इस सूत्र में प्राणायाम के द्वारा चित्त को एकाग्र करने का विधान है। यहाँ पर प्राणायाम के विषय में संक्षेप से कथन किया है।
योगदर्शन पाद - २ में प्राणायाम क विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। वहाँ पर प्राणायाम का लक्षण निम्न प्रकार से किया है - आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति रोक देना 'प्राणायाम' है। बाहर के वायु को ग्रहण करना 'श्वास' और अन्दर से वायु को बाहर निकालना 'प्रश्वास' कहाता है।
प्राणायाम करने वाले साधक किसी विशेष गुरु से प्रशिक्षण लेकर ही इसका अभ्यास करें अन्यथा हानि हो जाती है। प्राणायाम करने वाले साधक को यमनियमों का पालन अवश्य ही करना चाहिये। इनके पालन न करने से विशेष सफलता नहीं मिलती। योगदर्शन में चार प्रकार के प्राणायाम का उल्लेख है। बाह्य, आभ्यान्तर, स्तम्भवृत्ति और बाह्याभ्यान्तरविषयाक्षेपी। बाह्यप्राणायाम की विधि - सुखपूर्वक आसन पर बैठकर प्रथम मलद्वार का संकोच करना चाहिए। इसके पश्चात् नासिका के माध्यम से अन्दर के वायु को बाहर निकालना चाहिये और उसको यथाशक्ति बाहर ही रोक देना चाहिए। जब कुछ घबराहट हो तो मूलेन्द्रिय के संकोच को छोड़ देवें और नासिका के द्वारा धीरे-धीरे श्वास को अन्दर ले लेवें। जितनी प्राण की आवश्यकता हो उसकी पूर्ति कर लेवें। यह एक प्राणायाम हो गया। इसी प्रकार से दूसरी बार, तीसरी बार प्राणायाम करना चाहिये। प्राणायाम करते समय ओ३म् अथवा प्राणायाम मन्त्रादि का अर्थसहित मानसिक जप करना चाहिए। नवीन साधक प्रारम्भ में सतत तीन प्राणायाम न कर सकें तो मध्य में एक, दो, तीन श्वास लेकर दूसरी बार प्राणायाम करें। तीन प्रातः काल और तीन सायंकाल करें। कालान्तर में एक-एक को बढ़ाते जाएँ। अपनी शारीरिक शक्ति, भोजन, ऋतु, अनुभूति के आधार पर न्यून वा अधिक प्राणायाम करते जायें। बिना विधि के प्राणायाम करने से हानि होती है और अधिक प्राणायाम करने से भी हानि होती है। संस्कारविधि में पञ्चमहायज्ञों के सन्दर्भ में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने लिखा है कि न्यून से न्यून तीन और अधिक से अधिक इक्कीस प्राणायाम करें। यमनियमों का पालन करते हुए विधिपूर्वक प्राणायाम करने से चित्त स्थिर होता है और प्राणायाम से अनेक लाभ होते हैं। प्राणायाम करने वाले साधकों को यह जानना चाहिये कि प्रथम बाह्यप्राणायाम का अच्छे प्रकार से अभ्यास करें और उसके पश्चात् अन्य प्राणायामों को करें। प्राणायाम के विषय में योगदर्शन के पाद - २ में विस्तार से लिख दिया है॥३४॥