इस सूत्र में वृत्तियों के पाँच प्रकार बतलाये हैं। ये पाँचों वृत्तियाँ क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेद से दो-दो प्रकार की हैं।
पाप और पुण्य की दृष्टि से वृत्तियों के दो भाग बनाये जा सकते हैं। जो वृत्तियाँ व्यक्ति को ज्ञान, वैराग्य, धर्म और मोक्ष की ओर ले जाने में कारण बनती हैं वे अक्लिष्ट वृत्तियाँ हैं। जो वृत्तियाँ साधक को अज्ञान, अवैराग्य, अधर्म और बन्धन की ओर ले जाने में कारण बनती हैं वे क्लिष्ट वृत्तियाँ हैं। उदाहरण सत्पुरुषों के सङ्ग से, उनके उपदेश से, मोक्ष शास्त्रों के अध्ययन अध्यापन से, निष्काम कर्मों से अक्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। वे व्यक्ति को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने में कारण बनती हैं। उसी प्रकार असत्पुरुषों के सङ्ग से, उनके मिथ्या मार्गदर्शन से, अविद्यायुक्त ग्रन्थों के अध्ययन-अध्यापन से क्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, वे बन्धन की ओर ले जाने का कारण बनती हैं।
यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि क्लिष्ट- अक्लिष्ट वृत्तियों को उत्पन्न करना और उनका स्वेच्छा से प्रयोग करना जीवात्मा के अपने आधीन है, मन इन्द्रियों के नहीं।
गुणों की दृष्टि से वृत्तियों के तीन विभाग बनते हैं - सुख, दुःख और मोह। यह बात पहले लिखी गई है कि चित्त की उत्पत्ति सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से होती है। अत: उसकी वृत्तियाँ भी तीन गुणों से युक्त हैं। सत्त्वादि के यथाक्रम सुख-दुःख-मोह स्वभाव वाले होने से चित्त की वृत्तियाँ भी उसी स्वभाव से युक्त हैं।
ज्ञान की दृष्टि से वृत्तियाँ पाँच प्रकार की हैं इन पाँचों वृत्तियों के क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप में प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। दो-दो भेद करने पर दस भेद होते हैं। पाँचों वृत्तियों के क्लिष्ट और अक्लिष्ट स्वरूपों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं।
(१) प्रमाण वृत्ति - प्रमाणवृत्ति के तीन उपभेद होते हैं जो कि निम्नप्रकार से हैं (क) प्रत्यक्ष प्रमाण एक व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन खा कर सुख का अनुभव करता है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति का 'अक्लिष्ट स्वरूप' है। एक व्यक्ति कड़वी कुनीन की गोलियाँ खाकर दुःख का अनुभव करता है, यह प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति का 'क्लिष्ट स्वरूप' है।
(ख) अनुमान प्रमाण सामने एक व्यक्ति हमें दिख रहा है, जो हमें कुछ पुरस्कार देने वाला है, ऐसा अनुमान करके सुख का अनुभव होता है। यह 'अक्लिष्ट अनुमानप्रमाण वृत्ति' है। इसी प्रकार से एक कुत्ता हमें काटने के लिये तीव्र गति से दौड़ता हुआ आ रहा है, ऐसा अनुमान करके दुःख का अनुभव होता है। यह 'क्लिष्ट अनुमानप्रमाण वृत्ति' है।
(ग) शब्द प्रमाण - वेद में ऐसा पढ़कर हमें सुख हुआ कि - ईश्वर का प्रत्यक्ष करके व्यक्ति को मोक्ष हो जाता है। यह शब्द प्रमाण वृत्ति का 'अक्लिष्ट स्वरूप' है। और वेद में किसी को यह पढ़कर दुःख हुआ कि - जो लोग पाप करते हैं, उन्हें पशु-पक्षी आदि योनियों में अपने पापों का दण्ड दुःख के रूप में भोगना पड़ता है। यह शब्द प्रमाण वृत्ति का 'क्लिष्ट स्वरूप' है।
(२) विपर्यय वृत्ति - एक व्यक्ति रस्सी ढूँढ रहा हो, उसने कुछ हल्के प्रकाश में साँप को रस्सी मान लिया और बहुत प्रसन्न हुआ, कि रस्सी मिल गई। यह 'अक्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' है। और एक व्यक्ति ने हल्के प्रकाश में रस्सी को साँप समझ लिया। उससे वह बहुत भयभीत और दु:खी हो गया। यह 'क्लिष्ट विपर्यय वृत्ति' है।
(३) विकल्प वृत्ति - किसी ने सुना कि - आज मुम्बई से एक बन्ध्या का पुत्र आएगा और हमें अच्छी-अच्छी मिठाई खिलाएगा। ऐसा सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ। यह 'अक्लिष्ट विकल्प वृत्ति' है। और किसी ने ऐसा सुनकर दुःख का अनुभव किया – कि आज सायंकाल एक बन्ध्या का पुत्र हमें बहुत पीटेगा। यह 'क्लिष्ट विकल्प वृत्ति' है।
(४) निद्रा वृत्ति - जब अच्छी सुखदायक (सात्त्विक) निद्रा आती है, तो वह 'अक्लिष्ट निद्रा वृत्ति' कहलाती है। और जब अच्छी निद्रा नहीं आती, तमोगुण तथा अन्य अनेक प्रति-कूलताओं (गर्मी, मच्छर काटने आदि) के कारण दुःखदायक निद्रा आती है, तो वह 'क्लिष्ट निद्रा वृत्ति' कहलाती है।
(५) स्मृति वृत्ति - एक व्यक्ति को पाँच वर्ष पहले की एक घटना याद आ गई जब उसे हज़ारों व्यक्तियों के मध्य में सम्मानित किया गया था। इससे उसे सुख अनुभव हुआ; यह 'अक्लिष्ट स्मृति वृत्ति' है। और एक व्यक्ति को यह याद आ गया कि तीन वर्ष पहले मुझे अमुक व्यक्ति ने पीटा और अपमानित किया था, इसे याद करके वह दु:खी हुआ, यह 'क्लिष्ट स्मृति वृत्ति' है।
इन सभी वृत्तियों के स्वरूप को अच्छे प्रकार से जानकर क्लिष्ट-वृत्तियों का परित्याग कर और अक्लिष्ट-वृत्तियों के उचित प्रयोग से व्यक्ति योग मार्ग पर चलने में समर्थ हो सकता है। क्लिष्ट-अक्लिष्ट वृत्तियों से युक्त चित्त, योगी के द्वारा अगले जन्म को देने में असमर्थ बनाये जाने पर अर्थात् योगी द्वारा भोग और अपवर्ग को चरितार्थ करके चित्त को प्रयोजन हीन बनाये जाने पर उस योगी के जीवनकाल में चित्त आत्मा के तुल्य पवित्र होकर रहता है और देहावसान के पश्चात् प्रकृति में लीन हो जाता है॥५॥