इस सूत्र में विदेह और प्रकृतिलय योगियों की 'भवप्रत्यय' नामक असम्प्रज्ञात समाधि का वर्णन है।
भवप्रत्यय - 'भव' का अर्थ है संसार। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, पृथिवी, वृक्ष, पर्वत, प्राणियों के शरीर, इन्द्रिय, उनकी रचना, जन्म, मरण, रोग, वियोग, भोग, सांसारिक सुख की क्षणिकता, उसमें विद्यमान परिणाम, तापादि दुःख, सांसारिक सुखों के लिये अपेक्षित साधनों का उपार्जन, रक्षण, क्षय, सङ्ग, हिंसा दोषो का सूक्ष्मज्ञान, संसार के रचयिता, सबके स्वामी ईश्वर का ज्ञान, हूँ वा इन्द्रियाँ किंवा इनसे पृथक् हूँ, शरीर का विनाश होने पर कुछ शेष रहता है वा नहीं, इस सृष्टि की रचना कभी हुई है वा नहीं, इन लोक - लोकान्तरों का क्या कभी विनाश होगा वा नहीं, यदि विनाश होगा तो क्या इनका अभाव होगा वा ये रूपान्तर को प्राप्त करेंगे ? इस प्रकार विचार करने से उत्पन्न इनके यथार्थज्ञान से विवेक उत्पन्न होता है। विवेक से वैराग्य की उत्पत्ति होती है। अपरवैराग्य एवं अभ्यास से सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति, उससे परवैराग्य, परवैराग्य और ईश्वरप्रणिधान से असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है। संसार के स्वरूप का विशेष मनन करने से विशिष्ट ज्ञान उत्पन्न होता है। इस ज्ञान का नाम भवप्रत्यय है। भवप्रत्यय नामक ज्ञान के इस असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में साधन होने से, इस समाधि का नाम 'भवप्रत्यय' है।
पूर्व जन्मों में किया गया योगाभ्यास, मोक्षशास्त्रों का अध्ययन, अध्यापन, सत्पुरुषों का सङ्ग आदि इस समाधि की प्राप्ति में कारण होते हैं। इसलिये यह जन्म से होने वाली सिद्धि मानी जाती है परन्तु यह सिद्धि बिना पुरुषार्थ के जन्ममात्र से नहीं हो सकती।
'विदेह' का अर्थ ईश्वर को शरीर, इन्द्रियाँ और सृष्टि के अन्य समस्त पदार्थों का कर्त्ता मानकर, इनको नाशवान् समझकर, इनसे अपना स्वामित्व हटाकर देहाभिमान से रहित होना और ईश्वर को सबका स्वामी मानकर उसकी उपासना करना है। इस स्थिति को प्राप्त योगी 'विदेहयोगी' कहलाते हैं। विदेह का अर्थ - शरीरपात के पश्चात् शरीर रहित होकर इन्द्रियों को आत्मा मानने वाले योगी का दशमन्वन्तर, भूतों को आत्मा मानने वाले का सौ मन्वन्तर पर्यन्त समाधि में रहना, नहीं है। क्योंकि बिना शरीर के कभी भी समाधि नहीं हो सकती।
प्रकृतिलय – तन्मात्रा, अहङ्कार, महत्तत्त्व और मूलप्रकृति के स्वरूप को तल्लीनता से जानना, इन तत्त्वों के गुणों एवं दोषों को जानना, इनको उपास्य न समझकर ईश्वर को उपास्य मानकर उसकी उपासना करना प्रकृतिलय है। इस स्थिति को प्राप्त साधक प्रकृतिलय योगी कहलाते है।
'प्रकृतिलय' का अर्थ = तन्मात्रा, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति, इन चारों को चेतन आत्मा मानकर इनकी उपासना करना नहीं है। इसी प्रकार से प्रकृतिलय योगी का अर्थ भी यह नहीं है कि देहपात के पश्चात्
(१) जो सहस्र मन्वन्तर तक अहंकार की उपासना करते हों
(२) जो दशसहस्र मन्वन्तर तक बुद्धि की उपासना करते हों
(३) जो शतसहस्र मन्वन्तर तक अन्य (प्रकृति) की उपासना करते हों
(४) अथवा इन में से किसी एक में लीन रहकर फिर जन्म लेते हों। क्योंकि ये तन्मात्रा आदि चारों तत्त्व जड़ पदार्थ हैं। इनको चेतन मानना मिथ्याज्ञान है। मिथ्याज्ञान योग का विरोधी है। यह 'विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ' सूत्र के द्वारा बताया गया है। मिथ्याज्ञान विपर्यय नामक वृत्ति है। योग की सिद्धि के लिये विपर्ययवृत्ति का अवरोध करना आवश्यक है। इसके अवरोध के बिना सम्प्रज्ञात तथा असम्प्रज्ञात योग सिद्ध नहीं हो सकता। अपरवैराग्य से सम्प्रज्ञात समाधि होती है। इसी समाधि की धर्ममेघ नामक अवस्था में जीवात्मा के स्वरूप का परिज्ञान होता है। उस ज्ञान से जड़ और चेतन तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान होता है। उससे परवैराग्य उत्पन्न होता है। उससे असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होती है। यदि विदेह एवं प्रकृतिलय योगी तन्मात्रादि जड़ पदार्थों को चेतन आत्मा मानकर उनकी उपासना करते हैं, तो उनको असम्प्रज्ञात समाधि प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिये यह मन्तव्य ठीक नहीं है।
‘भवप्रत्यय’ नामक असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त योगी कैवल्य जैसा अनुभव करते हैं। इसकी स्थिति ऐसी है कि इसी शरीर में रहते हुये जब तक समाधि भङ्ग नहीं होती तब तक कैवल्य जैसा अनुभव करते हैं, समाधि भङ्ग होने पर नहीं।
इन्द्रियों एवं भूतों को चेतन आत्मा मानने वाले विदेह योगी और तन्मात्रा, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति को चेतन आत्मा मानने वाले प्रकृतिलय योगी कैवल्य जैसा अनुभव करते हैं, ऐसा मानना भी ठीक नहीं है। क्योंकि प्रकृति और उससे उत्पन्न पदार्थों में जो सुख है वह क्षणिक और दुःखमिश्रित है, कैवल्य जैसा नहीं।
'स्थूलभूत, इन्द्रियाँ, तन्मात्रा, अहंकार, महत्तत्व, मूलप्रकृति इनको चेतन आत्मा मानकर उपासना करने वाले भवप्रत्यय नामक योगी समाधि अवस्था में कैवल्य जैसा सुख अनुभव करते हैं', यह बात वेदविरुद्ध होने से मान्य नहीं है। वेद में लिखा है कि
अन्धन्तमः प्रविशन्ति सम्भूतिमुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः॥यजु० ४०/९॥
भावार्थ - जो लोग सकल जड़जगत् के अनादि नित्य कारण प्रकृति को उपास्य समझते हैं वे अविद्या को प्राप्त करके सदा दुःखी रहते हैं और जो उस कारण प्रकृति से उत्पन्न हुये पृथिवी आदि स्थूल, कार्य कारण रूप सूक्ष्म, अनित्य संयोग से उत्पन्न कार्य जगत् को अपना इष्ट उपास्य देव मानते हैं, वे गाढ़ अविद्या को प्राप्त करके उससे अधिक दु:खी रहते हैं। इसलिये सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा की ही सदा उपासना सब करें॥१९॥