तत्राकाशवाय्वग्न्युदकभूमयो भूतानि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्राणामविशेषाणां विशेषाः। तथा श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बुद्धीन्द्रियाणि। वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि। एकादशं मनः सर्वार्थम्, इत्येतान्यस्मितालक्षणस्याविशेषस्य विशेषाः। गुणानामेष षोडशको विशेषपरिणामः।
षडविशेषाः। तद्यथा शब्दतन्मात्रं स्पर्शतन्मात्रं रूपतन्मात्रं रसतन्मात्रं गन्धतन्मात्रं चेत्येकद्वित्रिचतुष्पञ्चलक्षणाः शब्दादयः पञ्चाविशेषाः, षष्ठश्चाविशेषोऽस्मितामात्र इति। एते सत्तामात्रस्यात्मनो महतः षडविशेषपरिणामाः। यत्तत्परमविशेषेभ्यो लिङ्गमात्रं महत्तत्त्वं तस्मिन्नेते सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय विवृद्धिकाष्ठामनुभवन्ति, प्रतिसंसृज्यमानश्च तस्मिन्नेव सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय यत्तन्निःसत्तासत्तं निःसदसन्निरसदव्यक्तमलिङ्गं प्रधानं तत्प्रतियन्ति। एष तेषां लिङ्मात्रः परिणामो निःसत्तासत्तं चालिङ्गपरिणाम इति।
अलिङ्गावस्थायां न पुरुषार्थो हेतुः। नालिङ्गावस्थायामादौ पुरुषार्थता कारणं भवतीति न तस्याः पुरुषार्थता कारणं भवति। नासौ पुरुषार्थकृतेति नित्याख्यायते। त्रयाणां त्ववस्थाविशेषाणामादौ पुरुषार्थता कारणं भवति। स चार्थो हेतुर्निमित्तं कारणं भवतीत्यनित्याख्यायते। गुणास्तु सर्वधर्मानुपातिनो न प्रत्यस्तमयन्ते नोपजायन्ते। व्यक्तिभिरेवातीतानागतव्ययागमवतीभिर्गुणान्वयिनीभिरुपजननापायधर्मका इव प्रत्यवभासन्ते। यथा देवदत्तो दरिद्राति। कस्मात् ? यतोऽस्य म्रियन्ते गाव इति। गवामेव मरणात्तस्य दरिद्रता न स्वरूपहानादिति समः समाधिः।
लिङ्गमात्रमलिङ्गस्य प्रत्यासन्नं तत्र तत्संसृष्टं विविच्यते, क्रमानतिवृत्तेः। तथा षडविशेषा लिङ्गमात्रे संसृष्टा विविच्यन्ते, परिणामक्रमनियमात्। तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते, तथा चोक्तं पुरस्तात्। न विशेषेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्तीति विशेषाणां नास्ति तत्त्वान्तरपरिणामः। तेषां तु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्यायिष्यन्ते॥१९॥
व्या० भा० अ० - उनमें से आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा भूमि, (पाँच) भूत हैं, वे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धतन्मात्रा नामक अविशेषों के विशेष (पर्व) हैं। इसी प्रकार श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, जिह्वा, घ्राण (पाँच) ज्ञानेन्द्रियाँ। वाक्, हाथ, पांव, मलेन्द्रिय, मूत्रेन्द्रिय (पाँच) कर्मेन्द्रियाँ। ग्यारहवाँ मन सर्वार्थ (उभयेन्द्रिय) है ये अस्मिता लक्षण वाले अहंकार नामक अविशेष के विशेष हैं। सोलह का यह (समूह) गुणों का 'विशेष परिणाम' है।
छः 'अविशेष' हैं। जैसे कि शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र ये एक, दो, तीन, चार, पञ्च लक्षण वाले शब्दादि पाँच अविशेष हैं, षष्ठ अविशेष 'अस्मिता मात्र' है। ये सत्तामात्र महत्तत्व के छः अविशेष परिणाम हैं। जो वह अविशेषों से परे लिङ्गमात्र महत्तत्व उस सत्तामात्र महत्तत्व में रहकर विवृद्धि की पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। और प्रलय को प्राप्त होते हुए उसी सत्तामात्र महत्तत्व में अवस्थित होकर अभिव्यक्ति और अभाव से रहित, अभिव्यक्ति और अभाव से विलक्षण, भावात्मक, अव्यक्त, अलिङ्ग प्रधान में लीन हो जाते हैं। यह उन (गुणों) का लिङ्गमात्र परिणाम है और निः सत्तासत्त अनभिव्यक्त, भावरूप स्थिति 'अलिङ्ग परिणाम' है।
अलिङ्गावस्था में पुरुषार्थ (भोगापवर्ग) हेतु नहीं है। अलिङ्गावस्था में आदि में पुरुषार्थता हेतु नहीं होती। इसलिये अलिङ्गावस्था का पुरुषार्थ कारण नहीं होता, पुरुषार्थ के लिये न होने से वह नित्य कही जाती है। तीनों अवस्था विशेषों की उत्पत्ति में पुरुषार्थता कारण होती है। और वह अर्थ (प्रयोजन) हेतु, निमित्त, कारण होता है इस कारण (वे अवस्थाएँ) अनित्य कही जाती हैं। गुण तो सब धर्मों में रहने वाले होने के कारण न प्रलीन होते हैं, न उत्पन्न होते हैं। गुणों में रहने वाली अतीत, अनागत और व्यय आगम वाली अभिव्यक्तियों द्वारा ही उपजनापाय धर्म वाले जैसे प्रतीत होते हैं। जैसा कि देवदत्त दरिद्र बन गया है। किसलिए ? क्योंकि इसकी गौएँ मर गई हैं। गौओं के ही मरने से उसकी दरिद्रता है, स्वरूप के नाश से नहीं। इसी प्रकार गुण के उपजनापाय धर्मों से गुणों के स्वरूप में कोई हानि नहीं होती। यह समाधान समान है।
लिङ्गमात्र अलिङ्ग का निकटवर्ती (कार्य) है। वहाँ (अलिङ्ग में) अविभक्त वह लिङ्गमात्र क्रम का उल्लङ्घन न करता हुआ पृथक् होता है (भिन्न रूप = कार्यरूप को धारण करता है)। उसी प्रकार छः अविशेष लिङ्ग मात्र में अविभक्त रहते हुए परिणाम के क्रम का उल्लङ्घन न करते हुए भिन्न रूप को धारण करते हैं। उन अविशेषों में भूत, इन्द्रिय संसृष्ट (सम्बद्ध) होते हुए पृथक् होते हैं (अर्थात् कार्यरूप को धारण करते हैं)। और इसी प्रकार पूर्व कह दिया है। विशेषों से परे कोई तत्त्वान्तर नहीं है अतः विशेषों का तत्त्वान्तर परिणाम नहीं होता। उनके धर्म, लक्षण अवस्था परिणामों का व्याख्यान करेंगे॥१९॥