्ष है। मुक्ति का देने वाला ईश्वर है। जीवात्मा स्वयं मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता। जिस अज्ञान को बन्धन का कारण माना जाता है, उसके स्वरूप को जानना आवश्यक है। अज्ञान के स्वरूप को जानने के लिये अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से प्रयास किया है।

(१) जब सत्त्वादि गुण आत्मा के भोग और अपवर्ग को सिद्ध करने में प्रवृत्त रहते हैं, क्या इसका नाम 'अज्ञान' है ?

(२) द्रष्टा = स्वामी = आत्मा का जो देखने का विषय प्रधान चित्त है, उसकी उत्पत्ति का न होना अज्ञान है ? अर्थात् जिस चित्त के द्वारा आत्मा, प्रकृति और पुरुष का विवेक प्राप्त करता है, उसका उत्पन्न न होना 'अज्ञान' है।

 (३) क्या सत्त्वादि गुणों की भोगापवर्गरूप प्रयोजनवत्ता 'अज्ञान' है ?

(४) क्या अपने चित्त के साथ निरुद्ध हुई अविद्या जो अपने चित्त की पुनः उत्पत्ति का कारण है वह 'अज्ञान' है ?

(५) क्या प्रलय की स्थिति समाप्त होने पर सृष्टि की स्थिति का बना रहना 'अज्ञान' है ? प्रकृति की दो अवस्थायें हैं। एक है साम्यावस्था - प्रलय। दूसरी है विषमावस्था सृष्टि। इन दोनों अवस्थाओं के होने से प्रकृति को सृष्टि का उपादान कारण माना जाता है।

(६) कुछ लोगों का यह मत है कि दर्शनशक्ति ही अज्ञान है। प्रधान की प्रवृत्ति अपने स्वरूप को जनाने के लिये होती है। उसकी प्रवृत्ति अर्थात् सृष्टि के बिना प्रकृति का स्वरूप जीवात्मा के द्वारा नहीं जाना जाता, इसका नाम 'अज्ञान' है।

(७) कुछ लोगों का यह मत है कि प्रकृति और जीवात्मा दोनों का ही धर्म 'अज्ञान' हैं। 

(८) कुछ लोगों का यह मत है कि शब्दादि विषयों का ज्ञान ही 'अज्ञान' है।

इन आठ में से चौथी मान्यता में अज्ञान का स्वरूप स्पष्ट है और यही बन्धन का कारण है। योगदर्शनकार ने अगले २४ वें सूत्र में इसी को कहा है कि 'तस्य हेतुरविद्या' जिस संयोग से जीव का बन्धन होता है, उसका कारण 'अविद्या' है। बुद्धि आदि प्राकृतिक पदार्थों के साथ अज्ञानपूर्वक सम्बन्ध और उनका अनुचित प्रयोग बन्धन का कारण है, केवल विषय सुख अर्थात् भोग विलास के लिये प्रयोग करना, ‘अनुचित प्रयोग' कहा जाता है। ज्ञानपूर्वक सम्बन्ध और उचित प्रयोग मोक्ष का कारण है। ईश्वर साक्षात्कार करने करवाने के लिए प्रयोग करना 'उचित प्रयोग' कहा जाता है।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि बन्ध और मोक्ष प्रकृति के होते हैं, जीवात्मा के नहीं। यह मान्यता ठीक नहीं है। क्योंकि प्रकृति जड़ होने से बन्ध और मोक्ष का अनुभव नहीं कर सकती। जीवात्मा चेतन होने से बन्ध - मोक्ष का अनुभव कर सकता है। जीवात्मा प्रकृति से बने पदार्थों के साथ अज्ञानपूर्वक व्यवहार करता है तो बन्धन को प्राप्त होता है, प्रकृति नहीं।

रूपैः सप्तभिरात्मानं बध्नाति प्रधानं कोशकारवद्विमोचयत्येकेन रूपेण॥सांख्य० ३/७३॥

भावार्थ - प्रकृति जीवात्मा को सात प्रकार से बाँधती है, कोशकार (रेशम का कीड़ा) के समान और एक प्रकार ( तत्त्वज्ञान) से मुक्त करती है। यहाँ आत्मा शब्द से जीवात्मा का ग्रहण होता है, प्रकृति का नहीं।

(क) प्रकृति और पुरुष का संयोग दो प्रकार का होता है (१) अज्ञानपूर्वक (२) ज्ञानपूर्वक। इन संयोगों के कारण क्या हैं, यह जानना आवश्यक है। माता, पिता, आचार्य, समाज, राजा, शिक्षाप्रणाली, पूर्वजन्म के अशुभ संस्कार और केवल विषय भोगों को ही लक्ष्य बना करके चलना आदि अज्ञानपूर्वक संयोग के कारण हैं। इससे व्यक्ति बन्धन को प्राप्त होता है।

(ख) इन सबके ठीक होने से जीवात्मा का प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थों के साथ ज्ञानपूर्वक संयोग होता है। इससे व्यक्ति मोक्ष का भागी बनता है।

(ग) अज्ञानयुक्त इस संयोग की परम्परा को दूर करके ज्ञानयुक्त परम्परा को सञ्चालित करना चाहिये।

'उपदेश्योपदेष्टृत्वात् तत्सिद्धिः, इतरथा ह्यन्धपरम्परा॥ सांख्यदर्शन सूत्र ३-७९, ८१॥

भावार्थ - उच्च कोटि के शिष्य तथा तत्त्ववेत्ता गुरु होते हैं तो प्रकृति पुरुष का संयोग ज्ञानपूर्वक होता है। अन्यथा भोग की अंधपरम्परा चलती रहती है॥२३॥

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