Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 23

1/23
Sutra
ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ १.२३ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - किमेतस्मादेवासन्नतमः समाधिर्भवत्यथास्य लाभे भवत्यन्योऽपि कश्चिदुपायो न वेति ? 

अर्थ - क्या इन तीव्रसंवेगादि से ही शीघ्र समाधि होती है अथवा इसकी सिद्धि में कोई अन्य उपाय भी है वा नहीं ?

Word Meaning

ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥२३॥

शब्दार्थ - (ईश्वर-प्रणिधानात्) अतिशय प्रेमपूर्वक ईश्वरोपासना, शरीरादि सभी पदार्थों को ईश्वर का मानकर उसकी आज्ञानुसार उनका प्रयोग करना तथा समस्त कर्मों को ईश्वरसमर्पित करना और उनका कोई लौकिक फल न चाहना 'ईश्वरप्रणिधान' है। इस ईश्वरप्रणिधान से (वा) और भी शीघ्र समाधि प्राप्ति तथा समाधि का फल प्राप्त होता है। (इस सूत्र में 'वा' शब्द समुच्चय अर्थ में हैं विकल्प अर्थ में नहीं।)

सूत्रार्थ - अतिशय प्रेमपूर्वक ईश्वरोपासना, शरीरादि सभी पदार्थों को ईश्वर का मानकर उसकी आज्ञानुसार उनका प्रयोग करना तथा समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना और उनका कोई लौकिक फल न चाहना। इस 'ईश्वरप्रणिधान' से और भी शीघ्र समाधि प्राप्ति तथा समाधि का फल प्राप्त होता है।

Vyas Bhashya

प्रणिधानाद्भिक्तिविशेषादावर्तित ईश्वरस्तमनुगृह्णात्यभिध्यानमात्रेण। तदभिध्यानमात्रादपि योगिन आसन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति॥२३॥

व्या० भा० अ० - 'प्रणिधान' अर्थात् भक्ति विशेष से अनुकूल किया हुआ ईश्वर सङ्कल्पमात्र से उस योगी को अनुगृहीत करता है, योगी को सहायता देता है। उस ईश्वर की सङ्कल्प द्वारा दी हुई सहायता से भी योगी को अतिशीघ्र समाधि की प्राप्ति और समाधि का फल मिलता है।। २३॥

Yog Prakash

ईश्वरप्रणिधान से समाधि और समाधि का फल बहुत शीघ्र प्राप्त होता है, यह बात इस सूत्र में कही गई है। 'ईश्वरप्रणिधान ' क्या है और ईश्वर प्रणिधान की सिद्धि कैसे होती है, इसका परिज्ञान योगाभ्यासी को अवश्य ही कर लेना चाहिये। योगदर्शन में समाधि प्राप्ति के साधनों में अनेक बार ईश्वरप्रणिधान का उल्लेख किया गया है। इसका कारण यह है कि यह योग का विशेष साधन है।
ईश्वरप्रणिधान के सम्पादन के लिये प्रथम शब्दप्रमाण और अनुमानप्रमाण से ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिये क्योंकि इसके बिना ईश्वरप्रणिधान सिद्ध नहीं हो सकता है। उसका स्वरूप ज्ञात होने पर उसके मुख्य नाम को भी जानना चाहिये। ईश्वर वाच्य है और उसका प्रकाश, कथन और वर्णन करने वाला शब्द वाचक है। इस वाच्य = पदार्थ ईश्वर और वाचक नाम 'ओ३म्' का परस्पर वाच्य वाचक सम्बन्ध है, ऐसा समझ लेना चाहिये। उदाहरण जैसे गौ 'प्राणी' वाच्य है और गौ 'शब्द' उसका वाचक है। 
साधक को यह भी जानना चाहिये कि शरीर, इन्द्रियाँ और विविध पदार्थों की रचना ईश्वर ने की है। जीवात्मा और प्रकृति इस सृष्टि की रचना नहीं कर सकते। सृष्टि के सभी पदार्थों का स्वामी भी ईश्वर है। हम इन सब पदार्थों के गौण स्वामी हैं और प्रयोग के अधिकारी हैं। जो चेतन जीवात्माएँ और संसार के जड़ पदार्थ हमारी रक्षा करते हैं, वे ईश्वरप्रदत्त सामर्थ्य से ही करते हैं, केवल अपने सामर्थ्य से नहीं। संसार के पदार्थों में जो सुख है वह क्षणिक है और उसमें दुःख मिश्रित है। शरीरादि पञ्चभौतिक वस्तुएँ तथा पृथिवी आदि लोक-लोकान्तर सब नाशवान् हैं। इस प्रकार ईश्वर, जीव, प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थों के विषय में जानने से संसार के स्थूल एवं सूक्ष्म सभी पदार्थों से वैराग्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में साधक को ईश्वर ही सर्वोपरि दिखता है, वह अपने पास विद्यमान सब सामर्थ्य को ईश्वर प्रदत्त मानता है और उसकी प्राप्ति के लिये लालायित हो जाता है। जैसे कोई छोटा बालक किसी जनसमुदाय में माता से वियुक्त हो जाता है तो माता की प्राप्ति न होने पर सब कुछ को छोड़कर उसकी गवेषणा के लिये लालायित हो जाता है, वैसे ही ईश्वरप्रणिधान में योगी की ऐसी ही अवस्था होती है। यह है ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वर की विशेष भक्ति।।। जब योगाभ्यासी ईश्वर की गवेषणा करता है तो ईश्वर के नाम का अर्थ सहित जप करता है और स्वयं को ईश्वर समर्पित करता है। उसकी पात्रता के आधार पर अर्थात् पात्र सिद्ध हो जाने पर, ईश्वर योगी को विशेष सहायता प्रदान करके अपने स्वरूप का साक्षात्कार करवा देता है। इसी रहस्य को उपनिषत्कार ऋषि ने कहा है कि जिसको यह ईश्वर पात्र समझ कर वरण कर लेता है, वही उसका साक्षात्कार कर सकता है। -

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा वृणुते तनू स्वाम्॥मु० उप० ३ /२/३॥

भावार्थ - अयम् आत्मा = यह आत्मा; प्रवचनेन = प्रवचन वा उपदेश से, न लभ्यः = प्राप्य = नहीं, न मेधया = न मेधाबुद्धि से; न बहुनाश्रुतेन = उपदेश को बहुत मात्रा में सुनने से भी प्राप्य नहीं;

एष आत्मा = यह आत्मा; यम एव वृणुते = जिसको ही वरण करता है, तेन = उसके द्वारा; लभ्यः = प्राप्त करने योग्य है। एष आत्मा = यह आत्मा, तस्य = उसके लिए; स्वां तनूं विवृणुते = अपने स्वरूप को प्रकट करता है॥२३॥

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