इस सूत्र में यह बतलाया है कि कृतकृत्य पुरुष के लिये दृश्य- नष्ट जैसा होने पर भी अन्य पुरुषों के लिये प्रयोजन वाला होने से नष्ट जैसा नहीं है।जो व्यक्ति योगाभ्यास करते-करते ईश्वर साक्षात्कार तक पहुँचकर मुक्ति का अधिकारी बन जाता है, उसके लिये यह संसार 'प्रयोजनहीन' हो जाता है। परन्तु जिन जीवात्माओं ने अभी तक भोग और मोक्ष को सिद्ध नहीं किया है, उनके लिये इसकी सार्थकता बनी रहती है। अर्थात् उनके लिये भोग और मोक्ष को सिद्ध करने का सामर्थ्य सांसारिक पदार्थों में बना रहता है। इसी कारण से जीवात्मा और बुद्धि आदि प्रकृति से उत्पन्न पदार्थों का संयोग प्रवाह से अनादि है। पूर्व सृष्टि में जो बुद्धि शरीर आदि उपकरण जीवात्मा के थे, वे प्रलय अवस्था में नष्ट हो गये। उसको ईश्वर ने उसी प्रकार के साधन इस सृष्टि में दिये हैं। यदि जीवात्मा इस सृष्टि काल में अथवा आने वाली अनेक सृष्टियों में मोक्ष को प्राप्त न करे तो उसके साथ उन बुद्धि आदि साधनों का सम्बन्ध प्रवाह से चलता रहेगा। जीव का बुद्धि आदि के साथ सृष्टि में संयोग होना, प्रलय में वियोग होना प्रवाह से अनादि कहलाता है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण ये तीनों अनादि हैं। जीवात्मा का सत्त्वादि तीन गुणों एवं इनसे उत्पन्न बुद्धि, अहंकार, मन आदि के साथ सम्बन्ध प्रवाह से अनादि है। यद्यपि मोक्षकाल में यह संयोग समाप्त हो जाता है, परन्तु मुक्ति से पुनरावृत्ति होने पर यह पुनः प्रवृत्त हो जाता है। अर्थात् जीवात्मा के शुभ-अशुभ कर्मानुसार ईश्वर इस संयोग की स्थापना कर देता है।
यह संयोग प्रवाह से अनादि और अनन्त है। प्रत्येक योगाभ्यासी को यह जानना चाहिये कि बुद्धि, शरीर आदि समस्त पदार्थ ईश्वरकृत हैं और इनका व मेरा सम्बन्ध अनित्य है अत: शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि कर लेनी चाहिये। क्योंकि जो व्यक्ति इन सांसारिक पदार्थों को ईश्वर के न मानकर अपने मानता है और इनके साथ अपना सम्बन्ध भी नित्य मानता है। वह बन्धन का भागी होता है। इसलिये समस्त पदार्थों को ईश्वरकृत मानकर, उनके साथ अपने सम्बन्ध को अनित्य जानकर, ईश्वरप्राप्ति को लक्ष्य बनाने से व्यक्ति कृतार्थ होता है, अन्यथा नहीं॥२२॥