Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 9

1/9
Sutra
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पाः ॥ १.९ ॥

Bhashya

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Word Meaning

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः॥९॥

शब्दार्थ - (शब्द-ज्ञान-अनुपाती) शब्द से उत्पन्न जो ज्ञान उसका अनुपाती = अनुगमन अर्थात् उसके पीछे चलने का जिसका स्वभाव है (वस्तु-शून्यः) जो वस्तु से रहित है (विकल्प:) वह 'विकल्पवृत्ति' है।

सूत्रार्थ - शब्द से उत्पन्न जो ज्ञान, उसका अनुगमन करना जिसका स्वभाव है और जो वस्तु से रहित है, वह 'विकल्पवृत्ति' है।

Vyas Bhashya

स न प्रमाणोपारोही, न विपर्ययोपारोही च। वस्तुशून्यत्वेपि शब्दज्ञानमाहात्म्यनिबन्धनो व्यवहारो दृश्यते। तद्यथा चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति। यदा चितिरेव पुरुषस्तदा किमत्र केन व्यपदिश्यते, भवति च व्यपदेशे वृत्तिः। यथा चैत्रस्य गौरिति। तथा प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रियः पुरुषः, तिष्ठति बाणः स्थास्यति स्थित इति।

गतिनिवृत्तौ धात्वर्थमात्रं गम्यते। तथानुत्पत्तिधर्मा पुरुष इति उत्पत्तिधर्मस्याभाव-मात्रमवगम्यते न पुरुषान्वयी धर्मः। तस्माद्विकल्पितः स धर्मस्तेन चास्ति व्यवहार इति॥९॥

व्या० भा० अ० - यह वृत्ति न प्रमाण के अन्तर्गत आती है और न विपर्यय के अन्तर्गत। वास्तविक अर्थ से रहित होने पर भी शब्दज्ञान की महिमा के कारण इस का व्यवहार देखा जाता है। जैसे कि "चैतन्य पुरुष का स्वरूप है।" जबकि चैतन्य ही पुरुष है तो कौन वस्तु किस वस्तु के द्वारा विशेषित की जा रही है ? (और इस प्रकार) विशेषण विशेष्य का कथन करने पर एक प्रकार की वृत्ति बनती है (अर्थात् ज्ञान होता है)। यह ऐसी ही बनती है जैसे की चैत्र नामक व्यक्ति की गौ कहने पर वृत्ति बनती है। (अर्थात् ज्ञान होता है कि गौ विशेष्य है और चैत्र उसका विशेषण है)। (जैसे चैतन्य पुरुष का स्वरूप है इस उदाहरण में पुरुष में चैतन्य धर्म को युक्त करके कहा जाता है) उसी प्रकार वस्तुधर्म से हीन करके भी कहा जाता है। उदा० - पुरुष निष्क्रिय है। (जैसे पृथिवी परिवर्तन धर्मवाली है जीवात्मा वैसा परिवर्तन धर्म वाला नहीं है)। इसी प्रकार अन्य उदाहरण बाण रुकता है, रुकेगा, रुक गया आदि। ये सब विकल्प वृत्तियाँ हैं।

[ये सब वृत्तियाँ विकल्प क्यों हैं, इस पर विचार करते हैं। देखिए यहाँ गति-निवृत्ति होने पर धात्वर्थ मात्र जाना जाता है। यहाँ बाण में कोई क्रिया नहीं है पुनरपि 'ठहरना स्थित है', इसशब्द से क्रिया जैसा व्यवहार होता है। वैसे ही अनुत्पत्ति धर्म वाला पुरुष है। इस कथन से उत्पत्ति धर्म का अभाव मात्र जाना जाता है। पुरुष में रहने वाला कोई धर्म नहीं जाना जाता। अर्थात् यहाँ पर पुरुष में उत्पत्ति धर्म का निषेध जाना जाता है। पुरुष में रहने वाला कोई धर्म नहीं जाना जाता। यहाँ पुरुष में उत्पत्ति धर्म का अभाव कल्पित किया जाता है और उस कल्पित धर्म (विकल्प) से व्यवहार होता है ]॥९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में विकल्प वृत्ति का स्वरूप बतलाया गया है। 

संसार में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग दो स्वतन्त्र वस्तुओं में देखा जाता है। जैसे देवदत्त की गौ। यहाँ पर देवदत्त और गौ दो पृथक्-पृथक् वस्तु हैं। परन्तु "पुरुष की चेतनता" ऐसा प्रयोग देखा जाता है। इस प्रकार के व्यवहार के होने पर भी पुरुष और उसकी चेतनता दो स्वतन्त्र वस्तु नहीं हैं। यहाँ पर यह ध्यान देने की बात है कि पदार्थ के स्वाभाविक गुण और वह पदार्थ दो पृथक्-पृथक् पदार्थ नहीं होते। यह समझाने के लिए ऐसा कहा जाता है कि ये पदार्थ के गुण हैं और यह गुणी है। यही बात पुरुष की चेतनता में भी समझनी चाहिए कि पुरुष और चेतनता दो पृथक् वस्तु नहीं हैं। यहाँ अभेद में भेद का व्यवहार है। कभी-कभी भेद में अभेद का व्यवहार होता है। जैसे पानी से हाथ जल गया। यहाँ पानी से सम्बद्ध अग्नि से हाथ जला है पानी से नहीं। यह भेद में अभेद व्यवहार है। इस विकल्प वृत्ति का परिज्ञान और इसके निरोध के उपाय भी जान लेने चाहिए।

कभी-कभी योगाभ्यासी यह मान लेता है कि ईश्वर तो निराकार है उसका ध्यान नहीं किया जा सकता, इसलिए उसके आनन्द, ज्ञानादि गुणों का ही ध्यान करना ठीक है। ऐसी वृत्ति ईश्वर और उसके आनन्द, ज्ञानादि गुणों को स्वतन्त्र एवं पृथक्-पृथक् मानने से होती है। यह आनन्द, ज्ञानादि गुण ईश्वर का स्वरूप ही है उससे भिन्न पदार्थ नहीं। इनको पृथक्-पृथक् मानने से विकल्प वृत्ति होती है। इस वृत्ति के स्वरूप को यथावत् न जानने से योगाभ्यासी ईश्वर साक्षात्कार तक नहीं पहुँच पाता, यह योगाभ्यासी की हानि होती है॥९॥

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