Yogdarshanam Paad 1 / Sutra 11

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Sutra
अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥ १.११ ॥

Bhashya

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Word Meaning

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः॥११॥

शब्दार्थ - (अनुभूत-विषय-असम्प्रमोषः) अनुभव किये विषयों का पुनः स्मरण होना (स्मृतिः) स्मृति वृत्ति है।

सूत्रार्थ - आत्मा द्वारा अनुभव किये विषयों को पुनः स्मरण कर लेना 'स्मृतिवृत्ति' कहलाती है।

Vyas Bhashya

किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरति आहोस्विद्विषयस्येति ? ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनिर्भासस्तज्जातीयकं संस्कारमारभते। स संस्कारः स्वव्यञ्जकाञ्जनस्तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिकां स्मृतिं जनयति।

तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः। ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। सा च द्वयी भावितस्मर्तव्या चाभावितस्मर्तव्या च। स्वप्ने भावितस्मर्तव्या। जाग्रत्समये त्वभावितस्मर्तव्येति। सर्वाश्चैता: स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतिनामनुभवात्प्रभवन्ति। सर्वाश्चैता वृत्तयः सुखदुःखमोहात्मिकाः। सुखदुःखमोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः। सुखानुशयी रागः, दुःखानुशयी द्वेषः, मोहः पुनरविद्येति। एताः सर्वा वृत्तयो निरोद्धव्याः। आसां निरोधे संप्रज्ञातो वा समाधिर्भवत्यसंप्रज्ञातो वेति॥११॥

व्या० भा० अ० - चित्त क्या ज्ञान का स्मरण करता है अथवा वस्तु का ? वस्तु के स्वरूप से रंगा हुआ ज्ञान, वस्तु और ज्ञान दोनों के स्वरूप को प्रकट करने वाला, उसी प्रकार के संस्कार को उत्पन्न करता है। वह संस्कार, अपने उद्बोधक से उबुद्ध होकर उसी स्वरूपवाली = वस्तु एवं ज्ञान - इन दोनों के स्वरूपवाली स्मृति को उत्पन्न करता है। 

इस प्रसंग में, अनुभव - ज्ञान प्रधान होता है। (और) स्मृति वस्तु प्रधान होती है। वह (स्मृति) दो प्रकार की होती है। कल्पित विषय को लेकर होनेवाली और यथार्थ विषय को लेकर होनेवाली। स्वप्न में होनेवाली स्मृतियाँ कल्पित विषय को लेकर और जाग्रत् में होनेवाली स्मृतियाँ वास्तविक विषय को लेकर होती हैं। ये सारी स्मृतियाँ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृतियों के अनुभव से उत्पन्न होती है। ये सभी वृत्तियाँ सुख, दुःख और मोह स्वरूप वाली होती हैं। सुख दुःख और मोह की व्याख्या क्लेशों के प्रसंग (योगदर्शन २/३ ) में करने योग्य है (की जायेगी)। सुख भोग के पश्चात् रहनेवाला (क्लेश) राग है। दुःख भोग के पश्चात् रहनेवाला (क्लेश) द्वेष है। और मोह तो अविद्या (ही) है। ये सब वृत्तियाँ रोकने योग्य होती हैं। इन (सब) वृत्तियों के रुक जाने पर सम्प्रज्ञात अथवा असम्प्रज्ञात समाधि होती है॥११॥

Yog Prakash

इस सूत्र में स्मृतिवृत्ति का वर्णन है।

प्रत्येक योगाभ्यासी को स्मृतिवृत्ति का स्वरूप, उसके उत्पादक कारण और उससे उत्पन्न होने वाले परिणामों को अच्छे प्रकार से जान लेना चाहिये। इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए कि चित्त जड़ पदार्थ होने से किसी विषय का स्मरण नहीं कर सकता। किन्तु जीवात्मा चित्त के द्वारा विषय का स्मरण करता है। जब व्यक्ति किसी विषय का अनुभव करता है तो उस समय संस्कार उत्पन्न होता है। वह चित्त और आत्मा में विद्यमान रहता है। उस संस्कार के अनुकूल उसको उद्बुद्ध करने वाले कारण उपस्थित होते ही वह संस्कार उस अनुभव के अनुरूप स्मृति को उत्पन्न करता है। यह वास्तविक स्मृति है। स्वप्न अवस्था में अवास्तविक अर्थात् अस्त-व्यस्त स्मृतियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे कि मनुष्य के शिर पर सीङ्गों का दिखाई देना। सभी स्मृतियाँ पाँच वृत्तियों के अनुभव से उत्पन्न होती हैं।

जो स्मृतियाँ विवेक, वैराग्य और समाधि की ओर ले जाने वाली हैं, व्यवहारकाल में उनका अवरोध नहीं करना चाहिए। परन्तु कभी-कभी उपासनाकाल में इस प्रकार की स्मृतियाँ आती हैं अर्थात् लाई जाती हैं। आवश्यकतानुसार उन से सहयोग लिया जा सकता है। उदाहरण - किसी योग प्रशिक्षक के द्वारा किसी साधक ने यह बात सुनी कि उपासना के समय ओम् का जप अर्थसहित करना चाहिए। इससे चित्त एकाग्र होता है। उस साधक को यह बात उपासनाकाल में स्मरण हो आई अर्थात् साधक ने स्मरण किया। इस सुनी हुई बात की स्मृति के अनुसार उस साधक ने ओम् का जप अर्थ सहित आरम्भ किया। उसे इस स्मृत वाक्य के अनुसार चित्त की एकाग्रता में सहायता मिली। यह स्मृति योग में बाधक नही अपितु सहायक है। इसी प्रकार अनेक स्मृतियाँ योगमार्ग की ओर ले जाने वाली होती हैं।

स्मृतियाँ चाहे अच्छी हों वा बुरी उनका जगाना जीवात्मा के आधीन है। जो साधक यह समझता है कि स्मृतियाँ अपने आप उठ जाती हैं अथवा उनको मन उठा लेता है, वह इन वृत्तियों को रोकने में सफल नहीं होता। स्मृतिवृत्ति को रोकने में अधिक समय लगाना और विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। ज्ञान-वैराग्य पूर्वक प्रयास से सफलता मिलती है, इसमें कोई संशय नहीं है। अतः साधक को निराशावादी बनकर योगमार्ग को नहीं छोड़ना चाहिए। अपितु आशावादी बनकर योगमार्ग में चलते रहना चाहिए॥११॥

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