Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 30

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Sutra
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभुउमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्. तेऽन्तरायाः ॥ १.३० ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - केऽन्तराया ये चित्तस्य विक्षेपाः ? के पुनस्ते कियन्तो वेति ?

अर्थ - अब चित्त में विक्षेप को उत्पन्न करने वाले विघ्न कौन - २ से हैं, वे कितने और किस प्रकार के स्वरूप वाले हैं, अब इस विषय में बतलाया जाता है -

Word Meaning

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥३०॥

शब्दार्थ - (व्याधि..... अनवस्थितत्वानि) व्याधि = धातु, रस तथा इन्द्रियों की विषमता। स्त्यानम् = सत्य कर्मों में अप्रीति। संशयः = एक विषय में दो प्रकार का परस्पर भिन्न भिन्न ज्ञान अर्थात् यह पदार्थ ऐसा है अथवा ऐसा नहीं है। प्रमादः = यम-नियमादि समाधि के साधनों का आचरण न करना (ध्यान नहीं देना, महत्त्वहीन समझकर उपेक्षा करना, लापरवाही) आलस्यम् = शरीर या चित्त के भारीपन के कारण योगाभ्यास में प्रवृत्त न होना। अविरतिः वैराग्य का अभाव अर्थात् विषयों में राग। भ्रान्तिदर्शनम् = विपरीत ज्ञान। अलब्धभूमिकत्वम् = समाधि की प्राप्ति न होना। अनवस्थितत्वम् समाधि प्राप्त होने पर भी पुनः चित्त का स्थिर न होना। ( चित्तविक्षेपा:) चित्त को विक्षिप्त करने वाले कारण। (ते) वे [ये] (अन्तरायाः) योग के विघ्न हैं। 

सूत्रार्थ - समाधि के व्याधि आदि नौ विरोधी कारण अर्थात् विघ्न, बाधायें, 'अन्तराय' हैं। 

Vyas Bhashya

नवान्तरायाश्चित्तस्य विक्षेपाः, सहैते चित्तवृत्तिभिर्भवन्ति। एतेषामभावे न भवन्ति पूर्वोक्ताश्चित्तवृत्तयः। तत्र व्याधिर्धातुरसकरणवैषम्यम्। स्त्यानमकर्मण्यता चित्तस्य। संशय उभयकोटिस्पृग्विज्ञानं - स्यादिदमेवं नैवं स्यादिति। प्रमादः समाधिसाधनानामभावनम्। आलस्य कायस्य चित्तस्य च गुरुत्वादप्रवृत्तिः। अविरतिश्चित्तस्य विषयसंप्रयोगात्मा गर्धः। भ्रान्तिदर्शनं विपर्ययज्ञानम्। अलब्धभूमिकत्वं समाधिभूमेरलाभः। अनवस्थितत्वं लब्धायां भूमौ चित्तस्याप्रतिष्ठा। समाधिप्रतिलम्भे हि सति तदवस्थितं स्यादिति। एते चित्तविक्षेपा नव योगमला योगप्रतिपक्षा योगान्तराया इत्यभिधीयन्ते॥३०॥

व्या० भा० अ० - चित्त को विक्षिप्त करने वाले नवविघ्न हैं। ये चित्तवृत्तियों के साथ होते हैं। इनके न होने पर पूर्वोक्त प्रमाणादि चित्तवृत्तियाँ नहीं होती। उनमें से व्याधि : = धातु (वातपित्त-कफ) में विषमता का होना; रस (भोजन से बने रस) में विषमता का होना, करण (इन्द्रियों) में अल्प देखना व सुनना आदि के कारण विषमता का होना। स्त्यान = योग के अनुष्ठान की योग्यता होने पर भी चित्त की अकर्मण्यता योगसाधनों के अनुष्ठान में अप्रीति। संशय एक विषय में दो विरुद्ध ज्ञानों का होना, जैसे कि ईश्वर है वा नहीं। प्रमाद योग साधनों का अनुष्ठान न करना। आलस्य = शरीर एवं चित्त के भारी होने के कारण योग में प्रवृत्ति का न होना। अविरति चित्त की विषयभोगात्मक आकांक्षा। भ्रान्तिदर्शन = मिथ्याज्ञान। अलब्धभूमिकत्वम् = समाधि की किसी भूमि की प्राप्ति न होना। अनवस्थितत्वम् = प्राप्त हुई (समाधि की ) भूमि में चित्त का स्थिर न होना। समाधिभूमि का लाभ होने पर चित्त को उसमें स्थिर होना चाहिए। ये नौ चित्त के विक्षेप योग के मल, योग के शत्रु, योग के विघ्न कहे जाते हैं॥३०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में व्याधि आदि योग के विघ्नों का कथन किया है। योगजिज्ञासुओं को योग के साधनों का और उसके बाधकों का भी परिज्ञान कर लेना चाहिए। जैसे अपने लक्ष्य पर पहुँचने के लिए साधनों की आवश्यकता है, वैसे ही बाधकों को जानना और उनको दूर करना भी आवश्यक है।

सूत्र में यह बात कही है कि ईश्वरप्रणिधान से व्याधि दूर हो जाती है। यह कैसे दूर होती है, यह जानना आवश्यक है। व्याधि अर्थात् रोग के दूर करने में साधक और ईश्वर दोनों कारण बनते हैं। साधक शारीरिक विज्ञान को प्राप्त करे। शरीर किस प्रकार के खान-पान से स्वस्थ और अस्वस्थ होता है, इसका परिज्ञान भी कर लेवे। शरीर को स्वस्थ बनाने में यम-नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इन बातों को आचरण में लाते हुए ईश्वरोपासना करने से रोग की निवृत्ति होती है। ईश्वरभक्ति से योगाभ्यासी को सुख मिलता है। उससे विषयभोगों की इच्छा समाप्त हो जाती है। विषयभोग की इच्छा के दूर होने से ब्रह्मचर्य का पालन करना सरल हो जाता है। ब्रह्मचर्य के पालन से शरीर स्वस्थ और बलवान् होता है। इसी प्रकार से उपासक अपने खान-पान पर भी नियन्त्रण करने में समर्थ हो जाता है। ईश्वरोपासना से साधक की अविद्या का नाश होता है और विद्या की प्राप्ति होती है। अविद्या के नाश से काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, इन मानसिक रोगों का विनाश होता है। इन के विनाश से शरीर और मन दोनों स्वस्थ हो जाते हैं।

योग में स्त्यान (अकर्मण्यता) बाधक है। इसका अभिप्राय यह है कि योगानुष्ठान से बचने की इच्छा होना। जिस कार्य में व्यक्ति की रुचि नहीं होती उसका सम्पादन करना कठिन है। ईश्वरोपासना करने से साधक की योगाभ्यास में रुचि होती है। क्योंकि उपासना से ईश्वर की विशेषताओं का ज्ञान होता है। किसी पदार्थ के गुणों को जानने से उसमें प्रीति होती है।

 

संशय योग में बाधक है। संशय के होने पर व्यक्ति अपने लक्ष्य पर पहुँचने का प्रयास छोड़ देता है। योगाभ्यास करते समय अनेक संशय होते हैं। जैसे कि व्यक्ति विचारता है जिस ईश्वर को मैं प्राप्त करना चाहता हूँ, वह है वा नहीं ? क्योंकि कुछ लोग उसको मानते हैं और कुछ नहीं मानते। यदि यह मान लिया जाये कि वह है तो यह ज्ञात नहीं कि निराकार है वा साकार ? कोई कहता है उसकी प्राप्ति होती है, कोई कहता है नहीं होती। जीवात्मा के विषय में भी संशय होता है कि पता नहीं शरीर के नष्ट होने पर जीवात्मा शेष रहता है वा नहीं ? कोई कहता है कि जीवात्मा ईश्वर का ही अंश है और कोई कहता है जीव ईश्वर से पृथक् है। योगाभ्यास से मुझे सुख मिलेगा वा नहीं ? इन बातों में संशय होता है। योगाभ्यास के लिए कुछ लोग यमनियमों की आवश्यकता को स्वीकार नहीं करते और कुछ लोग कहते हैं यम-नियम अनिवार्य हैं। इत्यादि अनेक विषयों में संशय होता है। ईश्वरोपासना से समस्त संशय दूर हो जाते हैं। ततो न विचिकित्सति॥यजु० ४०/६॥

भावार्थ - जो विद्वान् सब प्रकृति आदि पदार्थों में सर्वत्र व्यापक परमात्मा को देखता है वह (ततः) ऐसे सम्यक् दर्शन के पीछे (न विचिकित्सति) सर्वथा संदेह को प्राप्त नहीं होता। I

प्रमाद का अभिप्राय है कि योगसाधनों के अनुष्ठान में लापरवाही करना। ईश्वरोपासना करते करते कालान्तर में सुख की अनुभूति होने लगती है। उससे व्यक्ति उत्साहित होकर योगसाधनों का अनुष्ठान करने लगता है।

आलस्य उपासना में बाधक है। आलस्य का मुख्य कारण तमोगुण है। ईश्वरोपासना से तमोगुण दूर होता है और सत्त्वगुण की प्रधानता होती है।

अविरति अर्थात् इन्द्रियों का विषयभोगों में जो राग है, वह योग में बाधक है। जब विषयभोगों की इच्छा होती है तब साधक की उपासना भंग हो जाती है। ईश्वर से मिलने वाले सुख से विषयभोग की इच्छा समाप्त हो जाती है।

भ्रान्तिदर्शन ( मिथ्याज्ञान ) योग में बाधक है। ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से मिथ्याज्ञान की निवृत्ति होती है।

अलब्धभूमिकत्त्व - साधना करने पर भी समाधि की प्राप्ति न होना अलब्धभूमिकत्व कहलाता है। यह योग में बाधक है। ईश्वरप्रणिधान से समाधि की प्राप्ति शीघ्र ही होती है।

अनवस्थितत्त्व अर्थात् समाधि प्राप्त होने पर पुनः उसका छूट जाना = समाधि में चित्त को स्थिर न कर पाना। समाधि की प्राप्ति होने पर उसको स्थिर करने में भी ईश्वर सहायता करता है। इस प्रकार विघ्न और उपविघ्नों का नाश ईश्वरप्रणिधान से होता है॥३०॥

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