किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरति आहोस्विद्विषयस्येति ? ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनिर्भासस्तज्जातीयकं संस्कारमारभते। स संस्कारः स्वव्यञ्जकाञ्जनस्तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिकां स्मृतिं जनयति।
तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः। ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। सा च द्वयी भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च। स्वप्ने भावितस्मर्तव्या। जाग्रत्समये त्वभावितस्मर्तव्येति। सर्वाश्चैता: स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतिनामनुभवात्प्रभवन्ति। सर्वाश्चैता वृत्तयः सुखदुःखमोहात्मिकाः। सुखदुःखमोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः। सुखानुशयी रागः, दुःखानुशयी द्वेषः, मोहः पुनरविद्येति। एताः सर्वा वृत्तयो निरोद्धव्याः। आसां निरोधे संप्रज्ञातो वा समाधिर्भवत्यसंप्रज्ञातो वेति॥११॥
व्या० भा० अ० - चित्त क्या ज्ञान का स्मरण करता है अथवा वस्तु का ? वस्तु के स्वरूप से रंगा हुआ ज्ञान, वस्तु और ज्ञान दोनों के स्वरूप को प्रकट करने वाला, उसी प्रकार के संस्कार को उत्पन्न करता है। वह संस्कार, अपने उद्बोधक से उबुद्ध होकर उसी स्वरूपवाली = वस्तु एवं ज्ञान - इन दोनों के स्वरूपवाली स्मृति को उत्पन्न करता है।
इस प्रसंग में, अनुभव - ज्ञान प्रधान होता है। (और) स्मृति वस्तु प्रधान होती है। वह (स्मृति) दो प्रकार की होती है। कल्पित विषय को लेकर होनेवाली और यथार्थ विषय को लेकर होनेवाली। स्वप्न में होनेवाली स्मृतियाँ कल्पित विषय को लेकर और जाग्रत् में होनेवाली स्मृतियाँ वास्तविक विषय को लेकर होती हैं। ये सारी स्मृतियाँ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृतियों के अनुभव से उत्पन्न होती है। ये सभी वृत्तियाँ सुख, दुःख और मोह स्वरूप वाली होती हैं। सुख दुःख और मोह की व्याख्या क्लेशों के प्रसंग (योगदर्शन २/३ ) में करने योग्य है (की जायेगी)। सुख भोग के पश्चात् रहनेवाला (क्लेश) राग है। दुःख भोग के पश्चात् रहनेवाला (क्लेश) द्वेष है। और मोह तो अविद्या (ही) है। ये सब वृत्तियाँ रोकने योग्य होती हैं। इन (सब) वृत्तियों के रुक जाने पर सम्प्रज्ञात अथवा असम्प्रज्ञात समाधि होती है॥११॥