Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 43

1/43
Sutra
स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥ १.४३ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - यदा पुनः शब्दसंकेतस्मृतिपरिशुद्धौ श्रुतानुमानज्ञानविकल्पशून्यायां समाधिप्रज्ञायां स्वरूपमात्रेणावस्थितोऽर्थस्तत्स्वरूपाकारमात्रतयैवावच्छिद्यते सा च निर्वितर्का समापत्तिः। तत्परं प्रत्यक्षम्। तच्च श्रुतानुमानयोर्बीजम्। ततः श्रुतानुमाने प्रभवतः। न च श्रुतानुमानज्ञानसहभूतं तद्दर्शनम्। तस्मादसंकीर्णं प्रमाणान्तरेण योगिनो निर्वितर्कसमाधिजं दर्शनमिति। निर्वितर्कायाः समापत्तेरस्याः सूत्रेण लक्षणं द्योत्यते-

अर्थ - और जब शब्द संकेत की स्मृति की निवृत्ति हो जाने पर आगम एवं अनुमान ज्ञान के विकल्पों से रहित समाधिप्रज्ञा में अपने शुद्धस्वरूप से ही स्थित अर्थ उस अपने रूप के ही आकार से अवधारित होता है (तब) वह 'निर्वितर्का समापत्ति' होती है। वह पर प्रत्यक्ष है। और वह आगम तथा अनुमान का बीजरूप कारण है। उससे आगम और अनुमान उत्पन्न होते हैं। वह ज्ञान, आगम और अनुमान के साथ उत्पन्न होने वाला नहीं है। इसलिए 'निर्वितर्का समाधि' से उत्पन्न योगी का ज्ञान अन्य प्रमाण से अमिश्रित (असंकीर्ण ) है। सूत्र द्वारा इस 'निर्वितर्का समापत्ति' का लक्षण बतलाया जाता है -

Word Meaning

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का॥४३॥

शब्दार्थ - (स्मृति-परिशुद्धौ) शब्दसंकेत, आगम और अनुमान ज्ञानों के विकल्प की स्मृति की निवृत्ति हो जाने पर (स्वरूप -शून्या-इव) अपने ग्रहणस्वरूप से शून्य हुई जैसी (अर्थमात्र-निर्भासा) अर्थमात्र - सी भासने वाली अर्थात् अर्थमात्र का ही प्रकाश करने वाली (निर्वितर्का) 'निर्वितर्का समापत्ति' है।

सूत्रार्थ - शब्दसंकेत, आगम और अनुमान ज्ञानों के विकल्प की स्मृति की निवृत्ति हो जाने पर अपने ग्रहणस्वरूप से शून्य हुई जैसी अर्थमात्र - सी भासने वाली अर्थात् अर्थमात्र का ही प्रकाश करने वाली 'निर्वितर्का समापत्ति' है।

Vyas Bhashya

या शब्दसंकेतश्रुतानुमानज्ञानविकल्पस्मृतिपरिशुद्धौ ग्राह्यस्वरूपोपरक्ता प्रज्ञा स्वमिव प्रज्ञास्वरूपं ग्रहणात्मकं त्यक्त्वा पदार्थमात्रस्वरूपा ग्राह्यस्वरूपापन्नेव भवति सा निर्वितर्का समापत्तिः। तथा च व्याख्यातम्।

तस्या एकबुद्ध्युपक्रमो ह्यर्थात्माऽणुप्रचयविशेषात्मा गवादिर्घटादिर्वा लोकः। स च संस्थानविशेषो भूतसूक्ष्माणां साधारणो धर्म आत्मभूतः, फलेन व्यक्तेनानुमितः स्वव्यञ्जकाञ्जनः प्रादुर्भवति, धर्मान्तरस्य कपालादेरुदये च तिरोभवति। स एष धर्मोऽवयवीत्युच्यते। योऽसावेकश्च महांश्चाणीयांश्च स्पर्शवांश्च क्रियाधर्मकश्चानित्यश्च तेनावयविना व्यवहाराः क्रियन्ते।

यस्य पुनरवस्तुकः स प्रचयविशेषः सूक्ष्मं च कारणमनुपलभ्यमविकल्पस्य तस्यावयव्यभावादतद् रूपप्रतिष्ठं मिथ्याज्ञानमिति प्रायेण सर्वमेव प्राप्तं मिथ्याज्ञानमिति। तदा च सम्यग्ज्ञानमपि किं स्याद्विषयाभावात्। यद्यदुपलभ्यते तत्तदवयवित्वेनाम्नातम्। तस्मादस्त्यवयवी यो महत्त्वादिव्यवहारापन्नः समापत्तेर्निर्वितर्काया विषयो भवति॥४३॥

व्या० भा० अ० शब्द के संकेत, श्रुत (आगम) अनुमान ज्ञानों के विकल्प की स्मृति की निवृत्ति हो जाने पर ग्राह्य आलम्बन के स्वरूप से उपरक्त (सम्बद्ध) प्रज्ञा अपने ग्रहणात्मक प्रज्ञा रूप को मानो छोड़कर पदार्थमात्र स्वरूप वाली ग्राह्यस्वरूप को प्राप्त हुई-सी होती है तब वह 'निर्वितर्का समापत्ति' कहलाती है। और ऐसा (ही) व्याख्यान (भी) किया गया है।

उस ‘निर्वितर्का समापत्ति' का आलम्बन एक वृत्ति को उत्पन्न करने वाला अर्थरूपी अणुओं का प्रचयरूपी विशेषात्मा गौ आदि अथवा घटादि लोक है। और वह अवयव सन्निवेश विशेष भूत सूक्ष्मभूतों (तन्मात्राओं) का आत्मभूत साधारण धर्म है, अभिव्यक्ति रूप कार्य से अनुमित, अपने व्यञ्जक कारणों से उत्पन्न, कपालादि रूपान्तर के उदित होने पर तिरोहित होता है। वह यह धर्म अवयवी कहा जाता है। जो वह एक महान्, छोटा, स्पर्शवान्, क्रिया करने योग्य और अनित्य होता है उस अवयवी के द्वारा सारे व्यवहार किये जाते हैं।

जिसके मत में वह सञ्चयविशेष है, वस्तु नहीं है और सूक्ष्मकारण इन्द्रियों से अग्राह्य है, उसके मत में अवयवी न होने से अतद्रूपप्रतिष्ठित होने के कारण मिथ्याज्ञान है। इस प्रकार सारा ही प्राप्त ज्ञान प्रायः मिथ्याज्ञान होगा। और तब विषयाभाव होने से, यथार्थज्ञान भी क्या होगा ? जो-जो उपलब्ध होता है, वह वह अवयवी के रूप में बतलाया जाता है। इसलिए अवयवी है (और) जो महत्त्व (अणुत्व एकत्व) आदि व्यवहारों को प्राप्त हुआ 'निर्वितर्का समापत्ति' का विषय बन जाता है।। ४३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में निर्वितर्का समापत्ति का वर्णन है। सवितर्का और निर्वितर्का समापत्ति में यह भेद है कि 'निर्वितर्का समापत्ति' में शब्द संकेत, श्रुत, अनुमान ज्ञानों के विकल्प (= भेद) की स्मृति की निवृत्ति हो जाती है और 'सवितर्का समापत्ति' में इन ज्ञानों के विकल्प की स्मृति बनी रहती है। सवितर्का में शब्द, ज्ञान और वस्तु इन तीनों की प्रधानता बनी रहती है। परन्तु निर्वितर्का में शब्द, ज्ञान गौण हो जाते हैं और पदार्थ के स्वरूप की प्रधानता रहती है। यहाँ पर बुद्धि को 'स्वरूपशून्या' कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि इस स्थिति में पदार्थ को प्रकाशित करने वाली बुद्धि गौण हो जाती है, उसका अभाव नहीं होता। यदि उसका अभाव मान लिया जाय तो पदार्थ का स्वरूप ज्ञात नहीं हो सकता। 'निर्वितर्का समापत्ति' में जो योगी को प्रत्यक्ष होता है वह पर (उत्कृष्ट) प्रत्यक्ष है। वही शब्दप्रमाण और अनुमानप्रमाण का कारण है। क्योंकि बिना प्रत्यक्ष के शब्दप्रमाण और अनुमानप्रमाण उत्पन्न नहीं हो सकते।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि संसार में जितने भी गौ घटादि पदार्थ हैं वे सब परमाणुओं के समुदायमात्र हैं परमाणुओं से भिन्न अवयवी नामक कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं हैं। इस मान्यता में यह दोष है कि जो अति सूक्ष्म परमाणु हैं वे इन्द्रियों से प्रत्यक्ष

नहीं हो सकते। यदि अवयवी को नहीं मानेंगे तो जो व्यवहार प्रत्यक्ष रूप में देखा जाता है कि यह वस्तु बड़ी है, यह छोटी है, यह क्रियावान् पदार्थ है, यह क्रियाहीन है, मैं इस पदार्थ को छू रहा हूँ, मैं इस पदार्थ को उठाकर अन्यत्र ले जा रहा हूँ। इत्यादि ज्ञानमूलक यह सब व्यवहार मिथ्या कहा जायेगा। इसलिये निर्वितर्का समापत्ति में जो पदार्थ का स्वरूप प्रत्यक्ष होता है वह एक अवयवी है, परमाणुओं का समुदायमात्र नहीं॥४३॥

All Sutras