व्या० भा० - यदिदमतीतानागतप्रत्युत्पन्नप्रत्येकसमुच्चयातीन्द्रियग्रहणमल्पं बह्विति सर्वज्ञबीजमेतद्धि वर्धमानं यत्र निरतिशयं स सर्वज्ञः। अस्ति काष्ठाप्राप्तिः सर्वज्ञबीजस्य सातिशयत्वात्परिमाणवदिति। यत्र काष्ठाप्राप्तिर्ज्ञानस्य स सर्वज्ञः। स च पुरुषविशेष इति। सामान्यमात्रोपसंहारे च कृतोपक्षयमनुमानं न विशेषप्रतिपत्तौ समर्थमिति। तस्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्यन्वेष्या। तस्यात्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रहः प्रयोजनम्, ज्ञानधर्मोपदेशेन कल्पप्रलयमहाप्रलयेषु संसारिणः पुरुषानुद्धरिष्यामीति। तथा चोक्तम्-आदिविद्वान्निर्माणचित्तमधिष्ठाय कारुण्याद्भगवान्परमर्षिरासुरये जिज्ञासमानाय तन्त्रं प्रोवाचेति॥२५॥
व्या० भा० अ० - भूत, भविष्य, वर्त्तमान में से किसी एक का वा सभी का अतीन्द्रिय ज्ञान जो किसी में न्यून और किसी में अधिक होता है, वही सर्वज्ञता का बीज है। वही बढ़ता-बढ़ता जिसमें पराकाष्ठा को प्राप्त हो जाता है वह 'सर्वज्ञ' कहा जाता है। सर्वज्ञता का बीज पराकाष्ठा को प्राप्त होता है उसमें न्यूनाधिक्य सम्भव होने के कारण। जिसमें न्यूनाधिक्य की स्थिति सम्भव होती है उसकी पराकाष्ठा भी होती है। जैसे परिमाण।
जिसमें ज्ञान की काष्ठाप्राप्ति है वह सर्वज्ञ है, और वह पुरुषविशेष है। सामान्यज्ञानमात्र प्रस्तुत करके निवृत्त हुआ अनुमानप्रमाण पदार्थ के विशेष धर्म को बताने में समर्थ नहीं होता। इसलिये ईश्वर के संज्ञादि विशेषों का ज्ञान आगमप्रमाण से प्राप्त करना चाहिये। उस (ईश्वर) का अपना कोई स्वार्थ न होने पर भी प्राणियों पर अनुग्रह करना प्रयोजन है। ज्ञान एवं धर्म के उपदेश के द्वारा कल्पप्रलय एवं महाप्रलय में "सांसारिक लोगों का उद्धार करूँ" यह उसका प्रयोजन है। ऐसा कहा गया है आदिविद्वान् भगवान् सर्वज्ञ (ईश्वर) ने जिस ज्ञान से मनुष्यों को विद्वान् बनाया जाता है उस ज्ञान को सुसज्जित करके करुणा से जिज्ञासायुक्त जीवात्मा के लिए वेदज्ञान दिया॥२५॥