Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 35

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Sutra
विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ १.३५ ॥

Bhashya

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Word Meaning

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी॥३५॥

शब्दार्थ - (विषयवती) रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-शब्द विषयों वाली (वा) अथवा (प्रवृत्ति:) प्रवृत्ति = अनुभूति ( उत्पन्ना) उत्पन्न हुई, (मनसः) मन की ( स्थिति-निबन्धिनी) स्थिति को बाँधने वाली होती हैं।

सूत्रार्थ - अथवा गन्ध आदि विषयों के सम्बन्ध से उत्पन्न अनुभूति मन की स्थिति को बाँधने वाली होती हैं।

Vyas Bhashya

नासिकाग्रे धारयतोऽस्य या दिव्यगन्धसंवित्सा गन्धप्रवृत्तिः। जिह्वाग्रे रससंवित्। तालुनि रूपसंवित्। जिह्वामध्ये स्पर्शसंवित्। जिह्वामूले शब्दसंविदित्येता वृत्तय उत्पन्नाश्चित्तं स्थितौ निबध्नन्ति, संशयं विधमन्ति, समाधिप्रज्ञायां च द्वारीभवन्तीति। एतेन चन्द्रादित्यग्रहमणिप्रदीपरश्म्यादिषु प्रवृत्तिरुत्पन्ना विषयवत्येव वेदितव्या।

यद्यपि हि तत्तच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशैरवगतमर्थतत्त्वं सद्भूतमेव भवति, एतेषां यथाभूतार्थप्रतिपादनसामर्थ्यात्, तथापि यावदेकदेशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेद्यो भवति तावत्सर्वं परोक्षमिवापवर्गादिषु सूक्ष्मेष्वर्थेषु न दृढां बुद्धिमुत्पादयति। तस्माच्छास्त्रानुमानाचार्योपदेशो-पोवलनार्थमेवावश्यं कश्चिदर्थविशेषः प्रत्यक्षीकर्तव्यः। तत्र तदुपदिष्टार्थैकदेशप्रत्यक्षत्वे सति सर्वं सुसूक्ष्मविषयमप्यापवर्गाच्छ्रद्धीयते। एतदर्थमेवेदं चित्तपरिकर्म निर्दिश्यते। अनियतासु वृत्तिषु तद्विषयायां वशीकारसंज्ञायामुपजातायां चित्तं समर्थं स्यात्तस्य तस्यार्थस्य प्रत्यक्षीकरणायेति। तथा च सति श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधयोऽस्याप्रतिबन्धेन भविष्यन्तीति॥३५॥

व्या० भा० अ० - नासिका के अग्रभाग में धारणा करने वाले इस साधक को जो दिव्यगन्ध का साक्षात्कार होता है वह 'गन्धप्रवृत्ति' है। जिह्वा के अग्रभाग में धारणा करने से दिव्यरस का साक्षात्कार होता है वह 'रसप्रवृत्ति' है। तालु में धारणा करने से दिव्यरूप का साक्षात्कार होता है वह 'रूपप्रवृत्ति' है। जिह्वामध्य में धारणा करने से दिव्यस्पर्श का साक्षात्कार होता है वह 'स्पर्शप्रवृत्ति' है। जिह्वामूल में धारणा करने से दिव्यशब्द का साक्षात्कार होता है वह 'शब्दप्रवृत्ति' है। ये इतनी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होकर चित्त को स्थिर करती है और समाधिप्रज्ञा में माध्यम बनती हैं। इससे चन्द्र, सूर्य, ग्रह, मणि, प्रदीप और रश्मि आदि में उत्पन्न प्रवृत्ति विषयवती ही जाननी चाहिए।

यद्यपि उन-उन शास्त्रों, अनुमानप्रमाण तथा आचार्यों के उपदेश से ज्ञात बातें यथार्थ ही होती है क्योंकि इनमें यथार्थ बतलाने का सामर्थ्य होता है फिर भी जब तक इनमें से कोई एक देश अपने उपकरणों (मन-इन्द्रियों) द्वारा नहीं जाना जाता तब तक परोक्ष के समान रहने वाला अपवर्गपर्यन्त सारा विषय सूक्ष्मतत्त्वों के प्रति दृढ़विश्वास को उत्पन्न नहीं करता। इसलिये शास्त्र, अनुमान और आचार्यों के उपदेश की पुष्टि के लिए अवश्य ही किसी विशिष्ट अंश को प्रत्यक्ष कर लेना चाहिए। उन उपदिष्ट सब विषयों में एक विषय का प्रत्यक्ष होने पर अपवर्गपर्यन्त समस्त सूक्ष्म विषयों में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसलिए इस चित्त परिकर्म का निर्देश किया जाता है। अस्थिर गन्धादि वृत्तियों के विषय में वशीकार स्थिति अर्थात् अपरवैराग्य के उत्पन्न होने पर चित्त ज्ञातव्य विषयों

के प्रत्यक्ष करने में समर्थ हो जाता है और वैसा होने पर इस योगी की श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि अबाधरूप से सिद्ध हो जायेंगी॥३५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में गन्धादि विषयों वाली प्रवृत्ति को चित्त स्थिर करने का साधन बतलाया है। 

यहाँ पर यह जानना चाहिये कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्दादि सूक्ष्म विषयों का साक्षात्कार होने से चित्त की एकाग्रता होती है और इन गन्धादि विषयों के साक्षात्कार से साधक के संशयों का निराकरण हो जाता है। योगाभ्यासी यह समझने लगता है कि इस अभ्यास से पूर्व इन गन्ध, रस आदि विषयों का मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं था। योगाभ्यास करने से ही यह परिज्ञात हुआ है कि जो सूक्ष्म विषय बिना योगाभ्यास के नहीं जाने जाते, उनको योगाभ्यास के माध्यम से ही जाना जाता है। इसी प्रकार ईश्वर जैसे अति सूक्ष्मपदार्थ को भी जाना जा सकता है, यह विश्वास उत्पन्न होता है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि प्रत्येक योगाभ्यासी गन्ध आदि विषयों का साक्षात्कार करके ही ईश्वरसाक्षात्कार तक पहुँच सकता है, यह आवश्यक नहीं है। विकल्प रूप में चित्त को स्थिर करने का यह भी एक साधन है। इससे भिन्न उपायों से भी चित्त को स्थिर किया जा सकता है। 

वेद और वेदानुकूल शास्त्र, अनुमान, सत्यवादी आचार्यों के उपदेश के द्वारा जो बातें जानी जाती हैं वे सत्य ही होती हैं। परन्तु जब तक योगाभ्यासी उन बातों में से किसी एक का भी साक्षात्कार नहीं कर लेता, तब तक मोक्ष जैसे सूक्ष्मविषयों में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। इसलिये योग जिज्ञासुओं को योग से सम्बद्ध पढ़े, सुने किसी एक सूक्ष्मविषय का स्वयं साक्षात्कार कर लेना चाहिए। किसी एक सूक्ष्मविषय का साक्षात्कार कर लेने से ईश्वर, मोक्ष आदि विषयों में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है। इससे श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा और परवैराग्य के द्वारा असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है॥३५॥

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