Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 25

1/25
Sutra
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजं ॥ १.२५ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० किञ्च

अर्थ - और भी (पुरुषविशेष ईश्वर की विशेषतायें हैं)

Word Meaning

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्॥२५॥

शब्दार्थ - (तत्र) उसमें (निर्-अतिशयम्) अतिशय से रहित = बढ़ती से रहित (सर्वज्ञबीजम्) सर्वज्ञता का बीज है

सूत्रार्थ - उस पूर्वोक्त ईश्वर में अतिशय सर्वज्ञता का बीज है। अर्थात् न तो किसी में ईश्वर के ज्ञान के तुल्यज्ञान है और न ही उससे अधिक।

Vyas Bhashya

व्या० भा० - यदिदमतीतानागतप्रत्युत्पन्नप्रत्येकसमुच्चयातीन्द्रियग्रहणमल्पं बह्विति सर्वज्ञबीजमेतद्धि वर्धमानं यत्र निरतिशयं स सर्वज्ञः। अस्ति काष्ठाप्राप्तिः सर्वज्ञबीजस्य सातिशयत्वात्परिमाणवदिति। यत्र काष्ठाप्राप्तिर्ज्ञानस्य स सर्वज्ञः। स च पुरुषविशेष इति। सामान्यमात्रोपसंहारे च कृतोपक्षयमनुमानं न विशेषप्रतिपत्तौ समर्थमिति। तस्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्यन्वेष्या। तस्यात्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रहः प्रयोजनम्, ज्ञानधर्मोपदेशेन कल्पप्रलयमहाप्रलयेषु संसारिणः पुरुषानुद्धरिष्यामीति। तथा चोक्तम्-आदिविद्वान्निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद्भगवान्परमर्षिरासुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाचेति॥२५॥

व्या० भा० अ० - भूत, भविष्य, वर्त्तमान में से किसी एक का वा सभी का अतीन्द्रिय ज्ञान जो किसी में न्यून और किसी में अधिक होता है, वही सर्वज्ञता का बीज है। वही बढ़ता-बढ़ता जिसमें पराकाष्ठा को प्राप्त हो जाता है वह 'सर्वज्ञ' कहा जाता है। सर्वज्ञता का बीज पराकाष्ठा को प्राप्त होता है उसमें न्यूनाधिक्य सम्भव होने के कारण। जिसमें न्यूनाधिक्य की स्थिति सम्भव होती है उसकी पराकाष्ठा भी होती है। जैसे परिमाण।

जिसमें ज्ञान की काष्ठाप्राप्ति है वह सर्वज्ञ है, और वह पुरुषविशेष है। सामान्यज्ञानमात्र प्रस्तुत करके निवृत्त हुआ अनुमानप्रमाण पदार्थ के विशेष धर्म को बताने में समर्थ नहीं होता। इसलिये ईश्वर के संज्ञादि विशेषों का ज्ञान आगमप्रमाण से प्राप्त करना चाहिये। उस (ईश्वर) का अपना कोई स्वार्थ न होने पर भी प्राणियों पर अनुग्रह करना प्रयोजन है। ज्ञान एवं धर्म के उपदेश के द्वारा कल्पप्रलय एवं महाप्रलय में "सांसारिक लोगों का उद्धार करूँ" यह उसका प्रयोजन है। ऐसा कहा गया है आदिविद्वान् भगवान् सर्वज्ञ (ईश्वर) ने जिस ज्ञान से मनुष्यों को विद्वान् बनाया जाता है उस ज्ञान को सुसज्जित करके करुणा से जिज्ञासायुक्त जीवात्मा के लिए वेदज्ञान दिया॥२५॥

Yog Prakash

दर्शनकार ने इस सूत्र में निरतिशयज्ञान के द्वारा पुरुष विशेष 'ईश्वर' का स्वरूप बतलाया है।

संसार में ज्ञान की दृष्टि से मनुष्यों के स्तर भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं। किसी व्यक्ति का ज्ञान अल्प है, दूसरे का ज्ञान उससे अधिक और तीसरे का ज्ञान उससे भी अधिक है। इस ज्ञान को 'सातिशयज्ञान' कहते हैं। यही सर्वज्ञता का बीज है। यह ज्ञान बढ़ते-बढ़ते ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है कि जिससे बढ़कर आगे अन्य कोई ज्ञान हो ही नहीं सकता। ऐसे ज्ञान का नाम 'निरतिशय' है। जिसमें यह ज्ञान रहता है, वह पुरुषविशेष ईश्वर सर्वज्ञ है। जैसे संसार में कुछ छोटे पदार्थ हैं, कुछ उनसे बड़े हैं और कुछ उनसे भी बड़े हैं। इस प्रकार परिमाण की दृष्टि से जिससे बढ़कर अन्य कोई भी पदार्थ न हो, वह निरतिशय कहा जायेगा। ऐसे ही ईश्वर का ज्ञान निरतिशय है। इसी प्रकार से छोटे पदार्थों में भी जो सबसे छोटा है, वह निरतिशय कहा जायेगा। ईश्वर का ज्ञान न घटता है और न बढ़ता है क्योंकि वह स्वाभाविक है। स्वाभाविक पदार्थ कभी घटता-बढ़ता नहीं। ईश्वर जीवों के कल्याणार्थ अपना ज्ञान प्रदान करता है। उसी ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से जीव अपने व्यवहार की सिद्धि और मोक्ष की सिद्धि करते हैं, केवल अपने स्वाभाविक ज्ञान से नहीं।

यहाँ पर एक प्रश्न उठता है कि ईश्वर सृष्टि की रचना क्यों करता है और जीवों को अपना ज्ञान क्यों देता है ? इसका उत्तर है - जीवों के कल्याणार्थ। इस विषय में पूर्वसूत्र में भी लिखा जा चुका है। ईश्वर के विषय में एक जिज्ञासा होती है कि वह सर्वज्ञ क्यों है ? इसका समाधान यह है कि वह सर्वव्यापक है। कोई यह कह सकता है कि सर्वव्यापक होने में क्या प्रमाण है ? इसका उत्तर यह है कि संसार में लोक लोकान्तरों का निर्माण एवं उनका व्यवस्थित संचालन सर्वत्र हो रहा है इस कार्य को ईश्वर के अतिरिक्त और कोई कर नहीं सकता, जहाँ जहाँ ये क्रियायें हो रही हैं वहाँ वहाँ ईश्वर का होना अनिवार्य है। क्योंकि ये क्रियायें सर्वत्र हो रही हैं। अतः ईश्वर सर्वव्यापक है। ।।२५।।

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