Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 7

1/7
Sutra
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ १.७ ॥

Bhashya

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Word Meaning

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥७॥

शब्दार्थ - (प्रत्यक्ष-अनुमान-आगमाः) प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (प्रमाणानि) प्रमाण [वृत्ति का स्वरूप] हैं।

सूत्रार्थ - प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम यह 'प्रमाण वृत्ति' का स्वरूप है। अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम = शब्द प्रमाण, यह 'प्रमाण वृत्ति' है।

Vyas Bhashya

इन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात्तद्विषया सामान्यविशेषात्मनोऽर्थस्य विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षं प्रमाणम्। फलमविशिष्टः पौरुषेयश्चित्तवृत्तिबोधः। बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यामः।

अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वनुवृत्तो भिन्नजातीयेभ्यो व्यावृत्तः संबन्धो यस्तद्विषया सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम्। यथा देशान्तरप्राप्तेर्गतिमच्चन्द्रतारकं चैत्रवत्, विन्ध्यश्चाप्राप्तिरगतिः। आप्तेन दृष्टोऽनुमितो वार्थः परत्र स्वबोधसंक्रान्तये शब्देनोपदिश्यते, शब्दात्तदर्थविषया वृत्तिः श्रोतुरागमः। यस्याश्रद्धेयार्थो वक्ता न दृष्टानुमितार्थः स आगमः प्लवते, मूलवक्तरि तु दृष्टानुमितार्थे निर्विप्लवः स्यात्॥७॥

व्या० भा० अ० - इन्द्रियप्रणाली के द्वारा चित्त का बाह्यवस्तु से सम्पर्क होने के कारण उस विषय वाली (बाह्यवस्तु को विषय बनाने वाली) प्रधानता से सामान्य विशेषात्मक पदार्थ के विशेष धर्म का निश्चय करने वाली वृत्ति 'प्रत्यक्ष प्रमाण' है। उस प्रमाण के समान रूप वाला पौरुषेय बोध (पुरुष का जो ज्ञान, वह) ही प्रत्यक्ष प्रमाण का फल है। (इसी का दूसरा नाम प्रमा भी है) 'पुरुष बुद्धि में उतरे चित्र का अनुभव करने वाला होता है।' इसको आगे (चितेरप्रतिसङ्क्रमाया..... योग० ४ / २२ में) कहेंगे।

अनुमेय के तुल्यजातीय वस्तु में अनुवृत्त और भिन्नजातीय वस्तु से व्यावृत्त जो सम्बन्ध है, उसको विषय बनाने वाली, पदार्थ के सामान्य-धर्म को प्रधान - रूप से बतलाने वाली वृत्ति 'अनुमान प्रमाण' है। उदाहरण जैसे कि कोई वस्तु एक प्रदेश में हो वही कालान्तर में भिन्न देश में दिखाई दे तो इससे यह ज्ञात होता है कि उस वस्तु में गति है। जैसे चन्द्रमा और तारे एक देश में दृष्टिगत होकर कालान्तर में अन्य देश में देखे जाते है इससे चन्द्रमा और तारों में गति सिद्ध होती है, जिस प्रकार चैत्र नामक व्यक्ति में गति सिद्ध है। इसी प्रकार विन्ध्य पर्वत एक देश से दूसरे देश में दिखाई नहीं देता अतः उसमें गति नहीं है, यह सिद्ध होता है।

आप्त के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जाना हुआ जो पदार्थ वा विषय है, [ उस अपने ज्ञान को ] दूसरे को देने के लिए शब्द के द्वारा उपदेश किया जाता है। (आप्त के उस) शब्द से श्रोता की पदार्थ विषयक जो वृत्ति है वह श्रोता के लिए 'आगम प्रमाण' है। जिस आगम का वक्ता श्रद्धा के योग्य नहीं है और जिस वक्ता ने प्रत्यक्ष वा अनुमान से पदार्थ को नहीं जाना है वह आगम प्रमाण कोटि से गिर जाता है। मूल वक्ता (आप्त) के द्वारा जिसने पदार्थ के स्वरूप को प्रत्यक्ष वा अनुमान प्रमाण से जाना है, ऐसे सत्यवक्ता का वचन प्रमाण कोटि से नही गिरता है॥७॥

Yog Prakash

इस सूत्र में प्रमाणवृत्ति का लक्षण बतलाया गया है। इससे प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम तीन प्रमाणों का ग्रहण होता है।

जिस साधन के द्वारा पदार्थ का स्वरूप ठीक-ठीक परिज्ञात होता है वह 'प्रमाण' कहलाता है। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम यें तीनों प्रमाण पदार्थ के स्वरूप को जनाने में साधन हैं। इनकी सहायता के बिना मनुष्य पदार्थों का परिज्ञान करके अपने प्रयोजनों की सिद्धि नहीं कर सकता। परन्तु समाधि की प्राप्ति के लिए एक सीमा तक इनका अवरोध कर दिया जाता है। चित्त को एकाग्र करते समय किसी एक प्रमाण का प्रयोग किया जाता है और अन्य प्रमाणों का अवरोध किया जाता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति किसी वृक्ष के रूप को जानने के लिए अपने चित्त को एकाग्र करता है तो एक ही प्रत्यक्ष प्रमाण का प्रयोग करता है। अन्य प्रमाणों को रोक देता है अर्थात् अनुमान तथा आगम प्रमाण को रोक देता है। प्रत्यक्ष प्रमाण में से भी नेत्रेन्द्रिय द्वारा जो प्रत्यक्ष होता है, उसी का प्रयोग करता है। नासिका आदि इन्द्रियों के द्वारा होने वाले प्रत्यक्ष का प्रयोग नहीं करता। इसी प्रकार से ध्यानकाल में आगम प्रमाण का प्रयोग करता है अन्य प्रमाणों का नहीं। आगम प्रमाण में किसी एक वाक्य अथवा मन्त्र का प्रयोग करता है, अन्य वाक्यों को रोक देता है। जैसे- कोई व्यक्ति ध्यानकाल में 'ओम्' का या 'गायत्री' वा अन्य मन्त्र का जप करता है तब अन्य वाक्यों को रोक देता है।

ध्यानकाल में 'ओम्' आदि का जप निषिद्ध नहीं है। क्योंकि साधक अधिकारपूर्वक 'ओम्' आदि जप-वाक्य को लेकर चित्त की एकाग्रता का सम्पादन करता है। उसकी एकाग्रता के लिए 'तज्जपस्तदर्थभावनम्' योगसूत्र के द्वारा जप का विधान किया हुआ है। इस पर महर्षि व्यास ने "तदस्य योगिनः प्रणवं जपतः प्रणवार्थं च भावयतः चित्तमेकाग्रं सम्पद्यते " लिखा है। प्रणव जप करने वाले तथा प्रणव के अर्थ की भावना करने वाले योगी का चित्त एकाग्र होता है। इस सूत्र में उक्त तीन प्रमाणों में ही अन्य प्रमाण अन्तर्निहित होते हैं॥७॥

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