Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 22

2/22
Sutra
कृतार्थं प्रति नष्टं अप्यनष्टं तद्, अन्यसाधारणत्वात् ।। २.२२ ।।

Bhashya

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Inception

अव० - तत्स्वरूपं तु पररूपेण प्रतिलब्धात्मकं भोगापवर्गार्थतायां कृतायां पुरुषेण न दृश्यत इति। स्वरूपहानादस्य नाशः प्राप्तः। न तु विनश्यति। कस्मात् ?

अर्थ - दृश्य का स्वरूप अन्य (जीवात्मा) के कारण अपने अस्तित्व को प्राप्त करने वाला (पुरुष के) भोगापवर्ग चरितार्थ होने पर पुरुष के द्वारा नहीं देखा जाता। इसलिए स्वरूप की स्थिति न होने से इस (दृश्य) का नाश प्राप्त होता है परन्तु वह विनष्ट नहीं होता है। क्यों ?

Word Meaning

कृतार्थम्प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥२२॥

शब्दार्थ - (कृतार्थम्-प्रति) जिस जीवात्मा का भोग और अपवर्ग प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, उसके लिये (नष्टम्) नष्ट हुआ जैसा (अपि) भी (अ-नष्टम्) नष्ट नहीं होता (तद्-अन्यसाधारणत्वात्) उस कृतार्थ पुरुष से भिन्न पुरुषों के लिये सामान्य रूप से भोग और अपवर्ग की सिद्धि कराने वाला होने से।

सूत्रार्थ - कृतार्थ जीवात्मा के लिये नष्ट हुआ जैसा भी दृश्य नष्ट नहीं होता, अन्य अकृतार्थ जीवात्माओं के लिये सामान्य रूप से भोग और अपवर्ग की सिद्धि कराने वाला होने से।

Vyas Bhashya

कृतार्थमेकं पुरुषं प्रति दृश्यं नष्टमपि नाशं प्राप्तमप्यनष्टं तदन्यपुरुषसाधारणत्वात्। कुशलं पुरुषं प्रति नाशं प्राप्तमप्यकुशलान्पुरुषान्प्रति न कृतार्थमिति तेषां दृशेः कर्मविषयतामापन्नं लभत एव पररूपेणात्मरूपमिति। अतश्च हग्दर्शनशक्त्योर्नित्यत्वादनादिः संयोगो व्याख्यात इति। तथा चोक्तम्-"धर्मिणामनादिसंयोगाद्धर्ममात्राणामप्यनादिः संयोग " इति॥२२॥

व्या० भा० अ० - कृतार्थ एक पुरुष के प्रति दृश्य नष्ट नाश को प्राप्त भी (यह) नष्ट नहीं हुआ - उस (मुक्त) पुरुष से अन्यों के द्वारा समान रूप से धारण किये जाने से अर्थात् उपयोगी होने से। कुशल पुरुष के प्रति नाश को प्राप्त भी अकुशल (बद्ध) पुरुषों के प्रति कृतार्थ नहीं हुआ है अतः उन (बद्ध पुरुषों) की दर्शन क्रिया का कर्म विषय बना हुआ है। पररूप जीवात्मा के स्वरूप के द्वारा आत्मस्वरूप को प्राप्त करता है। और इसलिए दृक्शक्ति (पुरुष), दर्शनशक्ति (बुद्धि आदि) के ( प्रवाह से) नित्य होने से (इनका) संयोग (प्रवाह से) अनादि है - ऐसी व्याख्या की गई है। और ऐसा भी कहा है कि धर्मियों (सत्त्वादि गुणों) के (पुरुष के साथ) अनादि संयोग के कारण (बुद्धि आदि) धर्मों का भी संयोग ( प्रवाह से ) अनादि है॥२२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि कृतकृत्य पुरुष के लिये दृश्य- नष्ट जैसा होने पर भी अन्य पुरुषों के लिये प्रयोजन वाला होने से नष्ट जैसा नहीं है।जो व्यक्ति योगाभ्यास करते-करते ईश्वर साक्षात्कार तक पहुँचकर मुक्ति का अधिकारी बन जाता है, उसके लिये यह संसार 'प्रयोजनहीन' हो जाता है। परन्तु जिन जीवात्माओं ने अभी तक भोग और मोक्ष को सिद्ध नहीं किया है, उनके लिये इसकी सार्थकता बनी रहती है। अर्थात् उनके लिये भोग और मोक्ष को सिद्ध करने का सामर्थ्य सांसारिक पदार्थों में बना रहता है। इसी कारण से जीवात्मा और बुद्धि आदि प्रकृति से उत्पन्न पदार्थों का संयोग प्रवाह से अनादि है। पूर्व सृष्टि में जो बुद्धि शरीर आदि उपकरण जीवात्मा के थे, वे प्रलय अवस्था में नष्ट हो गये। उसको ईश्वर ने उसी प्रकार के साधन इस सृष्टि में दिये हैं। यदि जीवात्मा इस सृष्टि काल में अथवा आने वाली अनेक सृष्टियों में मोक्ष को प्राप्त न करे तो उसके साथ उन बुद्धि आदि साधनों का सम्बन्ध प्रवाह से चलता रहेगा। जीव का बुद्धि आदि के साथ सृष्टि में संयोग होना, प्रलय में वियोग होना प्रवाह से अनादि कहलाता है। सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण ये तीनों अनादि हैं। जीवात्मा का सत्त्वादि तीन गुणों एवं इनसे उत्पन्न बुद्धि, अहंकार, मन आदि के साथ सम्बन्ध प्रवाह से अनादि है। यद्यपि मोक्षकाल में यह संयोग समाप्त हो जाता है, परन्तु मुक्ति से पुनरावृत्ति होने पर यह पुनः प्रवृत्त हो जाता है। अर्थात् जीवात्मा के शुभ-अशुभ कर्मानुसार ईश्वर इस संयोग की स्थापना कर देता है।

यह संयोग प्रवाह से अनादि और अनन्त है। प्रत्येक योगाभ्यासी को यह जानना चाहिये कि बुद्धि, शरीर आदि समस्त पदार्थ ईश्वरकृत हैं और इनका व मेरा सम्बन्ध अनित्य है अत: शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि कर लेनी चाहिये। क्योंकि जो व्यक्ति इन सांसारिक पदार्थों को ईश्वर के न मानकर अपने मानता है और इनके साथ अपना सम्बन्ध भी नित्य मानता है। वह बन्धन का भागी होता है। इसलिये समस्त पदार्थों को ईश्वरकृत मानकर, उनके साथ अपने सम्बन्ध को अनित्य जानकर, ईश्वरप्राप्ति को लक्ष्य बनाने से व्यक्ति कृतार्थ होता है, अन्यथा नहीं॥२२॥

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