Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 32

1/32
Sutra
तत्प्रतिषेधार्थं एकतत्त्वाभ्यासः ॥ १.३२ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - अथैते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षास्ताभ्यामेवाभ्यासवैराग्याभ्यां निरोधव्याः। तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन्निदमाह

अर्थ - ये सभी विक्षेप समाधि के विरोधी हैं। ये अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही निरोध करने योग्य हैं। अब उनमें से अभ्यास के विषय का उपसंहार करते हुए सूत्र कहा जाता है-

Word Meaning

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥३२॥-

शब्दार्थ - (तत्-प्रतिषेधार्थम्) उन पूर्वोक्त विघ्नों - उपविघ्नों के विनाश के लिये, (एक-तत्त्व-अभ्यासः) एक तत्त्व ईश्वर का पुनः-पुनः अभ्यास = चिन्तन करना चाहिये।

सूत्रार्थ - पूर्वोक्त व्याधि आदि विघ्नों-उपविघ्नों के विनाश के लिये एक तत्त्व 'ईश्वर' का पुनः-पुनः अभ्यास = उपासना करनी चाहिये।

Vyas Bhashya

विक्षेपप्रतिषेधार्थमेकतत्त्वावलम्बनं चित्तमभ्यसेत्। यस्य तु प्रत्यर्थनियतं प्रत्ययमात्रं क्षणिकं च चित्तं तस्य सर्वमेव चित्तमेकाग्रं नास्त्येव विक्षिप्तम्। यदि पुनरिदं सर्वतः प्रत्याहृत्यैकस्मिन्नर्थे समाधीयते तदा भवत्येकाग्रमित्यतो न प्रत्यर्थनियतम्।

योऽपि सदृशप्रत्ययप्रवाहेण चित्तमेकाग्रं मन्यते तस्यैकाग्रता यदि प्रवाहचित्तस्य धर्मस्तदैकं नास्ति प्रवाहचित्तं, क्षणिकत्वात्। अथ प्रवाहांशस्यैव प्रत्ययस्य धर्मः स सर्वः सदृशप्रत्ययप्रवाही वा विसदृशप्रत्ययप्रवाही वा प्रत्यर्थनियतत्वादेकाग्र एवेति विक्षिप्तचित्तानुपपत्तिः। तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं चित्तमिति। यदि च चित्तेनैकेनानन्विताः स्वभावभिन्नाः प्रत्यया जायेरन्नथ कथमन्यप्रत्ययदृष्टस्यान्यः स्मर्ता भवेत्, अन्यप्रत्ययोपचित्तस्य च कर्माशयस्यान्यः प्रत्यय उपभोक्ता भवेत् ? कथंचित्समाधीयमानमप्येतद्गोमयपायसीयं न्यायमाक्षिपति।

किं च स्वात्मानुभवापह्नवश्चित्तस्यान्यत्वे प्राप्नोति। कथम् ? यदहमद्राक्षं तत्स्पृशामि यच्चास्प्राक्षं तत्पश्यामीत्यहमिति प्रत्ययः सर्वस्य प्रत्ययस्य भेदे सति प्रत्ययिन्यभेदेनोपस्थितः। एकप्रत्ययविषयोऽयमभेदात्माऽहमिति प्रत्ययः कथमत्यन्तभिन्नेषु चित्तेषु वर्तमानं सामान्यमेकं प्रत्ययिनमाश्रयेत् ? स्वानुभवग्राह्यश्चायमभेदात्माऽहमिति प्रत्ययः। न च प्रत्यक्षस्य माहात्म्यं प्रमाणान्तरेणाभिभूयते। प्रमाणान्तरं च प्रत्यक्षबलेनैव व्यवहारं लभते। तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं च चित्तम्॥३२॥

व्या० भा० अ० - विक्षेपों के विनाश के लिए (योगी) एकतत्त्व ईश्वर के आलम्बन वाले चित्त का अभ्यास करें। जिसके मत में चित्त प्रत्येक (ज्ञेय) पदार्थ के लिए निश्चित एवं ज्ञानरूप तथा क्षणिक है उसके मत में प्रत्येक चित्त एकाग्र ही है। वह विक्षिप्त है ही नहीं। यदि यह सब ओर से हटाकर एक वस्तु में समाहित किया जाता है तब एकाग्र होता है तो वह प्रत्येक पदार्थ लिए निश्चित नहीं कहा जा सकता अर्थात् एक-एक पदार्थ के लिए एक-एक चित्त नहीं कहा जा सकता।

जो भी सदृश ज्ञानों के प्रवाह के कारण चित्त को एकाग्र मानता है उसकी एकाग्रता यदि प्रवाह चित्त का धर्म है, तो चित्त के क्षणिक होने से एक प्रवाहचित्त नहीं है। और यदि (एकाग्रता) प्रवाहांशभूत ज्ञान का धर्म हो तो इस प्रकार से सभी चित्त चाहे वे सदृशज्ञानप्रवाह के अंश हों वा असदृशज्ञानप्रवाह के अंश हों, प्रत्येक (ज्ञेय) पदार्थ के लिए निश्चित होने के कारण एकाग्र ही हुए तब विक्षिप्त चित्त ही सिद्ध नहीं होता। इसलिये अनेक पदार्थों के लिए अवस्थित चित्त एक है।

यदि एक चित्त से असम्बद्ध भिन्न-भिन्न ज्ञान उत्पन्न होते हैं ऐसे माना जाए तो अन्य चित्त द्वारा देखे गये पदार्थ का स्मरण करने वाला अन्य चित्त कैसे हो सकता है ? अन्य चित्त के द्वारा अर्जित कर्माशय का उपभोग करने वाला चित्त अन्य कैसे हो सकता है ? किसी प्रकार समाधान किया जाए तो भी यह गोमयपायसीय न्याय से अनुपयुक्त है ।

और भी चित्त अन्यत्व के होने पर अपने अनुभव का भी विरोध प्राप्त हो जाता है। कैसे ? जिसको मैंने देखा था उसको छूता हूँ और जिसको छूया था उसको मैं देखता हूँ ऐसा प्रत्येक का अनुभवात्मक ज्ञान ज्ञानों के भिन्न-भिन्न होने पर भी और एक ज्ञाता में अभिन्न रूप से उपस्थित रहता है। एक ही रूप से अनुभव में आने वाला "मैं" ऐसा ज्ञान अलग-अलग चित्तों में स्थित रहता हुआ एक सामान्य ज्ञाता का बोध कैसे कर सकता है। एक समान रहने वाला 'मैं' का ज्ञान अपने-अपने निज (प्रत्यक्ष) अनुभव का विषय है। प्रत्यक्ष ज्ञान का महत्त्व अन्य प्रमाणों के द्वारा तिरस्कृत नहीं किया जाता और अन्य प्रमाण प्रत्यक्ष के बल पर ही व्यवहार में आते हैं। इस कारण अनेक अर्थों में विद्यमान रहने वाला चित्त एक है॥३२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में बतलाया गया है कि व्याधि आदि योग के विघ्नों और उपविघ्नों का विनाश करने के लिये एक तत्त्व (ईश्वर) का अभ्यास करना चाहिए अर्थात् बार-बार ईश्वर प्रणिधान का अनुष्ठान करना चाहिए।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि सूत्रोक्त एक तत्त्व से किसी स्थूल पदार्थ का ग्रहण करना चाहिये। उस स्थूल पदार्थ की उपासना से व्याधि आदि विघ्न और उपविघ्न दूर हो जाते हैं। वास्तव में यह मान्यता ठीक नहीं है। इसका प्रथम कारण यह है कि व्यासभाष्य में यह बात कही है कि इस अगले सूत्र के द्वारा अभ्यास का उपसंहार किया जाता है। यहाँ पर उपक्रम ईश्वर प्रणिधान का है, तो उपसंहार में भी एकतत्त्व से ईश्वर का ग्रहण करना ही उचित है, किसी स्थूल पदार्थ का नहीं।

दूसरा कारण यह है कि मीमांसा दर्शन में किसी वाक्य का अर्थ करने में श्रुति आदि छह कारण माने जाते हैं। उनमें से एक प्रकरण है। प्रकरण के आधार पर यहाँ पर ईश्वर का ही ग्रहण करना उचित है।

तीसरा कारण यह है कि विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए किसी शब्द का बार-बार आवर्तन किया जाता है। जैसे योगदर्शनकार ने ईश्वरप्रणिधान का उल्लेख अनेक बार किया है। इससे पुनरुक्ति दोष नहीं आता। 

चौथा कारण यह है कि व्याधि आदि विघ्न और उपविघ्न किसी स्थूल पदार्थ की उपासना से कभी भी दूर नहीं हो सकते। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में लिखा है " और उनके छुड़ाने का मुख्य उपाय यही है कि - तत्प्रतिषेधा.......जो केवल एक अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व है उसी में प्रेम और सर्वदा उसी की आज्ञापालन में पुरुषार्थ करना है, वही एक उन विघ्नों के नाश करने को वज्ररूप शस्त्र है, अन्य कोई नहीं। इसलिये सब मनुष्यों को अच्छी प्रकार प्रेमभाव से परमेश्वर के उपासनायोग में नित्य पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे वे सब विघ्न दूर हो जायें।"

इस सूत्र के व्यासभाष्य में क्षणिकवाद को उपस्थित करके निराकरण किया है। उनकी मान्यता है कि प्रत्येक पदार्थ क्षणिक है, उत्पन्न होकर क्षण-भर में नष्ट हो जाता है, चित्त भी क्षणिक है। वह उत्पन्न होकर क्षणमात्र में नष्ट हो जाता है। उनकी यह भी मान्यता है कि चित्त को एकाग्र करके अपने प्रयोजन की सिद्धि करनी चाहिये। इस मान्यता में भाष्यकार ने अनेक दोष दर्शाये, उनको भाष्य में देख लें।

यदि चित्त को क्षणिक माना जाता है और उसको एकाग्र करने का उपदेश भी दिया जाता है तो क्षण-भर में वह एक पदार्थ में एकाग्र हो पाएगा कि दूसरे क्षण में नष्ट भी हो जाएगा तो फिर उसको एकाग्र करने का प्रयास व्यर्थ ही है। वस्तुतः चित्त क्षणिक नहीं है क्योंकि उनके मत में चित्त किसी वस्तु को देखता है और कुछ घण्टों के पश्चात् कहता है कि जिस वस्तु को मैंने देखा था, उसका ही मैं स्पर्श कर रहा हूँ। चित्त को क्षणिक मानने पर क्षणिकवादियों का यह व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये कोई व्यक्ति किसी से कुछ रुपये उधार लेता है और यह कहता है कि मैं आपके रुपये कल दे दूँगा। अगले दिन वह उसे रुपये नहीं देता। रुपये देने वाला व्यक्ति उससे रुपये मांगता है। वह ऋणी व्यक्ति कहता है कि जिसने आपसे रुपये लिए थे वह कोई और था अब वह नहीं रहा। क्षणिकवादियों के अनुसार यह लोक - व्यवहार उपपन्न नहीं होता किन्तु लोकव्यवहार चल रहा है। यदि उनके मन्तव्य को सत्य मान लेवें तो लोकव्यवहार अस्तव्यस्त हो जायगा। इत्यादि इस मान्यता में अनेक दोष हैं। इसलिये क्षणिकवाद सत्य नहीं है।

वास्तविकता तो यह है कि तीन पदार्थ अनादि हैं ईश्वर, जीव और प्रकृति। ईश्वर साध्य है, जीव साधक है और प्रकृति साधन है। चित्त प्रकृति से बना हुआ है, जो लम्बेकाल पर्यन्त रहता है, क्षणिक नहीं है। जीवात्मा का वह साधन है। योगाभ्यास के माध्यम से उसको एकाग्र किया जाता है और एकाग्रता के पश्चात् परवैराग्य से असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है। उससे ईश्वरसाक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति होने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। यह चित्त को क्षणिक न मानने पर ही सम्भव है। अतः यही मान्यता ठीक है॥३२॥

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