Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 33

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Sutra
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणांसुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ १.३३ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - यस्य चित्तस्यावस्थितस्येदं शास्त्रेण परिकर्म निर्दिश्यते तत्कथम् ?

अर्थ - जिस अवस्थित चित्त का शास्त्र के द्वारा सम्प्रज्ञात समाधि तक पहुँचाने वाले अनेक साधनों का वर्णन किया जाता है वह किस प्रकार का है यह कुछ सूत्रों के द्वारा बतलाया जाता है ।

Word Meaning

 मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥३३॥

शब्दार्थ - (मैत्री-करुणा-मुदिता-उपेक्षाणाम् ) मित्रता, दया, प्रसन्नता, उदासीनता की (सुख-दुःख-पुण्य-अपुण्य-विषयाणाम् ) सुख-दुःख- पुण्य-अपुण्य विषय वालों में (भावनात:) भावना के अनुष्ठान से (चित्त-प्रसादनम् ) चित्त, प्रसन्न और एकाग्र होता है।

सूत्रार्थ - सुख-दुःख- पुण्य- अपुण्य विषय वाले व्यक्तियों में क्रमशः मित्रता, दया, प्रसन्नता, उदासीनता की भावना के अनुष्ठान से चित्त की प्रसन्नता और एकाग्रता होती है। 

Vyas Bhashya

तत्र सर्वप्राणिषु सुखसंभोगापन्नेषु मैत्रीं भावयेत्, दुःखितेषु करुणाम्, पुण्यात्मकेषु मुदिताम्, अपुण्यशीलेषूपेक्षाम्। एवमस्य भावयतः शुक्लो धर्म उपजायते। ततश्च चित्तं प्रसीदति, प्रसन्नमेकाग्रं स्थितिपदं लभते॥३३॥

व्या० भा० अ० - उन भावनाओं में से सुखभोगयुक्त सब प्राणियों में मैत्री की, दुःखी प्राणियों में करुणा की, पुण्यात्माओं में हर्ष की और अपुण्यत्माओं में उपेक्षा की भावना करनी चाहिए। इस प्रकार भावना करने वाले उपासक के आत्मा में शुद्धधर्म उत्पन्न होता है। उससे चित्त प्रसन्न होता है। प्रसन्न चित्त एकाग्र होकर स्थिति पद को प्राप्त होता है॥३३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में चित्त को प्रसन्न करने के उपाय बतलाये हैं। के योगाभ्यासी व्यवहार के समय में अनेक प्रकार के मनुष्यों के सम्पर्क में आता है। यदि वह उनके साथ व्यवहार करना नहीं जानता तो उसकी मन:स्थिति योगाभ्यास के अनुकूल नहीं रहती। इसलिए सूत्रकार ने साधक का किसके साथ कैसा व्यवहार हो यह उपदेश किया। संसार में अनेक प्रकार मनुष्य हैं। कोई धार्मिक और सुखी है, कोई धार्मिक होते हुए भी सुखसाधनों की न्यूनता के कारण दुःखी है। कोई योगाभ्यासी पुण्यात्मा है। कोई अन्यायकारी अपुण्यात्मा है। इन सबके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिये कि व्यक्ति का मन प्रसन्न बना रहे। जो सुखसाधनसम्पन्न और धार्मिक हैं, उनके साथ मित्रता का व्यवहार करें। क्योंकि कभी-कभी व्यक्ति सुखसाधनसम्पन्न मनुष्यों को देखकर उनसे द्वेष करने लगता है कि ये इतने सम्पन्न क्यों हो गये हैं, इनकी हानि होनी चाहिए। इससे योगाभ्यासी का चित्त खिन्न हो जाता है। खिन्न होने से उसमें एकाग्रता नहीं आ पाती। यदि वह सुखसम्पन्न मनुष्यों को देखकर उनसे मित्रता का व्यवहार करता है तो चित्त प्रसन्न होता है और उससे ईर्ष्याद्वेष दूर हो जाते हैं।

जब व्यक्ति दुःखियों को देखता है तो उनके प्रति घृणा उत्पन्न होती है। घृणा करने से चित्त की प्रसन्नता भंग हो जाती है और दुःखियों का उपकार करना भी छूट जाता है। यदि योगाभ्यासी दुःखियों पर दया करता है तो उनके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और वह उन दुःखियों की तन, मन और धन से सहायता करता है। सहायता करने से उनका दुःख दूर होता है और सुख की प्राप्ति होती है। इससे साधक के मन में घृणा उत्पन्न नहीं होती किन्तु उल्लास होता है।

योगाभ्यासी पुण्यात्माओं को देखता हैं तो उनके प्रति द्वेष उत्पन्न हो सकता है। जब उनका सम्मान होता है तब उनके सम्मान को सहन नहीं कर पाता, उनसे द्वेष करने लगता है। द्वेष से चित्त में एकाग्रता नहीं हो पाती। इस द्वेष को दूर करने के लिए उनके प्रति हर्ष की भावना करनी चाहिए इससे योगाभ्यासी के मन में द्वेष उत्पन्न नहीं होता किन्तु हर्ष उत्पन्न होता है।

अपुण्यात्माओं को देखकर न राग और न द्वेष करना चाहिए किन्तु उपेक्षा करनी चाहिये। क्योंकि राग करने से अधर्माचरण में रुचि उत्पन्न होती है और उस अपुण्यात्मा जैसा व्यक्ति का जीवन बन जाता है। द्वेष करने से झगड़े उत्पन्न होते हैं जिससे योगाभ्यासी योग मार्ग को छोड़कर लड़ाई-झगड़ों में लग जाता है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अपुण्यात्माओं के विषय में भी यह इच्छा रखनी चाहिए कि ये भी अधर्माचरण को छोड़कर धर्माचरण करें जिससे इनका दुःख दूर हो और ये सुखसम्पन्न हो जाएँ।

चित्त को प्रसन्न करने के लिए यह भी उपाय है कि संसार के मनुष्य आदि सभी प्राणी ईश्वर के पुत्र हैं। उन सबके साथ आत्मवत् व्यवहार करना चाहिये। क्योंकि ईश्वर हमारी माता, पिता, आचार्य, उपास्य, राजा है और वह हम सबका कल्याण करना चाहता है। योगाभ्यासी यह निश्चय करे कि मैं भी सबका कल्याण करने का पूर्ण प्रयास करूँगा। ऐसा विचार और आचरण करने से चित्त प्रसन्न होता है। इससे चित्त को एकाग्र करने में सफलता मिलती है॥३३॥

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