इस सूत्र में यह बताया है कि अविद्या आदि क्लेशों के होने पर उस कर्माशय का फल जाति, आयु और भोग के रूप में मिलता है। इस प्रसङ्ग में कर्म के स्वरूप को समझना आवश्यक है।
कर्म- जो मन, इन्द्रिय और शरीर में जीव चेष्टा विशेष करता है, सो कर्म कहाता है। वह शुभ, अशुभ और मिश्र भेद से तीन प्रकार का है।। आर्योद्देश्यरत्नमाला - ४८॥
अविद्या आदि के होने पर ही कर्माशय फल देता है। उसके न होने पर नहीं। जैसे एक धान का बीज तुष के रहने पर ही अङ्कुरित होता है उसके न रहने और जल जाने पर नहीं अर्थात् उसका छिलका हो और वह जला न हो जब ही वह बीज उग सकता है, अन्यथा नहीं। वैसे ही जब योगी निर्बीज समाधि तक पहुँच जाता है और उसके क्लेश दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाते हैं, तब कर्माशय फल नहीं देता। परन्तु मुक्ति से पुनरावृत्ति होने पर कर्माशय फल देता है। ऐसा नहीं मानना चाहिये कि योगी के क्लेश दग्धबीजभाव को प्राप्त होने पर कर्म फल नहीं देते।
कर्माशय - कर्माशय (कर्मसमुदाय) के तीन फल हैं - जाति, आयु, भोग ।
जाति = मनुष्य, पशु, पक्षी, कीड़े, मकौड़े आदि का शरीर। आयु = जन्म से लेकर मरणपर्यन्त काल आयु है। यह आयु मनुष्य, पशु, मक्खी आदि प्रत्येक प्राणी की भिन्न-भिन्न है। यह उनके शरीर के आधार पर है। अर्थात् मक्खी - शरीर की अपेक्षा से मनुष्य - शरीर में अधिक समय तक जीवित रहने का सामर्थ्य है। मनुष्य जन्म देने वाले कर्मों से मनुष्य की आयु वाला शरीर मिलेगा और मक्खी के जन्म देने वाले कर्मों से मक्खी की आयु वाला शरीर मिलेगा इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये। आयु शब्द का प्रयोग सूत्र में किया है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि ईश्वर प्राणियों की आयु क्षणों में निश्चित करता है। उस समय से पूर्व न वे मर सकते हैं और न उससे आगे जीवित रह सकते हैं।
कुछ लोग यह कहते हैं कि ईश्वर श्वास निश्चित करता है उनके पूरा होने से पूर्व प्राणी मर नहीं सकता, पूरा होने के पश्चात् जीवित नहीं रह सकता। ये सब मान्यतायें प्रत्यक्षादि प्रमाणों से खण्डित हो जाती हैं। क्योंकि प्रत्येक प्राणी कर्म करने में स्वतन्त्र है। वह स्वयं अपने शरीर का विनाश कर सकता है और दूसरा प्राणी भी एक अन्य प्राणी को मार सकता है अतः सूत्र में पढ़े आयु शब्द का प्रयोग प्राणियों के शरीर सामर्थ्य को बताने के लिये किया है। यहाँ पर यह भी जानना चाहिये कि जब तक अविद्या आदि क्लेश बने रहेंगे तब तक आयु भी मिलती रहेगी। अविद्यादि का नाश होने पर आयु नहीं मिलेगी। भोग = शब्द का अर्थ यद्यपि सुख दुःख भी है परन्तु इस प्रसंग में भोग शब्द का अर्थ ‘सुख दुःख प्राप्ति के साधन' है जैसे कि धन-सम्पत्ति, सोना-चांदी, भोजन-वस्त्र, पुत्रपरिवार आदि।
जन्म के विषय में प्रश्न उठता है कि क्या एक कर्म एक जन्म को देता है अथवा एक कर्म अनेक जन्मों को देता है ? दूसरा प्रश्न यह है कि क्या अनेक कर्म अनेक जन्मों को देते हैं अथवा अनेक कर्म एक जन्म को देते हैं ? यदि एक कर्म एक जन्म को देता है तो कर्म समुदाय बहुत अधिक होने से प्रत्येक कर्म का फल देने का अवसर आना कठिन है। इसलिये यह पक्ष ठीक नहीं है। जब एक कर्म अनेक जन्मों को देता है तो कर्मों की सङ्ख्या अत्यधिक होने से सभी कर्मों को फल देने का अवकाश मिलना कठिन है। अतः यह पक्ष भी ठीक नहीं है। यदि तीसरा पक्ष माना जाता है तो अनेक कर्म एक साथ अनेक जन्म नहीं दे सकते। क्योंकि एक समय में जीवात्मा अनेक शरीरों को धारण नहीं कर सकता। यदि क्रमशः जन्म देते हैं तो पूर्वोक्त दोष आयेगा अर्थात् कर्मों के आधिक्य के कारण उनको अपना फल देना कठिन हो जायेगा। इसलिये अनेक कर्म मिलकर एक जन्म देते हैं, यह चौथा पक्ष ही ठीक है।
इससे यह नहीं समझना चाहिये कि कर्म स्वयं मिलकर जीवों को जन्म देते हैं। क्योंकि कर्म चेतन नहीं हैं। चेतन न होने से वे विचार नहीं कर सकते कि किस जीव के कौन से और कितने कर्म हैं। इसलिये शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ईश्वर जीवों को जन्म देता है। कोई कर्माशय जाति, आयु, भोग तीन फलों को देने वाला होता है, कोई आयु और भोग दो फलों को देने वाला है और कोई एक फल भोग अथवा आयु को देने वाला होता है। अदृष्ट जन्म में फल देने वाला कर्माशय = (अदृष्टजन्मवेदनीय) जाति, आयु और भोग तीन फलों का कारण होता है। इन को इस प्रकार समझ सकते हैं।
जाति - जैसे मनुष्य, गौ, अश्व, कुत्ता, कबूतर, वृक्ष आदि।
आयु - उपर्युक्त शरीर के अनुसार आयु प्राप्त होती है - जैसे मनुष्य की आयु लगभग १०० वर्ष, गौ की २० २५ वर्ष, घोड़े की ३० ३५ वर्ष, कुत्ते की १२ १४ वर्ष, कबूतर की ६ ८ वर्ष, विभिन्न वृक्षों की विभिन्न आयु इत्यादि। -
भोग - शरीर के अनुसार ही ईश्वर ने भोग की व्यवस्था कर रखी है। जैसे मनुष्य खीर, पूरी, मेवा, मिष्ठान्नादि खा सकता है, इसके अनुकूल ही पाचन संस्थान तथा दन्त आदि भी मिलते हैं। इसी प्रकार से वह विविध प्रकार के वस्त्र, आभूषण, यान, भवन आदि का उपयोग भी कर सकता है।
अन्य योनियों (पशु, पक्षियों के शरीरों) मे इस प्रकार की बुद्धि वा शारीरिक संरचना न होने से मनुष्य के समान भोग उपलब्ध नहीं होते। इससे पशु पक्षियों में कुछ तो मांसादि का तथा कुछ फल, घास आदि का भक्षण करते हैं। कुछ ग्राम्य पशु (गौ, घोड़ा, बकरी भेड़ आदि) मनुष्य के यहाँ पालतू बन कर रहते हैं व कुछ जंगली पशु (शेर, भेड़िया आदि) जंगलों में ही रह सकते हैं। पक्षियों में कुछ घोंसले बनाकर, कुछ यों ही शाखाओं पर रहकर ही आँधी वर्षादि में पूरा जीवन बिताने को विवश होते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिए।
इस जन्म में फल देने वाला (दृष्टजन्मवेदनीय) कोई कर्म समुदाय आयु व भोग दोनों फलों को देने वाला होता है। जैसे सात्त्विक धनोपार्जन व सात्त्विक भोजन खाने से आयु व भोग दोनों का बढ़ना। तथैव कोई कर्म समुदाय एक फल भोग अथवा आयु का देने वाला भी होता है - जैसे कि एक व्यक्ति राजसिक - तामसिक पदार्थों को छोंक आदि से चटपटा बनाकर खाता है। यहाँ कर्म समुदाय प्रधान रूप से भोग को बढ़ा रहा है। इसी प्रकार एक व्यक्ति व्यायामादि करता है इससे उसका बल बढ़ता है, पाचन शक्ति तीव्र होती है तथा स्वास्थ्यप्राप्ति होती है। यह प्रधानरूप से आयु की बढ़ाने वाला कर्म है।
दृष्टजन्मवेदनीय अर्थात् इस जन्म में फल देने वाला कर्माशय उपर्युक्त रूप में निश्चित फल वाला होता है तथा अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय निश्चित तथा अनिश्चित दोनों प्रकार के फल देने वाला होता है। जिस कर्म समुदाय का जाति, आयु, भोग निश्चित हो जाता है, उसको नियतविपाक और जिसके जाति, आयु और भोग निश्चित नहीं हुये, वह अनियतविपाक कहा जाता है। अनियतविपाक कर्माशय की तीन गतियाँ मानी जाती हैं। पहली - कुछ कर्म बहुत लम्बे काल के पश्चात् फल देते हैं, कर्मों की इस गति को व्यासभाष्य में 'नाश' के नाम से कहा गया है। दूसरी - किसी प्रधान कर्म के साथ मिलकर कर्म अपना फल दे देता है। तीसरी – जब प्रबल कर्म अपना फल देते हैं तो वह कर्म उनके नीचे दबा रहता है और अनुकूल वातावरण आने पर अपना फल देता है।
वास्तव में कोई भी कर्म बिना फल दिये नष्ट नहीं होता। कर्म और कर्मफल का जानना अि परिश्रमसाध्य है। किस कर्म का क्या, कितना, कब, कैसे फल मिलेगा, इसको पूर्णरूपेण ईश्वर ही जान सकता है। आंशिक रूप में मनुष्य भी जानता है।
आंशिक रूप में जानने से कर्म और कर्मफल पर पूर्ण विश्वास हो जाता है। इससे मनुष्य शुभ कर्मों को श्रद्धापूर्वक करता है और अशुभ कर्मों को छोड़ देता है। शुभ कर्मों के किये बिना अशुभ कर्मो को छोड़ना कठिन है। इसलिये वेद में कहा है।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः।
एवं त्वयि नाऽन्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ यजु० ४०।२।।
भावार्थ - मनुष्य (इह) इस संसार में (कर्माणि) धर्मयुक्त वेदोक्त निष्काम कर्मों को (कुर्वन् एव) करते हुए ही (शतं समाः) सौ वर्ष (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे। (एवम्) इस प्रकार धर्मयुक्त कर्मों को करने वाले (त्वयि नरे) तुझ नर में (कर्म न लिप्यते) अधर्मयुक्त अवैदिक काम्य कर्म लिप्त नहीं होता॥१३॥