इस सूत्र में बतलाया गया है कि व्याधि आदि योग के विघ्नों और उपविघ्नों का विनाश करने के लिये एक तत्त्व (ईश्वर) का अभ्यास करना चाहिए अर्थात् बार-बार ईश्वर प्रणिधान का अनुष्ठान करना चाहिए।
कुछ लोगों की यह मान्यता है कि सूत्रोक्त एक तत्त्व से किसी स्थूल पदार्थ का ग्रहण करना चाहिये। उस स्थूल पदार्थ की उपासना से व्याधि आदि विघ्न और उपविघ्न दूर हो जाते हैं। वास्तव में यह मान्यता ठीक नहीं है। इसका प्रथम कारण यह है कि व्यासभाष्य में यह बात कही है कि इस अगले सूत्र के द्वारा अभ्यास का उपसंहार किया जाता है। यहाँ पर उपक्रम ईश्वर प्रणिधान का है, तो उपसंहार में भी एकतत्त्व से ईश्वर का ग्रहण करना ही उचित है, किसी स्थूल पदार्थ का नहीं।
दूसरा कारण यह है कि मीमांसा दर्शन में किसी वाक्य का अर्थ करने में श्रुति आदि छह कारण माने जाते हैं। उनमें से एक प्रकरण है। प्रकरण के आधार पर यहाँ पर ईश्वर का ही ग्रहण करना उचित है।
तीसरा कारण यह है कि विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए किसी शब्द का बार-बार आवर्तन किया जाता है। जैसे योगदर्शनकार ने ईश्वरप्रणिधान का उल्लेख अनेक बार किया है। इससे पुनरुक्ति दोष नहीं आता।
चौथा कारण यह है कि व्याधि आदि विघ्न और उपविघ्न किसी स्थूल पदार्थ की उपासना से कभी भी दूर नहीं हो सकते। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में लिखा है " और उनके छुड़ाने का मुख्य उपाय यही है कि - तत्प्रतिषेधा.......जो केवल एक अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व है उसी में प्रेम और सर्वदा उसी की आज्ञापालन में पुरुषार्थ करना है, वही एक उन विघ्नों के नाश करने को वज्ररूप शस्त्र है, अन्य कोई नहीं। इसलिये सब मनुष्यों को अच्छी प्रकार प्रेमभाव से परमेश्वर के उपासनायोग में नित्य पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे वे सब विघ्न दूर हो जायें।"
इस सूत्र के व्यासभाष्य में क्षणिकवाद को उपस्थित करके निराकरण किया है। उनकी मान्यता है कि प्रत्येक पदार्थ क्षणिक है, उत्पन्न होकर क्षण-भर में नष्ट हो जाता है, चित्त भी क्षणिक है। वह उत्पन्न होकर क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है। उनकी यह भी मान्यता है कि चित्त को एकाग्र करके अपने प्रयोजन की सिद्धि करनी चाहिये। इस मान्यता में भाष्यकार ने अनेक दोष दर्शाये, उनको भाष्य में देख लें।
यदि चित्त को क्षणिक माना जाता है और उसको एकाग्र करने का उपदेश भी दिया जाता है तो क्षण-भर में वह एक पदार्थ में एकाग्र हो पाएगा कि दूसरे क्षण में नष्ट भी हो जाएगा तो फिर उसको एकाग्र करने का प्रयास व्यर्थ ही है। वस्तुतः चित्त क्षणिक नहीं है क्योंकि उनके मत में चित्त किसी वस्तु को देखता है और कुछ घण्टों के पश्चात् कहता है कि जिस वस्तु को मैंने देखा था, उसका ही मैं स्पर्श कर रहा हूँ। चित्त को क्षणिक मानने पर क्षणिकवादियों का यह व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये कोई व्यक्ति किसी से कुछ रुपये उधार लेता है और यह कहता है कि मैं आपके रुपये कल दे दूँगा। अगले दिन वह उसे रुपये नहीं देता। रुपये देने वाला व्यक्ति उससे रुपये मांगता है। वह ऋणी व्यक्ति कहता है कि जिसने आपसे रुपये लिए थे वह कोई और था अब वह नहीं रहा। क्षणिकवादियों के अनुसार यह लोक - व्यवहार उपपन्न नहीं होता किन्तु लोकव्यवहार चल रहा है। यदि उनके मन्तव्य को सत्य मान लेवें तो लोकव्यवहार अस्तव्यस्त हो जायगा। इत्यादि इस मान्यता में अनेक दोष हैं। इसलिये क्षणिकवाद सत्य नहीं है।
वास्तविकता तो यह है कि तीन पदार्थ अनादि हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। ईश्वर साध्य है, जीव साधक है और प्रकृति साधन है। चित्त प्रकृति से बना हुआ है, जो लम्बेकाल पर्यन्त रहता है, क्षणिक नहीं है। जीवात्मा का वह साधन है। योगाभ्यास के माध्यम से उसको एकाग्र किया जाता है और एकाग्रता के पश्चात् परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है। उससे ईश्वरसाक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति होने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। यह चित्त को क्षणिक न मानने पर ही सम्भव है। अतः यही मान्यता ठीक है॥३२॥