इस सूत्र में संकीर्ण सवितर्का समापत्ति का लक्षण किया है। जब योगाभ्यासी गौ, घटादि स्थूलपदार्थों में चित्त को एकाग्र करके उनका साक्षात्कार करता है तब शब्द, अर्थ और ज्ञान एक रूप में दिखाई देते हैं। वास्तव में शब्द, अर्थ से पृथक् है और अर्थ, शब्द से पृथक् है। ज्ञान, शब्द और अर्थ से पृथक् है। क्योंकि गौ शब्द के धर्म उदात्त, अनुदात्त आदि भिन्न-भिन्न ध्वनियों में बोला जाना तथा मुख से उच्चारित होना आदि हैं। गौ शब्द का अर्थ जो पशु है उसके धर्म, शब्द से भिन्न हैं जैसे रूपरंग, लम्बाई चौड़ाई आदि। ज्ञान के धर्म, शब्द और अर्थ से भिन्न हैं। जैसे पदार्थ के स्वरूप को प्रकाशित करना, इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न होना आदि। ये शब्दार्थ और ज्ञान स्वरूप से पृथक् होते हुए भी 'सवितर्का समापत्ति' में अभेद रूप से दिखाई देते हैं। जब गौ पदार्थ में योगी चित्त को एकाग्र करके उसका प्रत्यक्ष करता है तो वहाँ पर इन तीनों की स्मृति बनी रहती है। वह इन तीनों में भेद नहीं कर पाता। उस समय साधक के मन में गौ शब्द, गौ अर्थ और गौ ज्ञान ये तीन बने रहते हैं। जबकि 'निर्वितर्का समापत्ति' में अर्थ की ही प्रतीति होती है, शब्द और ज्ञान का भान नहीं रहता।
एक सांसारिक व्यक्ति भी गौ, घटादि पदार्थों को इसी प्रकार से देखता है। परन्तु सांसारिक व्यक्ति का चित्त मध्य-मध्य में विषयान्तर होता रहता है। वह अपने चित्त को अधिकारपूर्वक एक ही पदार्थ में स्थिर नहीं कर सकता। योगाभ्यासी उसको विषयान्तर नहीं होने देता, यही दोनों में अन्तर है। मन को एक ही विषय में अधिकारपूर्वक रोकना बहुत कठिन प्रतीत होता है। इसका कारण एक यह भी है कि योगाभ्यासी को यह बताया जाता है कि चित्त बहुत चञ्चल है परन्तु प्रायः यह नहीं बताया जाता कि यह जड़ पदार्थ है और इसको जीवात्मा चलाता है। यदि मन के विषय में उचित प्रशिक्षण दे दिया जाए तो कठिनाई न्यून हो जाती है॥४२॥