पार्थिवस्याणोर्गन्धतन्मात्रं सूक्ष्मो विषयः, आप्यस्य रसतन्मात्रम्, तैजसस्य रूपतन्मात्रम्, वायवीयस्य स्पर्शतन्मात्रम्, आकाशस्य शब्दतन्मात्रमिति। तेषामहंकारः। अस्यापि लिङ्गमात्रं सूक्ष्मो विषयः। लिङ्गमात्रस्याप्यलिङ्गं सूक्ष्मो विषयः। न चालिङ्गात्परं सूक्ष्ममस्ति।
नन्वस्ति पुरुषः सूक्ष्म इति ? सत्यम्। यथा लिङ्गात्परमलिङ्गस्य सौक्ष्म्यं न चैवं पुरुषस्य। किंतु लिङ्गस्यान्वयिकारणं पुरुषो न भवति, हेतुस्तु भवतीति। अतः प्रधाने सौक्ष्म्यं निरतिशयं व्याख्यातम्॥४५॥
व्या० भा० अ० - पार्थिव अणु का सूक्ष्मविषय गन्धतन्मात्रा है, जलीय अणु का सूक्ष्मविषय रसतन्मात्रा है, तैजस अणु का सूक्ष्मविषय रूपतन्मात्रा है, वायवीय अणु का सूक्ष्मविषय स्पर्शतन्मात्रा है और आकाशीय अणु का सूक्ष्मविषय शब्दतन्मात्रा है। उन (तन्मात्राओं) का सूक्ष्मविषय अहंकार है। इस (अहंकार) का भी सूक्ष्मविषय लिङ्गमात्र (महत्तत्त्व) है। लिङ्गमात्र का भी सूक्ष्मविषय अलिङ्ग (प्रकृति) है। और अलिङ्ग से परे सूक्ष्मविषय नहीं है।
इस पर शङ्का है कि (अलिङ्ग से परे) सूक्ष्मविषय पुरुष है ? यह सत्य है। जिस प्रकार लिङ्ग से परे अलिङ्ग की सूक्ष्मता है उस प्रकार पुरुष की सूक्ष्मता नहीं है। पुरुष लिङ्ग का उपादानकारण नहीं होता परन्तु निमित्तकारण होता है। इसलिये प्रधान (प्रकृति) में निरतिशय सूक्ष्मता का व्याख्यान किया गया है।। ४५॥