इस सूत्र में दृश्य का स्वरूप बतलाया है। प्रकाश स्वभाव वाला सत्त्वगुण, क्रिया स्वभाव वाला रजोगुण और स्थिति स्वभाव वाला तमोगुण है। ये तीन द्रव्य हैं, किसी द्रव्य के गुण नहीं। इन तीन के समुदाय को ही प्रकृति कहते हैं। ये गुण एक दूसरे से मिलने वाले और पृथक् रहने वाले हैं। अर्थात् तीनों मिलकर रहते हुए भी पृथक्-पृथक् हैं। सृष्टि की रचना में ये मिलकर पदार्थों का उपादान कारण बनते हैं। अर्थात् ईश्वर इन तीनों से सभी पदार्थों की रचना करता है, ये स्वयं सृष्टि नहीं बना सकते। इन तीनों का अङ्गाङ्गी भाव है। कभी कोई गुण अप्रधान और कोई प्रधान रहता है। गौण मुख्य होने पर भी दूसरे से भिन्न अपनी शक्ति वाले होते हैं। तुल्यजातीय और अतुल्यजातीय शक्ति भेद से विद्यमान रहते हैं। अर्थात् सत्त्वगुण जिन द्रव्यों की उत्पत्ति में मुख्य उपादान कारण है और रजोगुण, तमोगुण गौण कारण हैं, वे सत्त्वगुण के तुल्यजातीय पदार्थ हैं और जिन पदार्थों की उत्पत्ति के रजोगुण वा तमोगुण मुख्य उपादान कारण हैं, वे इनके तुल्यजातीय हैं। इसी प्रकार से जिस द्रव्य का जो गौण उपादान कारण है, उसका वह अतुल्यजातीय है। जब जिस गुण की प्रधानता होती है तब वह विशेष रूप से अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति करता है। जब गौण रूप में रहता है तो अनुमान से उसका ज्ञान होता है इन तीनों गुणों में जीवात्मा के भोग और अपवर्ग का सामर्थ्य है; इन के बिना आत्मा इन दोनों प्रयोजनों की सिद्धि नहीं कर सकता। ये जीवात्मा से सम्बद्ध होकर उसका उपकार करते हैं, दूर से नहीं। परन्तु केवल ये गुण भी बिना आत्मा के भोगापवर्ग की सिद्धि नहीं कर सकते। जब तीनों में से एक प्रमुख होता है तो दो उसका अनुकरण करते हैं। इस रूप में इनको 'प्रधान' कहा जाता है। इन तीनों गुणो के समूह का नाम प्रधान, प्रकृति और अव्यक्त भी है।
दूसरा रूप इन गुणों का भूतेन्द्रियात्मक है। 'भूत' शब्द से पृथिवी आदि स्थूलभूत और तन्मात्रा आदि पाँच सूक्ष्मभूतों का ग्रहण होता है। इन तीन गुणों को लेकर ईश्वर समस्त पदार्थों की रचना करता है।स्वयं ये गुण वा प्रकृति किसी पदार्थ की उत्पत्ति नहीं कर सकते। जो लोग यह मानते हैं कि प्रकृति स्वयं संसार की रचना करती है; वे प्रकृति के स्वरूप को अच्छे प्रकार से नहीं जानते। क्योंकि ज्ञानरहित पदार्थ किसी भी पदार्थ की रचना नहीं कर सकता। जो सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान ईश्वर है, वह जीवों के भोग और अपवर्ग की सिद्धि के लिये इस सृष्टि की रचना ज्ञानपूर्वक करता है। भोग और अपवर्ग का यह दृश्य साधन है। इसको केवल भोग का साधन समझना भयंकर भूल है। आजकल संसार में केवल इन्द्रियों के भोग को ही लक्ष्य बनाकर चलने वालों की संख्या बहुत अधिक है। इसी कारण संसार के प्राणी अत्यन्त दुःखी हैं। जब जीवात्मा इन्द्रियों के भोग को ही लक्ष्य बनाकर चलता है, तब वह उसकी भोग की स्थिति है। जब विषय भोगों को छोड़कर ईश्वर के आनन्द को भोगता है तब वह उसकी योग की स्थिति है। जो व्यक्ति आत्मा के स्वरूप को और इन तीन गुणों के स्वरूप को अच्छे प्रकार से नहीं जानता, वह इन गुणों से बने पदार्थों को ही सब कुछ समझता है। आत्मा, परमात्मा के विषय में कुछ नहीं जानने से वह शुभ अशुभ कर्मों को भी मानना छोड़ देता है। और जो कार्य उसके स्वार्थ को सिद्ध करता है उसी को अच्छा मानता है।
कुछ लोगों का यह भी मत है कि जीवात्मा न कर्त्ता है, न भोक्ता है। वास्तव में यह मत ठीक नहीं है क्योंकि स्वयं जड़ पदार्थ न ज्ञानपूर्वक किसी पदार्थ की रचना कर सकते हैं और न उनका भोग कर सकते हैं। भूमि, जल, भवन आदि जड़ पदार्थ उद्देश्य बनाकर बुद्धिपूर्वक किसी भी कार्य को नहीं कर सकते और न पदार्थों का भोग कर सकते हैं। यह प्रकृति और इससे बनी सृष्टि ज्ञान, कर्म, उपासना का साधन है। जीवात्मा सृष्टि के पदार्थों से कर्म करता है और शुभ अशुभ कर्मों का फल ईश्वर की व्यवस्था से भोगता है।
यहाँ व्यास भाष्य में सत्त्वादि गुणों (गुणों से बने अहंकार, इन्द्रिय आदि पदार्थों) को 'कर्त्ता' कहा है। और जीव को 'अकर्ता एवं साक्षी' नाम से कहा है। इन शब्दों का तात्पर्य ऐसा समझना चाहिये कि जीव अकेला स्वयं किसी कार्य को नहीं कर पाता। इसलिये उसे 'अकर्ता' कहा है। वस्तु देना, लेना, दौड़ना आदि कार्यों का सम्पादन जीवात्मा, अहंकार, मन, इन्द्रियों, शरीर आदि की सहायता से ही कर पाता है। इसलिये सत्त्वादि गुणों (या अहंकार आदि पदार्थों) को इस अर्थ में कर्त्ता कहा है कि कार्य सम्पादन में ये पदार्थ सीधे सहायक होते हैं। जबकि कर्मों की अच्छाई-बुराई या अच्छे-बुरे फल भोगने का उत्तरदायित्व जीवात्मा का ही होता है।
जीवात्मा को 'साक्षी' इसलिये कहा है - क्योंकि वह अपने मन-इन्द्रियों-शरीर आदि के द्वारा सम्पादित किये जाने वाले कर्मों और स्वयं भोगे जाने वाले सुख-दुःखों को स्वयं देखता भी है। इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिये कि कर्त्ता - भोक्ता कोई और है, जीव तो केवल देखता है; देखने के कारण जीव को साक्षी कह दिया गया है। वास्तव में उपर्युक्त विवरण के अनुसार कर्मों का उत्तरदायित्व भी जीव का है, वही अपने कर्मों के फल = (सुख-दुःख) का भोक्ता भी है। और इन सब को वह देखने वाला भी है, इसलिये वह साक्षी भी है।
भोग और अपवर्ग को बुद्धि में वर्त्तमान कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ये दोनों बुद्धि में रहते हैं और जीवात्मा का इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ पर जानना चाहिये कि भोग सांसारिक सुख दुःख है और अपवर्ग मोक्ष अथवा ईश्वर का नित्य आनन्द है। सांसारिक सुखदुःख प्राकृतिक पदार्थों का गुण है और नित्य आनन्द ईश्वर का गुण है। ये दोनों बुद्धि अथवा ज्ञान के द्वारा भोगे जाते हैं। अर्थात् लौकिक सुखदुःख अन्तःकरण रूपी बुद्धि से और मोक्ष का नित्य सुख ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से भोगा जाता है। इसलिये इनको बुद्धिस्थ कहा जाता है। इनके भोगने से जीवात्मा में कुछ घुलता मिलता नहीं। इनका भोग करने पर भी जीवात्मा का स्वरूप शुद्ध ही बना रहता है।
यो० द० १/२४ के व्यासभाष्य में भी यह बात कही है कि "स हि तत्फलस्य भोक्ता " अतः कर्त्ता, भोक्ता जीवात्मा ही है, अन्य नहीं। इसलिये ग्रहण, धारण, ऊहा, अपोह, तत्त्वज्ञान, अभिनिवेश का भी अनुभव करने वाला जीवात्मा ही है। इन शब्दों का अर्थ भाष्यानुवाद में देख लेवें॥१८॥