सर्वस्यायं रागानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनः सुखानुभव इति तत्रास्ति रागजः कर्माशयः। तथा च द्वेष्टि दुःखसाधनानि मुह्यति चेति द्वेषमोहकृतोऽप्यस्ति कर्माशयः। तथा चोक्तम् नानुपहत्य भूतान्युपभोगः संभवतीति हिंसाकृतोऽप्यस्ति शारीरः कर्माशय इति। विषयसुखं चाविद्येत्युक्तम्।
या भोगेष्विन्द्रियाणां तृप्तेरुपशान्तिस्तत्सुखम्। या लौल्यादनुपशान्तिस्तदुःखम्। न चेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कर्तुं शक्यम्। कस्मात् ? यतो भोगाभ्यासमनु विवर्धन्ते रागाः कौशलानि चेन्द्रियाणामिति। तस्मादनुपायः सुखस्य भोगाभ्यास इति। स खल्वयं वृश्चिकविषभीत इवाशीविषेण दष्टो यः सुखार्थी विषयानुवासितो महति दुःखपङ्के निमग्न इति। एषा परिणामदुःखता नाम प्रतिकूला सुखावस्थायामपि योगिनमेव क्लिश्नाति।
अथ का तापदुःखता ? सर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानुभव इति, तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः। सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते, ततः परमनुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचिनोति। स कर्माशयो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते।
का पुनः संस्कारदुःखता ? सुखानुभवात्सुखसंस्काराशयो दुःखानुभवादपि दुःखसंस्काराशय इति। एवं कर्मभ्यो विपाकेऽनुभूयमाने सुखे दुःखे वा पुनः कर्माशयप्रचय इति।
एवमिदमनादि दुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मकत्वादुद्वेजयति। कस्मात् ? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति। यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति नान्येषु गात्रावयवेषु। एवमेतानि दुःखान्यक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव क्लिश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम्।
इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवाविद्यया हातव्य एवाहंकारममकारानुपातिनं जातं जातं बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्तास्त्रिपर्वाणस्तापा अनुप्लवन्ते। तदेवमनादिना दुःखस्त्रोतसा व्यूह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति।
गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः। प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा बुद्धिगुणाः परस्परानुग्रहतन्त्रीभूत्वा शान्तं घोरं मूढं वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवारभन्ते। चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम्। रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुध्यन्ते सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते। एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्ययाः सर्वे सर्वरूपा भवन्तीति, गुणप्रधानभावकृतस्त्वेषां विशेष इति। तस्माद् दुःखमेव सर्वं विवेकिन इति।
तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमविद्या। तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः। यथा चिकित्साशास्त्रं चतुर्व्यूहम् - रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति, एवमिदमपि शास्त्रं चतुर्व्यूहमेव। तद्यथा - संसारः संसारहेतु र्मोक्षो मोक्षोपाय इति। तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः, प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः। संयोगस्यात्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम्। हानोपायः सम्यग्दर्शनम्।
तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं वा हेयं वा न भवितुमर्हति। हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः। उभयप्रत्याख्याने च शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम्॥१५॥
व्या० भा० अ० - प्रत्येक का यह सुखानुभव राग से पूर्ण, चेतन अचेतन साधनों के आधीन है इसीलिये उसमें रागजनित कर्माशय बनता है। इसी प्रकार दुःख साधनों के प्रति द्वेष करता है और मोहित होता है इसलिये द्वेषमोहजनित भी कर्माशय है। और ऐसा कहा भी है- प्राणियों को पीड़ित किये बिना उपभोग संभव नहीं होता इसलिये हिंसा के द्वारा भी सम्पादित शरीर से सम्बद्ध कर्माशय है। और विषयसुख को 'अविद्या' कहा है (अर्थात् विषय सुख को दुःखरहित सुख मानना अविद्याजनित है।
भोगों में इन्द्रियों की तृप्ति से जो उपशान्ति (होती) है, वह 'सुख' है। जो चञ्चलता से अतृप्ति है, वह 'दुःख' है। भोगाभ्यास के द्वारा इन्द्रियों को तृष्णारहित करना संभव नहीं है। क्यों ? क्योंकि भोगाभ्यास के अनन्तर राग बढ़ते हैं और इन्द्रियों की (तद् विषयक) कुशलता बढ़ती है। इसलिये भोग का अभ्यास 'सुख का उपाय' नहीं है। जो सुखार्थी विषयों की वासना से ग्रस्त है, वह वृश्चिक (बिच्छू) के विष से डरा हुआ सर्प के विष से इसे के समान महान् दुःख के कीचड़ में डूबा है। यह अप्रिय स्थिति 'परिणामदुःखता' है, सुखावस्था में भी योगी को ही कष्ट देती है।
तापदुःखता क्या है ? प्रत्येक तापानुभव द्वेष से युक्त चेतन, अचेतन साधनों के आधीन है इसलिये उसमें द्वेषजनित कर्माशय है। और सुख के साधनों को चाहने वाला शरीर से वाणी से और मन से चेष्टा करता है उससे दूसरे (अनुकूल) पर अनुग्रह करता है और (प्रतिकूल का) हनन करता है इसलिये दूसरों पर अनुग्रह वा पीड़ा द्वारा धर्माधर्म का सञ्चय करता है। वह कर्माशय लोभ और मोह से होता है यह 'तापदुःखता' कही गई है।
संस्कारदुःखता क्या है ? सुख के अनुभव से सुख के संस्कारों का आशय, दुःख के अनुभव से भी दुःख संस्कारों का आशय (बनता है)। इस प्रकार कर्मों से फल के अनुभव करने के पश्चात् सुख वा दुःख के होने पर फिर से कर्माशय का सञ्चय होता है।
इस प्रकार यह (प्रवाह से ) अनादि विस्तृत दुःख की धारा प्रतिकूलात्मक होने से योगी को ही संतप्त करती है। क्यों ? विद्वान् (योगी) नेत्र गोलक के समान है। जिस प्रकार ऊन का पतला धागा नेत्रगोलक में डाला हुआ स्पर्श के द्वारा दुःखित करता है गात्र (शरीर) के अन्य अवयवों में डाला हुआ (दुःखित) नहीं (करता) इसी प्रकार ये दुःख (विषयसुख) योगी को क्लेशयुक्त करते हैं, अन्य भोक्ता को नहीं।
अपने कर्मों से उपार्जित बार बार प्राप्त दुःख को छोड़ते हुवे और बार बार छोड़े हुवे दुःख को ग्रहण करते हुवे अन्य व्यक्ति को तो ( प्रवाह से) अनादिकालीन वासना से चित्रित, चारों ओर से अविद्या से अनुविद्ध, चित्तवृत्ति के द्वारा त्याज्य विषय में अहंकार, ममकार से अनुगत उत्पन्न प्रत्येक बाह्य तथा आध्यात्मिक उभय निमित्तिक तीन पर्वों वाले ताप प्राप्त होते हैं। इस प्रकार (योगी अपने को और प्राणिसमूह को) (प्रवाह से) अनादि दुःख स्रोत से घिरे देखकर समस्त दुःखों को क्षीण करने के उपायरूपी यथार्थज्ञान की शरण लेता है।
गुणवृत्ति के विरोध से विवेकी के लिये सब दुःख ही है। ज्ञान, क्रिया, स्थिति स्वभाव वाले बुद्धि के गुण परस्पर (एकदूसरे) से मिलकर शान्त, घोर, मूढ़ नामक त्रिगुणात्मक अनुभूति को आरम्भ करते हैं। और गुणों का व्यापार चल (अस्थिर) है इस कारण चित्त को शीघ्र परिणाम को प्राप्त होने वाला कहा गया है। रूपातिशय और वृत्त्यतिशय परस्पर विरुद्ध होते हैं। (रूप अतिशय धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य। वृत्ति अतिशय = शान्त, घोर, मूढ) इनकी सामान्य सत्ता विशेषों के साथ विद्यमान रहती है। इस प्रकार ये गुण एक-दूसरे के आश्रय के द्वारा सुख-दुःख - मोह अनुभूति कराने वाले, सब स्वरूप वाले होते हैं। ये किसी समय प्रधान किसी समय अप्रधान होते हैं। यह इनकी विशेषता है। इसलिये विवेकी के लिये सब दुःख ही हैं।
इस महान् दुःख समुदाय का उत्पत्तिकारण 'अविद्या' है। सम्यग्दर्शन = वास्तविक ज्ञान उसको दूर करने का हेतु है।
जिस प्रकार चिकित्सा शास्त्र रोग, रोग हेतु, आरोग्य, चिकित्सा नामक चार विभाग वाला है। इसी प्रकार यह (योग) शास्त्र भी चार विभाग वाला है। जैसा कि संसार, संसार का हेतु, मोक्ष, मोक्ष का उपाय। उनमें से मोक्ष की दृष्टि से दुःखबहुल संसार हेय है। प्रधान एवं प्रधान से उत्पन्न कार्यसमूह और पुरुष का संयोग हेय का हेतु है। संयोग की पूर्ण रूप से निवृत्ति हान है। यथार्थ ज्ञान हान का उपाय है।
उन में से हाता (त्याग करने वाले) का स्वरूप न हेय है, न उपादेय। हेय (मानें तो) उस (जीवात्मा) का उच्छेदवाद (अनित्यत्व) उपस्थित होता है। उपादान (ग्रहण पक्ष) को मानें तो हेतुवाद (उपादान) का प्रसङ्ग उपस्थित होता है। (अर्थात् जीवात्मा का उपादान कारण मानना पड़ेगा) और दोनों वादों को निरस्त करने पर ( जीवात्मा का) नित्यत्व सिद्ध होता है। यह सम्यग्दर्शन का स्वरूप है॥१५॥