Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 3

1/3
Sutra
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १.३ ॥

Bhashya

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Inception

तदवस्थे चेतसि विषयाभावाद् बुद्धिबोधात्मा पुरुषः किंस्वभाव ? इति – 

अर्थ - चित्त के निरुद्धावस्था में रहने पर विषयों का अभाव होने के कारण बुद्धि (चित्त) का प्रति संवेदन करने वाला पुरुष किस प्रकार के स्वभाव वाला होता है यह (निम्न सूत्र से बतलाया जाता है) -

Word Meaning

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥३॥

शब्दार्थ - (तदा) तब असम्प्रज्ञात समाधि [निरुद्धावस्था] में (द्रष्टुः) जीवात्मा और परमात्मा के (स्वरूपे) स्वरूप में (अवस्थानम्) अवस्थिति होती है।

सूत्रार्थ - तब असम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप में अवस्थिति होती है अर्थात् जीवात्मा अपने और ईश्वर के स्वरूप को ठीक-ठीक जानता है। 

Vyas Bhashya

व्या० भा० - स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिर्यथा कैवल्ये॥३॥

व्या० भा० अ० - उस असम्प्रज्ञात योग की अवस्था में पुरुष अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है जैसा कि वह कैवल्यावस्था में रहता है॥३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में योग के मुख्य फल का वर्णन है।

जब साधक असम्प्रज्ञात स्थिति को प्राप्त कर लेता है तब वह अपने स्वरूप को ठीक-ठीक जान लेता है। यद्यपि सम्प्रज्ञात समाधि में भी जीवात्मा अपने स्वरूप को जान लेता है परन्तु असम्प्रज्ञात समाधि में सम्प्रज्ञात समाधि की अपेक्षा जीवात्मा को अपने स्वरूप का अधिक स्पष्ट ज्ञान होता है। अर्थात् मैं सत्व, रजस्, तमस् - रूप प्रकृति और उससे बने शरीर, इन्द्रिय आदि कार्यों से पृथक् हूँ, ऐसा जान लेता है। उस समय वह प्रकृति वा प्राकृतिक पदार्थों की उपासना को छोड़कर ईश्वर के स्वरूप में मग्न हो जाता है। इसी शरीर में रहता हुआ समस्त क्लेशों से छूट जाता है और मोक्षानन्द का अनुभव उसी प्रकार करता है जिस प्रकार मुक्तात्मा मोक्ष में अनुभव करते हैं। इस सूत्रभाष्य में महर्षि व्यास जी ने लिखा है कि "स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिर्यथा कैवल्ये”। मोक्षावस्था में जीवात्मा जिस प्रकार अपने शुद्ध स्वरूप को जानता हुआ परमात्मा के आनन्द का अनुभव करता है उसी प्रकार योगी इस शरीर में अपने विशुद्धस्वरूप को जानता हुआ ईश्वर में मग्न होकर उससे आनन्द का अनुभव करता है। इसके अनुसार जीवात्मा की अपने स्वरूप में तथा ईश्वर के स्वरूप में स्थिति होती है। अर्थात् इस स्थिति में जीवात्मा अपने तथा ईश्वर के स्वरूप को यथावत् जानता है। यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि सूत्र का मुख्यार्थ जीवात्मा का परमेश्वर के स्वरूप में स्थित होना है न कि केवल अपने स्वरूप में स्थित होना। क्योंकि केवल अपने स्वरूप में स्थित होने से जीव के समस्त क्लेशों की निवृत्ति एवं नित्यानन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती। वेद में भी इस बात का उल्लेख है -

 

तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।। यजु० ३१/१८॥

उस परम पुरुष ईश्वर को ही जानकर जीवात्मा मृत्यु आदि दुःखों से छूट जाता है। मुक्ति के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है।

    अकामो धीरो अमृतः स्वयम्भू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः।

    तमेव विद्वान् न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम्॥अथर्व० १०/८/४४॥

अकामः = अपने लिए कामनाओं से रहित; धीरः = विद्वान्, सर्वज्ञ, अपने नियमों से विचलित न होने वाला; अमृतः = मृत्यु से रहित; स्वयम्भूः = अपने आप वर्तमान; रसेन तृप्तः = आनन्द न्यूनता से परिपूर्ण; कुतश्चन न ऊन: = कहीं से भी अन्यून,  न्यूनता रहित; तम् आत्मानं धीरं अजरं युवानम् एव = उस व्यापक परमात्मा, विद्वान्, जराहीन, बलवान् को ही जानने वाला; मृत्योः न बिभाय = मृत्यु दुःख से नहीं डरता है।

न ऋते त्वदमृता मादयन्ते॥ऋग्वेद १० / ११ /१॥

हे ईश्वर ! तेरे बिना मुक्तात्मा आनन्दित नहीं होते।

रसो वै सः। रसं हि लब्ध्वा आनन्दी भवति॥ तैत्तिरीय उपनिषद् २/७॥

वह परमेश्वर रस = आनन्दस्वरूप है। उसको प्राप्त करके जीवात्मा आनन्दयुक्त होता है। जीवात्मा के अपने स्वरूप में स्थित होने से दुःखों की निवृत्ति एवं आनन्द की प्राप्ति नहीं होती। परमात्मा को जानकर ही योगी आनन्द से युक्त और दुःखों से मुक्त होता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः, तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' इन दोनों सूत्रों का अर्थ उक्त वेदमन्त्र, उपनिषद् एवं योगदर्शन व्यासभाष्यानुकूल लिखा है। उनका लेख निम्नलिखित है -

“ये योगशास्त्र पातञ्जल के सूत्र हैं। मनुष्य रजोगुण, तमोगुण युक्त कर्मों से भी मन को रोक शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त कर्मों से भी मन को रोक शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त हो पश्चात् उसका निरोधकर एकाग्र अर्थात् एक परमात्मा और धर्मयुक्त कर्म इनके अग्रभाग में चित्त को ठहरा रखना, निरुद्ध अर्थात् सब ओर से मन की वृत्ति को रोकना॥१॥ जब चित्त एकाग्र और निरुद्ध होता है तब सब के द्रष्टा ईश्वर के स्वरूप में जीवात्मा की स्थिति होती है।। २।। इत्यादि साधन मुक्ति के लिए करे।”

नवम समुल्लास, सत्यार्थ प्रकाश -

जीवात्मा कैवल्य में परमेश्वर के आनन्द का अनुभव करता है। उसी प्रकार योगी शरीर के रहते हुए असम्प्रज्ञात समाधि में परमेश्वर के आनन्द का अनुभव करता है। इसमें इतना अन्तर रहता है कि जीवात्मा को मोक्षावस्था में निर्विघ्न रूप से आनन्द प्राप्त होता है जबकि शरीर के बने रहने से योगी को उस आनन्द में विघ्न बाधाएँ सम्भव हैं।

संसार में प्रत्येक मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति देखी जाती है कि वह समस्त दुःखों, बन्धनों एवं पराधीनता से मुक्त होना चाहता है और नित्यानन्द, मोक्ष एवं स्वतन्त्रता को प्राप्त करना चाहता है। उसके ये दोनों प्रयोजन विशुद्ध योग से ही सिद्ध हो सकते हैं। इनको सिद्ध करने का अन्य कोई उपाय नहीं है॥३॥

Footnote

योगदर्शन में चित्त के लिए मन और बुद्धि शब्द का भी प्रयोग किया गया है।

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