Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 41

1/41
Sutra
क्षीणवृत्तेर्, अभिजातस्येव मणेर्, ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषुतत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः ॥ १.४१ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - अथ लब्धस्थितिकस्य चेतसः किंस्वरूपा किंविषया वा समापत्तिरिति ? तदुच्यते – 

अर्थ - अब स्थिरता को प्राप्त चित्त की समापत्ति किस स्वरूप की एवं किस विषय की होती है वह सूत्र के द्वारा बताया जाता है -

Word Meaning

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः॥४१॥

शब्दार्थ - (क्षीण-वृत्तेः) जिसकी राजस, तामस वृत्तियाँ क्षीण हो गई हैं ऐसे स्वच्छ चित्त की (अभिजातस्य-इव मणेः) अति निर्मल स्फटिकमणि के समान ( ग्रहीतृ-ग्रहण-ग्रह्येषु) जीवात्मा, ईन्द्रियों, भूतों में (तत्-स्थ-तद्-अञ्जनता) उनके स्वरूप में स्थित होकर उसी के रूप को प्राप्त कर लेना (समापत्तिः) 'समापत्ति' कहलाती है।

सूत्रार्थ- जिसकी राजस-तामस वृत्तियाँ क्षीण हो गई हैं, ऐसे स्वच्छ चित्त का अति निर्मल स्फटिकमणि के समान जीवात्मा, इन्द्रियों और भूतों के स्वरूप में स्थित होकर के समान भासित होना 'समापत्ति' कहलाती है।

Vyas Bhashya

क्षीणवृत्तेरिति प्रत्यस्तमितप्रत्ययस्येत्यर्थः। अभिजातस्येव मणेरिति दृष्टान्तोपादानम्। यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात्तत्तद्रूपोपरक्त उपाश्रयरूपाकारेण निर्भासते तथा ग्राह्यालम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्यसमापन्नं ग्राह्यस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं भूतसूक्ष्मस्वरूपाभासं भवति। तथा स्थूलालम्बनोपरक्तं स्थूलरूपसमापन्नं स्थूलरूपाभासं भवति। तथा विश्वभेदोपरक्तं विश्वभेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति।

तथा ग्रहणेष्वपीन्द्रियेषु द्रष्टव्यम्। ग्रहणालम्बनोपरक्तं ग्रहणसमापन्नं ग्रहणस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा ग्रहीतृपुरुषालम्बनोपरक्तं ग्रहीतृपुरुषसमापन्नं ग्रहीतृपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा मुक्तपुरुषालम्बनोपरक्तं मुक्तपुरुषसमापन्नं मुक्तपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासत इति। तदेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु पुरुषेन्द्रियभूतेषु या तत्स्थतदञ्जनता तेषु स्थितस्य तदाकारापत्तिः सासमापत्तिरित्युच्यते॥४१॥

व्या० भा० अ० - 'क्षीणवृत्ति' का अर्थ है - (अभ्यास के द्वारा) शान्त हो गयी हैं (राजस् तामस्) वृत्तियाँ जिस चित्त की। स्वच्छ स्फटिक मणि के समान यह दृष्टान्त का ग्रहण किया है। जिस प्रकार स्फटिक मणि निकटवर्ती भिन्न भिन्न पदार्थों के कारण उनके आकारों से उपरक्त भासित होता है उसी प्रकार ग्राह्य आलम्बन से उपरक्त चित्त ग्राह्य आकार को प्राप्त होकर ग्राह्य के स्वरूप के आकार का भासित होता है एवं सूक्ष्मभूतों से उपरक्त, सूक्ष्मभूत आकार को प्राप्त हुआ सूक्ष्मभूत आकार का भासित होता है। इसी प्रकार स्थूलभूतों से उपरक्त स्थूलभूत आकार को प्राप्त हुआ स्थूलभूत आकार का भासित होता है। वैसे ही विविध मनुष्य आदि चेतन प्राणी, घटपटादि अचेतन पदार्थों से उपरक्त विविध आकारों को प्राप्त हुआ विविध आकारों का भासित होता है।

स्वरूप इसी प्रकार ग्रहण जो इन्द्रियाँ हैं, उनमें जानना चाहिए। ग्रहण आलम्बन से उपरक्त ग्रहण के आकार को प्राप्त होकर ग्रहण के स्वरूप के आकार का भासित होता है। तथा ग्रहीतृपुरुष जीवात्मा आलम्बन से उपरक्त ग्रहीतृ के आकार को प्राप्त होकर ग्रहीतृ के स्वरूप के आकार का भासित होता है। वैसे मुक्तपुरुष के आलम्बन से उपरक्त मुक्तपुरुष के आकार को प्राप्त होकर मुक्तपुरूष के के आकार का भासित होता है। इस प्रकार अभिजात (नवीन शुद्ध) मणि (बिल्लोर पत्थर) के समान चित्त की ग्रहीतृ, ग्रहण, ग्राह्यों में पुरुष, इन्द्रियाँ और स्थूल, सूक्ष्म भूत उनमें स्थित होकर जो उनके आकार को ग्रहण करना है; वह चित्त की तदाकारपत्ति है, वह 'समापत्ति' कहलाती है॥४१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया गया है कि जब राजस् तामस् वृत्तियाँ क्षीण हो जातीहैं उस समय चित्त की क्या स्थिति होती है। 

सम्प्रज्ञातसमाधि ग्रहीतृ, ग्रहण और ग्राह्य इन तीन प्रकार के पदार्थों में होती है। जब योगाभ्यासी का चित्त विवेक, वैराग्य और अभ्यास से विशुद्ध हो जाता है, तब वह जिस पदार्थ का साक्षात्कार करना चाहता है उसमें अधिकारपूर्वक चित्त को संयुक्त करता है। जब स्थूलभूतों से सम्बद्ध करता है तो उस अवस्था में चित्त स्थूलभूतों के समान प्रतीत होता है और जब सूक्ष्मभूतों से सम्बद्ध करता है तो उनके समान प्रतीत होता है। जब इन्द्रियों से सम्बद्ध करता है तब चित्त इन्द्रियों के समान भासित होता है। जब साधक अपने स्वरूप के साक्षात्कार के लिए चित्त को अपने स्वरूप (जीवात्मा) से सम्बद्ध करता है तब चित्त आत्मा जैसा प्रतीत होता है। इस स्थिति को समझाने के लिए स्फटिकमणि का दृष्टान्त दिया जाता है। जैसे स्फटिकमणि के समीप लाल, पीले रंग का गुलाब आदि का फूल रख दिया जाता है तो स्फटिक मणि उस फूल के रंग के समान प्रतीत होती है। इसी प्रकार शुद्ध चित्त भी जिस-जिस पदार्थ से सम्बद्ध होता है, उस उस पदार्थ के समान प्रतीत होता है। यह चित्त की सत्त्वगुण प्रधान अवस्था है। जब रजोगुण, तमोगुण प्रधान होते हैं और सत्त्वगुण अप्रधान रहता है तब समाधि भंग हो जाती है। यहाँ पर ग्रहीतृ से जीवात्मा, ग्रहण से इन्द्रियाँ और ग्राह्य से स्थूल, सूक्ष्म भूतों का ग्रहण करना चाहिए।

व्यासभाष्य में कहा गया है कि मुक्त पुरुषों के आलम्बन से चित्त मुक्त पुरुषों के समान प्रतीत होता है। यहाँ मुक्तपुरुष का अभिप्राय जीवित मुक्तपुरुषों से है शरीररहित मुक्तपुरुषों से नहीं। इस सूत्र का अभिप्राय एक दृष्टान्त से समझना चाहिए - उदाहरण के लिये एक योगाभ्यासी अपने चित्त को एकाग्र करके पर्वत के यथार्थ स्वरूप को जानना चाहता है। वह प्रथम नेत्रों के माध्यम से पर्वत को विशेष ध्यान से देखता है और अपने चित्त को अन्य विषयों से रोक देता है। उस समय पर्वत का स्वरूप नेत्रों में उतर आता है। नेत्रों में उतरे हुए पर्वत के स्वरूप को चित्त ग्रहण कर लेता है और जीवात्मा चित्त में उतरे पर्वत के स्वरूप को देखता है। तब वह कहता है कि मैं पर्वत का प्रत्यक्ष कर रहा हूँ। यहाँ पर चित्त पर्वत के स्वरूप को अपने अन्दर ग्रहण करके पर्वत जैसा प्रतीत होता है। ऐसा ही सर्वत्र समझ लेना चाहिए। जब सूक्ष्म विषयों का प्रत्यक्ष किया जाता है तब इन्द्रियों के बिना ही सीधा चित्त के साथ उन सूक्ष्म विषयों का सम्बन्ध होता है। साधक अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष करने के लिये जब चित्त को जीवात्मा से सम्बन्ध करता है, तब चित्त जीवात्मा के समान प्रतीत होता है। अर्थात् चित्त चेतन जैसा प्रतीत होता है। चित्त की इस अवस्था को 'समापत्ति' कहते हैं॥४१॥

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