इस सूत्र में अभ्यास करने की रीति बतलाई है।
जीवात्मा मुक्तिसुख को भोगकर संसार में पुनर्जन्म लेता है। जीवात्मा इस सृष्टि के आदि से अनेक योनियों में आता-जाता रहता है। भिन्न-भिन्न योनियों में विभिन्न भोगों को भोगता रहता है, उन भोगों के भोगने से उसके चित्त में अनेक प्रकार के संस्कार उत्पन्न होते रहते हैं। इस वर्तमान जन्म में भी अनेक भोग भोगे हैं। वर्तमान जन्म के इन भोगों से भी संस्कार उत्पन्न हुए हैं। भोगों में सुख समझकर बहुत काल तक भोगने से संस्कार अत्यन्त प्रबल हो गए हैं इन संस्कारों को रोकने, निर्बल बनाने तथा दग्धबीजभाव की अवस्था में पहुँचाने के लिए दीर्घकालपर्यन्त अभ्यास करना आवश्यक है। दीर्घकाल का अभिप्राय ऐसे समझना चाहिए कि जिस व्यक्ति के पूर्वजन्म में किये योगाभ्यास के संस्कार प्रबल हैं उसके लिए दीर्घकाल की सीमा न्यून होगी और जिस साधक के पूर्वजन्म में किये भोगों के संस्कार प्रबल हैं, उसके लिए दीर्घकाल की सीमा अधिक होगी। दीर्घकाल के नाम से साधक को निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि परिश्रम करने से ही मनुष्य का लक्ष्य सिद्ध होता है, बिना परिश्रम के नहीं। उसको यह भी जानना चाहिए कि दुःखों से छूटकर नित्य सुख की प्राप्ति का यह एक ही मार्ग है, इससे भिन्न और कोई मार्ग नहीं है।
अभ्यास को सतत करना चाहिये। कभी करना और कभी छोड़ देना ठीक नहीं। क्योंकि मध्य-मध्य में छोड़ देने से भोगों के संस्कार पुनः प्रबल हो जाते हैं। उन संस्कारों के तीव्र होने से साधक पुनः भोगमार्ग पर प्रवृत्त हो जाता है। भोगों के भोगते रहने से पूर्व के संस्कार दृढ़ होते हैं। अभ्यास की सफलता के लिए योगाभ्यासी को खान-पान और सम्मान आदि में रुचि नहीं लेनी चाहिए। योगमार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को तीन एषणायें छोड़ देनी चाहियें। अन्यथा अभ्यास में सफलता नहीं मिलेगी। निरन्तर अभ्यास करने से साधक को योगाभ्यास से मिलने वाली शान्ति का अनुभव होता है। उससे योगाभ्यास में श्रद्धा उत्पन्न होती है।
अभ्यास को सत्कारपूर्वक अर्थात् आदरपूर्वक करना चाहिए, निरादरपूर्वक नहीं। सत्कार का अर्थ तप, ब्रह्मचर्य, विद्या और श्रद्धापूर्वक किया हुआ अभ्यास है। इस प्रकार सम्पादित अभ्यास दृढ़ अवस्था वाला होता है। सांसारिक भोगों के संस्कार उस अभ्यास को शीघ्र विचलित नहीं कर सकते। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि विद्यापूर्वक अभ्यास क्या है, जिसको योगाभ्यासी प्राप्त करना चाहता है। ईश्वर का स्वरूप क्या है ? उसकी प्राप्ति के साधन क्या हैं ? उन साधनों का प्रयोग किस प्रकार से करना चाहिये ? इस मार्ग में क्या-क्या बाधाएँ आ सकती हैं ? इसमें कोई ऐसा आचरण तो नहीं है जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध हो। इन सब बातों को जानकर किया हुआ अभ्यास विद्यापूर्वक अभ्यास है। ऐसा अभ्यास सफल होता है। बिना ज्ञान के जो अभ्यास किया जाता है, उससे व्यक्ति अपने लक्ष्य पर नहीं पहुँचता।
अभ्यास करते समय सुख-दुःख, मान-अपमान, शीत-उष्णता, हानि-लाभ आदि द्वन्द्व योग मार्ग में आते हैं। उन सब को श्रद्धापूर्वक सहन करते हुए धर्माचरण का अनुष्ठान और अधर्माचरण का परित्याग करना आवश्यक है। यदि व्यक्ति तपस्या नहीं करता अथवा दुःखी होकर करता है तो उत्तमाभ्यास की सिद्धि नहीं होती। योगाभ्यासी को इन्द्रियों के विषयभोग छोड़ देने चाहियें और ब्रह्मचर्य का पालन मन, वचन, कर्म से करना चाहिये। इन्द्रियों के भोगों में आसक्त होने पर अभ्यास दृढ़ नहीं हो सकता। क्योंकि भोगों के भोगने से नवीन वासनाएं उत्पन्न होती हैं जो अभ्यास में बाधा डालती हैं।
साधक को अपना मुख्य कर्तव्य समझकर अभ्यास करना चाहिये, लोकैषणा - पूर्ति के लिए नहीं। लोकैषणा के लिए किया गया अभ्यास भोगों की ओर ले जाता है, योग की ओर नहीं। शुद्ध निष्काम कर्म योग में बहुत सहायक है। 'निष्काम कर्म' का अभिप्राय यह है कि शुभ कर्मों को ईश्वरप्राप्ति के लिए करना, सांसारिक फल प्राप्ति हेतु नहीं। इस प्रकार उचित रूप से अभ्यास करने पर विषयभोग की वासना समाप्त हो जाती है और समाधि की सिद्धि में कठिनाई नहीं होती॥१४॥