इस सूत्र में क्रियायोग का स्वरूप बतलाया है। क्रियायोग के तीन विभाग हैं - तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान। क्रियायोग का पहला भाग तप है। द्वन्द्वसहन को तप कहते हैं। सुख-दुःख, शीतोष्ण, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मानापमान आदि द्वन्द्वों को सहन करते हुए अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहना चाहिये। प्रायः साधक द्वन्द्वों के उपस्थित होने पर अपने मुख्य कर्त्तव्य को छोड़ देता है और निराशावादी बन जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति धर्ममार्ग को छोड़कर अधर्ममार्ग को स्वीकार करने वाला बन जाता है अथवा अकर्मण्य बन जाता है। धर्माचरण को छोड़ने से अधर्म की प्रवृद्धि होती है और उससे अशुभ संस्कार बनते हैं; जो अधर्मोत्पत्ति के कारण बनते हैं। इसलिये कठिनाइयों को सहते हुए धर्माचरण करते रहना चाहिए। कठिनाइयों के सहने से सहनशक्ति बढ़ती है और उनका सहना सरल हो जाता है। उदाहरण जिस व्यक्ति का प्रातः छह बजे उठने का अभ्यास है यदि उसको योगाभ्यास अथवा किसी कार्यविशेष के लिये चार बजे उठना पड़े तो उसे कठिनाई का अनुभव होता है। परन्तु अभ्यास करते-करते उसी व्यक्ति के लिये चार बजे जागना सरल हो जाता है। इसी प्रकार से सभी उत्तम कार्यों के करने में समझना चाहिए।
तप तीन विभागों में विभाजित है - शारीरिक, वाचनिक और मानसिक। शरीर से शीतोष्णता आदि को सहते हुए चोरी आदि अशुभ कर्मों को छोड़कर सदा शुभ कर्मों को करना शारीरिक तप है। परन्तु तप उतनी ही मात्रा में करना चाहिये कि जिससे शरीर रुग्ण न हो और मानसिक शान्ति बनी रहे। तप के नाम से कुछ लोग भूखे रहते हैं। कुछ लोग शरीर को अग्नि से तपाते हैं। कुछ लोग एक पैर से खड़े रहते हैं। यह तप नहीं है। इससे शरीर अस्वस्थ हो जाता है और मानसिक अशान्ति उत्पन्न होती है। इस अवस्था में व्यक्ति ईश्वरोपासना नहीं कर सकता। यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि विद्या पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना, मन और इन्द्रियों को वश में रखना, निष्काम कर्म करना, योगाभ्यास के लिये दीर्घकालपर्यन्त आसन पर बैठकर वृत्तियों को रोकना और ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करना तप है।
इनमे से वाणी से सत्य, मधुर, हितकारी बोलना वाचनिक तप है। मन से राग, द्वेष, लोभ आदि का परित्याग करना सब के प्रति प्रीति रखना मानसिक तप है। सम्मान प्राप्ति के लिये तप करना लाभप्रद नहीं है। क्योंकि सम्मान प्राप्ति को लक्ष्य बनाने पर साधक योगमार्ग को छोड़कर भोगमार्ग में प्रवृत्त हो जाता है। सात्त्विक तप करने से जन्म-जन्मान्तर की अशुभ वासनायें क्षीण होती हैं और शुभ संस्कारों का निर्माण होता है।
क्रियायोग का दूसरा भाग स्वाध्याय है। मोक्षशास्त्रों = (वेद और वेदानुकूल आर्ष) का पढ़ना-पढ़ाना और प्रणवादि पवित्र मन्त्रों का अर्थसहित जप करना स्वाध्याय है। जो ग्रन्थ ईश्वर, जीव, प्रकृति के यथार्थ स्वरूप का परिज्ञान करवाते हैं। मोक्ष के स्वरूप को, उसके साधनों को, बाधकों को और उसके फल को ठीक प्रकार से बतलाते हैं वे मोक्षशास्त्र कहलाते हैं। प्रणवादि के जप की विधि पूर्व ( योगसूत्र १/२८) में लिख दी है, वहाँ पर देख लेवें।
क्रियायोग का तीसरा भाग ईश्वरप्रणिधान है। ईश्वर की अनन्य भक्ति = मन, वाणी और शरीर से की जाने वाली समस्त क्रियाओं को उसके समर्पित कर देना, उनका कोई लौकिक फल न चाहना। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, धन-सम्पत्ति आदि समस्त पदार्थों को उसका मानकर, उसको समर्पण कर देना, उसी की आज्ञानुसार उन सभी पदार्थों का प्रयोग करना, उसको समस्त पदार्थों से प्रिय समझना, अपना पिता, माता, आचार्य, उपास्य, राजा समझना। शब्द प्रमाण से उसके स्वरूप को अच्छे प्रकार से जानकर उसके मुख्य नाम ओम् का अर्थसहित जप करना ईश्वरप्रणिधान है। ऐसा करने से ईश्वर की ओर से विशेष सहायता मिलती है, जिससे बिना कठिनाई के समाधि की सिद्धि होती है।
इस सूत्र में तीन क्रियाओं को योग कहा है। इससे यह प्रश्न उठता है कि ये तीन क्रिया ही योग है तो वृत्तियों के निरोध को योग क्यों कहते हैं। इसका समाधान यह है कि ये तीनों योग के साधन हैं। इनके अनुष्ठान से वृत्तिनिरोध की सिद्धि होती है। इसलिए साधन और साध्य में अभेद मानकर क्रियायोग को योग नाम से कहा है। इनके आचरण से योग की सिद्धि होती है। अत: इन साधनों को योग कहा है॥१॥