या शब्दसंकेतश्रुतानुमानज्ञानविकल्पस्मृतिपरिशुद्धौ ग्राह्यस्वरूपोपरक्ता प्रज्ञा स्वमिव प्रज्ञास्वरूपं ग्रहणात्मकं त्यक्त्वा पदार्थमात्रस्वरूपा ग्राह्यस्वरूपापन्नेव भवति सा निर्वितर्का समापत्तिः। तथा च व्याख्यातम्।
तस्या एकबुद्ध्युपक्रमो ह्यर्थात्माऽणुप्रचयविशेषात्मा गवादिर्घटादिर्वा लोकः। स च संस्थानविशेषो भूतसूक्ष्माणां साधारणो धर्म आत्मभूतः, फलेन व्यक्तेनानुमितः स्वव्यञ्जकाञ्जनः प्रादुर्भवति, धर्मान्तरस्य कपालादेरुदये च तिरोभवति। स एष धर्मोऽवयवीत्युच्यते। योऽसावेकश्च महांश्चाणीयांश्च स्पर्शवांश्च क्रियाधर्मकश्चानित्यश्च तेनावयविना व्यवहाराः क्रियन्ते।
यस्य पुनरवस्तुकः स प्रचयविशेषः सूक्ष्मं च कारणमनुपलभ्यमविकल्पस्य तस्यावयव्यभावादतद् रूपप्रतिष्ठं मिथ्याज्ञानमिति प्रायेण सर्वमेव प्राप्तं मिथ्याज्ञानमिति। तदा च सम्यग्ज्ञानमपि किं स्याद्विषयाभावात्। यद्यदुपलभ्यते तत्तदवयवित्वेनाम्नातम्। तस्मादस्त्यवयवी यो महत्त्वादिव्यवहारापन्नः समापत्तेर्निर्वितर्काया विषयो भवति॥४३॥
व्या० भा० अ० शब्द के संकेत, श्रुत (आगम) अनुमान ज्ञानों के विकल्प की स्मृति की निवृत्ति हो जाने पर ग्राह्य आलम्बन के स्वरूप से उपरक्त (सम्बद्ध) प्रज्ञा अपने ग्रहणात्मक प्रज्ञा रूप को मानो छोड़कर पदार्थमात्र स्वरूप वाली ग्राह्यस्वरूप को प्राप्त हुई-सी होती है तब वह 'निर्वितर्का समापत्ति' कहलाती है। और ऐसा (ही) व्याख्यान (भी) किया गया है।
उस ‘निर्वितर्का समापत्ति' का आलम्बन एक वृत्ति को उत्पन्न करने वाला अर्थरूपी अणुओं का प्रचयरूपी विशेषात्मा गौ आदि अथवा घटादि लोक है। और वह अवयव सन्निवेश विशेष भूत सूक्ष्मभूतों (तन्मात्राओं) का आत्मभूत साधारण धर्म है, अभिव्यक्ति रूप कार्य से अनुमित, अपने व्यञ्जक कारणों से उत्पन्न, कपालादि रूपान्तर के उदित होने पर तिरोहित होता है। वह यह धर्म अवयवी कहा जाता है। जो वह एक महान्, छोटा, स्पर्शवान्, क्रिया करने योग्य और अनित्य होता है उस अवयवी के द्वारा सारे व्यवहार किये जाते हैं।
जिसके मत में वह सञ्चयविशेष है, वस्तु नहीं है और सूक्ष्मकारण इन्द्रियों से अग्राह्य है, उसके मत में अवयवी न होने से अतद्रूपप्रतिष्ठित होने के कारण मिथ्याज्ञान है। इस प्रकार सारा ही प्राप्त ज्ञान प्रायः मिथ्याज्ञान होगा। और तब विषयाभाव होने से, यथार्थज्ञान भी क्या होगा ? जो-जो उपलब्ध होता है, वह वह अवयवी के रूप में बतलाया जाता है। इसलिए अवयवी है (और) जो महत्त्व (अणुत्व एकत्व) आदि व्यवहारों को प्राप्त हुआ 'निर्वितर्का समापत्ति' का विषय बन जाता है।। ४३॥