इस सूत्र में पाँच वृत्तियों को रोकने के अभ्यास और वैराग्य ये दो साधन बतलाये हैं। उनकी प्राप्ति के साधन क्या हैं और वृत्तियों के निरोध के लिए उनका प्रयोग कैसे किया जाय, यह परिज्ञान योगाभ्यासी को अवश्य कर लेना चाहिए। प्रयोग करते समय क्या- क्या बाधक उपस्थित होते हैं (यो. १।३०, ३१) उनको भी जानना चाहिए।
प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सत्यासत्य को जानकर उनमें से असत्य को छोड़ देना और सत्य को ग्रहण कर लेना वैराग्य है। वैराग्य की उत्पत्ति का साधन विवेक है। बिना विवेक के वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। इसलिए वैराग्य के इच्छुक साधक को प्रथम विवेक प्राप्त करना चाहिए।
जिसके द्वारा सत्यासत्य, जड़-चेतन, धर्माधर्म और शुभाशुभ का परिज्ञान होता है उसका नाम विवेक है। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि जिसके द्वारा कार्यजगत्, प्रकृति, जीवात्मा और ईश्वर का स्वरूप ठीक-ठीक जाना जाता है तथा इनसे उचित उपयोग लिया जाता है, वह विवेक है।
विवेक की प्राप्ति के अनेक साधनों में से कुछ साधन नीचे लिखे जाते हैं।
१. वेद और वेदानुकूल ऋषिकृत ग्रन्थों का अर्थ सहित पढ़ना-पढ़ाना तथा तदनुकूल आचरण करना।
२. सत्यवादी, सत्यमानी, सत्यकारी, योगाभ्यासी, वैदिक विद्वानों का सङ्ग करना।
३. यह शरीर क्या है ? इन्द्रियाँ क्या हैं ? यह सृष्टि क्या है ? सृष्टि किसी ने बनाई है अथवा स्वयं बन गई है ? किंवा अनादि है ? यह जन्म क्या है ? मरने के पश्चात् आत्मा शेष रहता है ? वा शरीर के साथ नष्ट हो जाता है ? यदि रहता है तो वह कहाँ रहता है ? शरीर, इन्द्रियाँ, धन, सम्पत्ति आदि पदार्थों का स्वामी जीवात्मा है ? वा अन्य कोई ? इत्यादि विषयों पर सूक्ष्मता से विचार करना।
४. सांसारिक सुखों को क्षणिक एवं दुःखमिश्रित देखना इत्यादि साधनों से विवेक उत्पन्न होता है।
विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है। यह वृत्तिनिरोध का प्रमुख साधन है। वैराग्य के द्वारा दोषों को छोड़ देते हैं तथापि जन्मजन्मान्तर के विषयभोगों के संस्कार वैराग्य की स्थिति को उखाड़ते हैं। उन संस्कारों को निर्बल बनाना तथा नितान्त रोक देना तथा नष्ट कर देना आवश्यक है। यह अभ्यास के द्वारा ही संभव होता है।
वृत्तियों को रोकने और चित्त की एकाग्रता को सिद्ध करने के लिए मन, वाणी, शरीर से जो प्रयत्न किया जाता है उसको अभ्यास कहते हैं। यह अभ्यास व्यवहारकाल में और उपासनाकाल में समान रूप से आवश्यक है। व्यक्ति यदि व्यवहार में अभ्यास नहीं करता तो उपासनाकाल में उसको सफलता नहीं मिलती। विवेक एवं वैराग्य को यथावत् जानकर जो अभ्यास किया जाता है वह समाधि की प्राप्ति में साधक बनता है। परन्तु इसको यथावत् न जानकर किया जाने वाला अभ्यास समाधि का कारण नहीं बनता।
यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य है कि चित्तवृत्तियों का निरोध करने में विवेक, वैराग्य और अभ्यास ये तीनों साधन हैं। 'तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्' सूत्र में योगदर्शनकार ने यह बतलाया है कि पुरुष का वास्तविक स्वरूप जानने से गुणमात्र से वैराग्य हो जाता है। इससे यह बात सिद्ध है कि विवेक से ही वैराग्य उत्पन्न होता है अन्यथा नहीं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विवेक वैराग्य और अभ्यास इन तीनों के द्वारा वृत्तिनिरोध होता है, इनके बिना नहीं॥१२॥