Yogdarshanam Paad 2 / Sutra 12

2/12
Sutra
क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ।। २.१२ ।।

Bhashya

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Word Meaning

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥१२॥

शब्दार्थ - (क्लेश-मूलः) अविद्यादि क्लेश हैं मूल = कारण जिस कर्मसमुदाय के वह (कर्माशयः) कर्मसमुदाय (दृष्ट- अदृष्ट- जन्म - वेदनीय: ) वर्त्तमान तथा भावी जन्म में भोग्य फल देने वाला होता है। 

सूत्रार्थ - जिस कर्मसमुदाय के अविद्यादि क्लेश कारण हैं वह कर्मसमुदाय वर्त्तमान तथा भावी जन्म में फल भुगाने वाला होता है।

Vyas Bhashya

तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः लोभमोहक्रोधप्रभवः। स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च। तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतप:समाधिभिर्निर्वर्तित ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति। यथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते। यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिमाणं हित्वा देवत्वेन परिणतः। तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन परिणत इति। तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः। क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति॥१२॥

व्या० भा० अ० - पुण्य पाप कर्माशय काम, लोभ, मोह, क्रोध से उत्पन्न होता है। वह (कर्माशय) वर्त्तमान जन्म में और आगामी जन्म में फल देने योग्य होता है। उनमें से तीव्र वेग से मन्त्र, तप, समाधियों के द्वारा सम्पादित अथवा ईश्वर, देवता, महर्षि महानुभावों की आराधना से सम्पादित वह पुण्य कर्माशय शीघ्र फल को देता है। इसी प्रकार तीव्र क्लेश के द्वारा भीत, रुग्ण, कृपापात्रों वा विश्वस्त महानुभावों अथवा तपस्वियों के प्रति बार - बार किया गया अपकार, वह भी पाप कर्माशय शीघ्र फल देता है। जैसे कि नन्दीश्वर कुमार मनुष्यत्व को छोड़कर देवत्व को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार नहुष देवों का राजा अपनी ऊँची स्थिति को छोड़कर निम्न स्थिति को प्राप्त हुआ। उन में से अत्यन्त निम्न कर्म करने वाले मनुष्यों का कर्माशय वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला नहीं होता। क्षीण क्लेशों वाले तत्त्ववेत्ता योगियों का कर्माशय भी अगले जन्मों में फल देने वाला नहीं होता॥१२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में इस जन्म में फल देने वाले और आगामी जन्म में फल देने वाले कर्मसमुदाय का मूल अविद्या बताया है।

यहाँ पर कर्मों के दो विभाग किये गये हैं - शुभ और अशुभ। जिन कर्मों के करने से स्वयं को और अन्यों को सुख मिले वे 'शुभ कर्म' हैं। जिन कर्मों से स्वयं को और अन्यों को दुःख मिले वे ‘अशुभ कर्म' हैं। इनको ऐसे भी कह सकते हैं कि जो कर्म ईश्वर की आज्ञानुसार हैं, वे शुभ कर्म हैं और जो ईश्वराज्ञा के विरुद्ध हैं, वे अशुभ कर्म हैं। कुछ कर्म ऐसे हैं जिनका फल इसी जन्म में मिलता है और कुछ कर्म ऐसे हैं जिनका फल आगामी जन्म में मिलता है। कुछ कर्मों का फल शीघ्र और कुछ कर्मों का फल विलम्ब से मिलता है। जिन कर्मों का फल इस जन्म में मिलता है, उनको दृष्टजन्मवेदनीय कहते हैं और जिन कर्मों का फल आगामी जन्मों में मिलता है, उनको अदृष्टजन्मवेदनीय कहते हैं।

कर्म स्वयं अपना फल नहीं दे सकते। क्योंकि वे चेतन पदार्थ नहीं हैं। कर्मों का फल ईश्वर देता है, राजा देता है, अन्य मनुष्य भी देते हैं और कर्मकर्त्ता स्वयं भी लेता है। परन्तु जिन कर्मों का फल स्वयं लेता है वा अन्य देते हैं, उनका फल ईश्वर नहीं देता। स्वयं लिये हुए वा अन्यों के द्वारा दिये हुए कर्मों के फल में यदि कुछ कमी रह जाये, तो उसकी पूर्ति ईश्वर कर देता है। जब कर्मों का एक बड़ा भाग मनुष्य वा पशु योनि देने में समर्थ होता है तब उस कर्मसमूह के आधार पर ईश्वर उस जीवात्मा को मनुष्य, पशु आदि योनियों में भेज देता है। शुभ वा अशुभ कर्मों के कारण योनि के रूप में फल देने का कार्य ईश्वर ही कर सकता है अन्य नहीं। चोरी आदि अशुभ कर्म और किसी प्राणी की रक्षा करना आदि शुभ कर्म का फल राजा भी देता है। इस प्रकार से शुभाशुभ कर्मों का फल समाज भी देता है। कुछ कर्मों का फल व्यक्ति स्वयं भी ले लेता है। एक व्यक्ति असत्य भाषण करके उसका दण्ड स्वयं ले लेता है।

मनुष्य शरीर में रहते हुए जीवात्मा उन अशुभ कर्मों को इतनी अधिक मात्रा में करता है कि जिनका फल पशु आदि योनि में भोगना पड़ता है; उन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिलता अर्थात् आगामी जन्म में मिलता है। जो योगी निर्बीज समाधि को प्राप्त करके मोक्ष के अधिकारी बन जाते  हैं। उनका अगला जन्म नहीं होता। किन्तु जब मुक्ति की अवधि समाप्त हो जाती है तब मनुष्य योनि में आकर पूर्व के शेष कर्मों का फल भोगते हैं।

यहाँ एक प्रश्न उठता है कि मुक्ति से पुनरावृत्ति होने पर किन कर्मों के आधार पर मानव शरीर मिलता है और उस जन्म में मिलने वाला भोग किन कर्मों के आधार पर मिलता है ? इसका समाधान - मुक्ति का अधिकारी बनने से पूर्व योगी ने जो शुभाशुभ कर्म किये हैं वे कर्म क्लेशों की दग्धबीजावस्था के कारण इस जन्म में फल नहीं दे सकते। जीवनमुक्तावस्था को प्राप्त योगी के द्वारा भी शरीरधारी होने से अल्पज्ञता एवं असावधानी के कारण कुछ स्वल्प दोष हो जाते हैं। जिनका इस जन्म में फल नहीं मिलता। क्लेशों की दग्धबीजावस्था ही इसमें कारण है। इसी आधार पर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने वेदभाष्य में लिखा है कि "वही (परमेश्वर) मोक्ष पदवी को पहुँचे जीवों को भी महाकल्प के अन्त में फिर पाप पुण्य की तुल्यता से माता-पिता के सम्बन्ध में मनुष्य जन्म कराता है।"

कुछ कर्मों का फल शीघ्र ही मिल जाता है और कुछ का विलम्ब से। जैसे किसी ने अनेक प्राणियों के जीवन की रक्षा की, राजा ने पारितोषिक के रूप में उसको कर्मों का फल तत्काल दे दिया। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति चोरी कर लेता है तो राजा उसको तत्काल दण्ड दे देता है। ये शीघ्र फल के उदाहरण हुए। इसी प्रकार से विलम्ब से मिलने वाले फल भी होते हैं। जैसे-किसी ने राजकीय विभाग में ४० वर्ष तक सेवा की। उसे सेवानिवृत्ति होने पर मासिकपारितोषिक-(पेंशन) मिलता है। यह फल उसे ४० वर्ष तक ( या कहीं पर कम से कम २० वर्ष तक) सेवा करने के पश्चात् मिला है। ऐसे ही किसी चोर की चोरी १० वर्ष तक पकड़ी नहीं गई। १० वर्ष के पश्चात् चोरी पकड़ी जाने पर उसे राजा ने दण्ड दिया। यह फल भी विलम्ब से मिला। इस प्रकार से किन्हीं शुभ अशुभ कर्मों का फल शीघ्र और किन्हीं का विलम्ब से मिलता है।

यहाँ पर यह जानना आवश्यक है कि संसार में जो भी सुख दुःख मिलता है वह अपने ही कर्मों का फल नहीं होता। चोर आदि के द्वारा जो दुःख होता है वह अपने कर्मों का फल नहीं होता। क्योंकि उस दुःख को चोरी करने वाले ने अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिये अपनी ओर से दिया है। इस दुःख का कारण दुःख भोगने वाले का अपना कर्म नहीं है। इसी प्रकार से कोई व्यक्ति न्यायपूर्वक वा अन्यायपूर्वक धन, सम्पत्ति उपार्जित करके किसी को सुख-सुविधायें देता है, सुखी व्यक्ति का वह सुख उसके अपने कर्मों का फल नहीं है। इसलिए जिस जिस ने जितना जितना शुभ अशुभ कर्म किया हो, उसको उतना ही सुख दुःख देना कर्मों का फल है। इसके विरुद्ध अन्य सुख - दुःख अपने कर्मों का फल नहीं अपितु परिणाम तथा प्रभाव के रूप में समझने चाहिए। कर्म का परिणाम, प्रभाव व फल इन में क्या भेद है, इसे निम्नलिखित रूप से समझ सकते हैं ।

कर्म - मन, वाणी और शरीर से जीवात्मा जो विशेष प्रकार की क्रियाएँ करता है, उसे 'कर्म' कहते हैं। जैसे - यज्ञ करना, सत्य बोलना, दान देना, सब के लिये सुख की कामना करना इत्यादि। 

कर्म का परिणाम - किसी भी क्रिया (कर्म) की निकटतम प्रतिक्रिया को 'कर्म का परिणाम' कहते हैं। जैसे - कर्म = यज्ञ करना। परिणाम = वायु की शुद्धि, सुगन्ध प्राप्ति, स्वास्थ्य वृद्धि, रोग निवारण आदि। 

कर्म का प्रभाव - कर्म, कर्म के परिणाम अथवा कर्म के फल को जान कर चेतनों पर जो इन की प्रतिक्रिया होती है, उसे 'कर्म का प्रभाव' कहते हैं। जैसे कर्म = यज्ञ करना। प्रभाव यज्ञ कर्त्ता को प्रसन्नता, आनन्द, शान्ति, उत्तम संस्कार बनना इत्यादि और जिन जिन मनुष्यों को यज्ञ-कर्त्ता के यज्ञ कर्म की सूचना मिलेगी वे सब मनुष्य यज्ञ कर्त्ता को अच्छा व्यक्ति मानेंगे और उन्हें यज्ञ करने की प्रेरणा भी मिलेगी तथा उनकी यजमान के प्रति श्रद्धा बढ़ेगी। यह उन मनुष्यों पर पड़ने वाला यज्ञ - कर्म का 'प्रभाव' है।

कर्म का फल - कर्म के अनुसार कर्म कर्त्ता को जो न्याय पूर्वक सुख दुःख या सुख दुःख के साधन प्राप्त होते हैं उन्हें 'कर्म का फल' कहते हैं। जैसे कर्म = यज्ञ करना। फल = यज्ञ कर्त्ता को पुनर्जन्म में अच्छे, धार्मिक, विद्वान, सदाचारी, सम्पन्न मातापिता के घर में मनुष्य जन्म प्राप्त होना, यह 'कर्म का फल' है।

कर्म का परिणाम और प्रभाव कर्म के कर्त्ता पर भी हो सकता है अथवा अन्यों पर भी हो सकता है।

कर्म का फल न्यायपूर्वक कर्म कर्त्ता को ही मिलता है, अन्य को नहीं। कहीं कहीं सामूहिक कर्मों का सामूहिक फल भी होता है।

जहाँ किसी कर्म कर्त्ता के कर्म से किसी अन्य को अन्याय पूर्वक सुख दुःख मिलता है तो वह कर्म का फल नहीं है बल्कि वह कर्म का परिणाम या प्रभाव है॥१२॥

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