Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 31

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Sutra
दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ १.३१ ॥

Bhashya

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Word Meaning

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥३१॥

शब्दार्थ (दुःख) दुःख = आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक आदि तीन प्रकार के। (दौर्मनस्य)  इच्छापूर्ति न होने पर चित्त का क्षोभ, (अङ्गमेजयत्वम्) अङ्गों का कंपन, (श्वासः) प्राणायाम करते समय इच्छा के विरुद्ध विशेषरूप से गतिपूर्वक श्वास का अन्दर आना, (प्रश्वासः) इसी प्रकार शीघ्रतापूर्वक श्वास का बाहर निकलना (विक्षेप - सहभुव:) विक्षेपों के साथ-साथ होने वाले।

सूत्रार्थ - दु:ख आदि उपविघ्न भी विक्षेपों के साथ-साथ विद्यमान रहते हैं।

Vyas Bhashya

दुःखमाध्यात्मिकमाधिभौतिकमाधिदैविकं च। येनाभिहताः प्राणिनस्तदुपघाताय प्रयतन्ते तदुःखम्। दौर्मनस्यमिच्छाविघाताच्चेतसः क्षोभः यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदङ्गमेजयत्वम्। प्राणो यद् बाह्यं वायुमाचामति स श्वासः। यत्कौष्ठ्यं वायुं निःसारयति स प्रश्वासः। एते विक्षेपसहभुवो विक्षिप्तचित्तस्यैते भवन्ति। समाहितचित्तस्यैते न भवन्ति॥३१॥

व्या० भा० अ० - 'दुःख' आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक हैं। जिससे पीड़ित हुए प्राणी उसके नाश के लिए प्रयत्न करते हैं वह 'दुःख' है। इच्छा के पूर्ण न होने से चित्त का क्षुब्ध होना 'दौर्मनस्य' है। जो अङ्गों को कँपाता है वह 'अङ्गमेजयत्व' है। प्राण बाहर के जिस वायु को ग्रहण करता है वह 'श्वास' है। भीतर के जिस वायु को प्राण बाहर निकालता है वह 'प्रश्वास' है। ये विक्षेपों के साथ होते हैं। ये विक्षिप्तचित्त वाले साधक के होते हैं। ये एकाग्रचित्त वाले योगी के नहीं होते॥३१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में योग के उपविघ्नों का वर्णन है। व्याधि आदि विघ्नों के होने पर ये उपविघ्न होते हैं और उनके न होने पर नहीं होते। उपविघ्नों में से एक दुःख है जिससे पीड़ित हुए हुए प्राणी उसके नाश के लिये प्रयत्न करते हैं, उसको दुःख कहते हैं। वह आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक तीन प्रकार का है। जो अपने कारण से होता है, वह आध्यात्मिक है। जो दूसरे प्राणियों के कारण से होता है, वह आधिभौतिक है और जो पृथिवी आदि भूतों के कारण से होता है, वह आधिदैविक है।

कुछ लोग कहते हैं कि दुःख और सुख, ये कोई पदार्थ नहीं हैं। यह एक कल्पनामात्र है। लोगों की यह मान्यता ठीक नहीं है क्योंकि दुःख और सुख प्रत्यक्षादि प्रमाणों से अनुभव में आते हैं और इन दोनों का प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता है। जब व्यक्ति दुःखी होता है तो उस पर भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। वह अप्रसन्न, बाधित दिखाई देता है और उस अवस्था से छूटने के लिये विविध प्रयास करता है। जब व्यक्ति सुखी होता है तो उस पर भिन्न प्रकार का प्रभाव पड़ता है। वह प्रसन्न और बाधारहित दिखाई देता है। वह उस स्थिति को छोड़ना नहीं चाहता। इसलिये दुःख एक पदार्थ है और वह योग का विरोधी है। अपनी इच्छा की पूर्ति न होने से व्यक्ति खिन्न हो जाता है। उससे मन की स्थिरता भंग हो जाती है। इसलिये यह योग का बाधक है।

उपासना-काल में अङ्गों में कम्पन होने से चित्त की एकाग्रता भंग होती है। यह कम्पन किसी रोग के कारण होता है अथवा व्यक्ति ने अपने अङ्गों को हिलाने का अभ्यास कर लिया हो, इस कारण से होता है। जब श्वास-प्रश्वास साधक के अधिकार से बाहर हो जाते हैं तो वह विधिपूर्वक प्राणायाम नहीं कर सकता और मन्त्रोचारण में भी कठिनाई होती है। इसलिये ये दोनों भी योग के उपविघ्न हैं।

इस प्रसङ्ग में यह बात ध्यान देने योग्य है कि ईश्वरप्रणिधान से शारीरिकरोग एक सीमा तक दूर होते हैं। अतितीव्र रोग दूर नहीं हो सकता। परन्तु उन रोगों को सहने की शक्ति ईश्वर से मिलती है। जिससे योगी बड़े-बड़े दुःखों को भी सह लेता है।

कुछ लोग यह कहते हैं कि योगी की समाधि अवस्था में उसके हाथादि काट दिये जाएं तो उसको कुछ भी पता नहीं चलता और उसकी समाधि भंग नहीं होती। यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि भाष्यकार महर्षि व्यासजी के अनुसार धातु, रस और करण वैषम्य को व्याधि कहा जाता है। शरीर के अङ्गों को काटने पर शरीर में रक्तधातु का परिमाण न्यून होता है। यह 'व्याधि' है। यह योग में बाधक है अर्थात् इसके रहते हुए योग नहीं हो सकता। 'तप' के विषय में उन्होंने लिखा है कि अबाधमानमनेनासेव्यमिति अर्थात् तप वही है जो साधक को बाधा न पहुँचावे। दुःख योग में बाधक है। इसलिये इस मान्यता में वास्तविकता नहीं है। क्योंकि शरीर के हाथादि अङ्गों के काट देने पर समाधि भंग हो जाती है। इसीलिये व्याधि को योग का शत्रु बतलाया है।

कुछ लोगों की यह मान्यता है कि योगी देह के न रहने पर भी बहुत कालपर्यन्त मन्वन्तरों तक समाधिस्थ रहते हैं। जब अत्यन्त आघात से वा मादकपदार्थ (नशीलेपदार्थ) के सेवन से शरीर मूर्छित हो जाता है। तब उस समय आत्मा को किसी प्रकार का ज्ञान ही नहीं रहता है तो शरीररहित जीवात्मा कैसे समाधिस्थ रह सकता है ? अतः उक्त मान्यता ठीक नहीं है॥३१॥

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