इस सूत्र में पुण्य से उत्पन्न जाति, आयु और भोग सुख देने वाले और अपुण्य से उत्पन्न दुःख देने वाले बताये हैं। जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव तथा वेदानुकूल और ऋषिकृत ग्रन्थों के अनुसार सुखप्रद एवं दुःखनिवारक हैं, वे पुण्यकर्म और इसके विरुद्ध कर्म अपुण्यकर्म हैं। पुण्य कर्मों से प्राप्त जाति, आयु, भोग सुख देने वाले होते हैं और अपुण्य से प्राप्त दुःख देने वाले होते हैं। पुण्य कर्म करने वाले जीवों को विद्वान्, धार्मिक सम्पन्न माता - पिता के घर में मनुष्य जन्म मिलता है। वहाँ पर जाति, आयु, भोग सुखप्रद होते हैं। अपुण्य कर्म करनेवाले जीवों को पशु आदि जन्म मिलता है। वहाँ पर जाति, आयु, भोग दुःखप्रद होते हैं।
मनुष्य शरीर में स्वतन्त्रता है, उन्नति करने के साधन हैं। अन्य जीवों से सहायता लेने की सुविधा है। ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करके मोक्ष प्राप्त करने का प्रयत्न संभव है। ये स्वतन्त्रता, साधन, सुविधा, प्रयत्न पशु आदि के शरीरों में प्राप्त नहीं हैं। इससे यह बात भी सिद्ध हो गई कि मनुष्य और पशु आदि योनियों में समान सुख - दुःख नहीं हैं। परन्तु पुण्य से प्राप्त जाति, आयु, भोग से मिलने वाला सुख भी योगी के लिये दुःखप्रद ही होता है। सांसारिक सुख क्षणिक और दुःखमिश्रित है। अतः योगी के लिये भोग काल में वह सुख भी प्रतिकूल ही है। इसलिये सांसारिक सुख को भी योगी त्याज्य मानते हैं। इस विषय में सांख्यकार महर्षि कपिल जी ने कहा है कि -
"कुत्रापि कोऽपि सुखी न, तदपि दुःखशबलमिति दुःखपक्षे निक्षिपन्ते विवेचकाः"॥सांख्य० ६/७ -८॥
भावार्थ - संसार में कहीं भी कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी नही हैं। संसार में जो भी सुख उपलब्ध होता है वह दुःखमिश्रित है इसलिये विवेकी लोग उस सुख को भी दुःख की कोटि में सम्मिलित करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि दुःखरहित नित्यसुख के लिये शुद्ध ज्ञान, शुद्ध निष्काम कर्म और शुद्ध उपासना के द्वारा ईश्वर प्राप्ति करनी चाहिये॥१४॥