Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 17

1/17
Sutra
वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्संप्रज्ञातः ॥ १.१७ ॥

Bhashya

1 Available
Inception

अव० - अथोपायद्वयेन निरुद्धचित्तवृत्तेः कथमुच्यते सम्प्रज्ञातः समाधिरिति

अर्थ - अब दोनों उपाय (अभ्यास, वैराग्य) द्वारा निरुद्ध चित्तवृत्ति वाले साधक की 'सम्प्रज्ञात समाधि' किस प्रकार की होती है। यह निम्न सूत्र से कहा जाता है -

Word Meaning

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञातः॥१७॥

शब्दार्थ - (वितर्क-विचार-आनन्द-अस्मिता-रूपानुगमात्) वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता-रूप स्थितियों के अनुभव से (सम्प्रज्ञातः) सम्प्रज्ञात समाधि होती है। 

सूत्रार्थ-वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता रूप स्थितियों के अनुभव से 'सम्प्रज्ञात समाधि' होती है। 

Vyas Bhashya

वितर्कश्चित्तस्यालम्बने स्थूल आभोगः। सूक्ष्मो विचारः। आनन्दो ह्लादः। एकात्मिका संविदस्मिता। तत्र प्रथमश्चतुष्टयानुगतः समाधिः सवितर्कः। द्वितीयो वितर्कविकलः सविचारः। तृतीयो विचारविकलः सानन्दः। चतुर्थस्तद्विकलोऽस्मितामात्र इति। सर्व एते सालम्बनाः समाधयः॥१७॥

व्या० भा० अ० - 'वितर्क' का अर्थ चित्त के आलम्बन में स्थूलभूत पृथिवी आदि का साक्षात्कार है। 'विचार' का अर्थ चित्त के आलम्बन में सूक्ष्मभूत अर्थात् तन्मात्राओं का साक्षात्कार है। 'आनन्द' का अर्थ ह्लाद = सुख की अनुभूति अर्थात् इन्द्रियों के साक्षात्कार से सुख की अनुभूति। 'अस्मिता' का अर्थ है (चित्त के आलम्बन में) जीवात्मा का साक्षात्कार। 

प्रथम अर्थात् वितर्कानुगत समाधि में (स्थूलभूत, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ और जीवात्मा) ये चारों विषय (योगी के जिज्ञास्य) रहते हैं। (किन्तु स्थूल भूतों का ही साक्षात्कार होता है। शेष का सामान्य ज्ञान रहता है।) इसको चतुष्टयानुगत कहा जाता है।

द्वितीय, वितर्क से रहित विचार समाधि है। (इसमें तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ और जीवात्मा जिज्ञास्य रहते हैं। किन्तु केवल तन्मात्राओं का साक्षात्कार होता है। शेष दो का सामान्य ज्ञान रहता है।) तृतीय, विचार से रहित आनन्द समाधि है। (इसमें इन्द्रियाँ और जीवात्मा जिज्ञास्य रहते हैं। किन्तु इन्द्रियों का ही साक्षात्कार होता है। जीवात्मा का सामान्य ज्ञान रहता है।)

चतुर्थ, आनन्द से रहित अस्मिता समाधि है। (इसमें जीवात्मा ही जिज्ञास्य रहता है। और जीवात्मा का साक्षात्कार भी होता है। भूतादि अन्य कोई पदार्थ जिज्ञास्य नहीं रहता) ये सब आलम्बन सहित समाधियाँ हैं॥१७॥

Yog Prakash

इस सूत्र में सम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप बतलाया गया है। सम्प्रज्ञात समाधि चार प्रकार की है। वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत। 

विषय की दृष्टि से सम्प्रज्ञात समाधि तीन प्रकार की है - ग्रहीतृ, ग्रहण और ग्राह्य। ग्राह्य विषय दो प्रकार का है, एक स्थूलभूत और दूसरा सूक्ष्मभूत (तन्मात्रा)। ग्रहण से इन्द्रियाँ ली जाती हैं और ग्रहीतृ से जीवात्मा का ग्रहण होता है। योगाभ्यासी प्रथम स्थूल पदार्थों में चित्त को एकाग्र करने का प्रयास करता है। स्थूल पदार्थों में चित्त की एकाग्रता सिद्ध होने पर सूक्ष्म विषयों में भी चित्त को अधिकारपूर्वक दीर्घकाल पर्यन्त रोक लेता है।

वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि के आलम्बन स्थूल विषय होते हैं। जैसे कि पृथिवी आदि पाँच भूत और उन से बने हुए शरीर, वृक्षादि। इस समाधि का अभ्यास शरीर के अङ्गों और वृक्षादि पदार्थों को लेकर भी किया जा सकता है। इसको समझाने के लिए योगदर्शन १ / ४२ के व्यास भाष्य में गौ का उदाहरण दिया है। 'गौ: ' यह शब्द है, 'गौ:' यह अर्थ (पशु) है, 'गौ:' यह ज्ञान है। गौ में योगी समाधि लगाता है उस (समाधि) में जब शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों संयुक्त रहते हैं, तब वह वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस स्थिति में जीवात्मा 'प्रमाता' के रूप में, बाह्य इन्द्रियाँ 'प्रमाण' के रूप में और गौ 'प्रमेय' के रूप में उपस्थित रहता है। इसी प्रकार स्थूल भूत और उनसे उत्पन्न अन्य पदार्थों में भी अभ्यास किया जा सकता है। परन्तु पृथिवी आदि भूतों को और उनसे उत्पन्न पदार्थों को ईश्वर मानकर ध्यान नहीं करना चाहिये। यदि तन्मात्राओं में अर्थात् गन्धतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा और शब्दतन्मात्रा, जो पृथिवी आदि पाँच भूतों के उपादानकारण हैं, उनमें चित्त को एकाग्र कर, उनके स्वरूप का साक्षात्कार किया जाता है। तो वह विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है। इस अवस्था में जीवात्मा 'प्रमाता', चित्त 'प्रमाण' और तन्मात्रा 'प्रमेय' के रूप में रहते हैं। I

जब महत्तत्व, अहंकार, मन और इन्द्रियों में चित्त की एकाग्रता की जाती है तब वह आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि होती है। इन की उत्पत्ति में सत्त्वगुण प्रधान होने से इनके स्वरूप के अनुभव काल में सुख की अनुभूति होती है। यहाँ पर भी जीवात्मा प्रमाता, चित्त 'प्रमाण' और इन्द्रियाँ आदि ‘प्रमेय' के रूप में हैं। जब जीवात्मा समस्त जड़ पदार्थों को और अपने स्वरूप को पृथक्-पृथक् जान कर अपने स्वरूप में चित्त को एकाग्र करता है तब वह अस्मितानुगत समाधि है। यद्यपि इस अवस्था में अहंकार, इन्द्रियां आदि सभी उपकरण जीवात्मा के साथ विद्यमान रहते हैं तथापि वह बुद्धि तथा ईश्वर की सहायता से अपने स्वरूप को जानता है।

कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि इस स्थिति में जीवात्मा बुद्धि, अहङ्कार और अपने स्वरूप को एक मानता है। किन्तु यह ठीक नहीं है। क्योंकि जीवात्मा धर्ममेघ समाधि (= अस्मिता समाधि) में बुद्धि आदि पदार्थों से अपने स्वरूप को पृथक् जानता है यह बात योगसूत्र १/२ के व्यासभाष्य में कही जा चुकी है।अतः उन्हें एक मानना उचित नही है॥१७॥

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