इस सूत्र में निद्रा वृत्ति का स्वरूप बतलाया गया है।
जिसमें व्यक्ति बिना किसी बाधा के ज्ञानपूर्वक विविध कार्यों का सम्पादन करता है वह जाग्रतावस्था है। जिसमें कुछ-कुछ जागता है और कुछ-कुछ सोता है, जाग्रतावस्था में किए व्यवहारों से बने संस्कारों के आधार पर तथा वात-पित्त-कफ के प्रबल होने के कारण विविध दृश्यों को देखता है वह स्वप्नावस्था है। जिसमें जाग्रत और स्वप्नावस्था का व्यापार बन्द हो जाता है वह 'निद्रावस्था' है। उसका मुख्य कारण तमोगुण है। निद्रा के समय जब रजोगुण दबा रहता है और सत्त्वगुण का कुछ उभार होता है तब जागने पर व्यक्ति कहता है कि मैं सुखपूर्वक सोया। जब गाढ़-निद्रा में रजोगुण का उभार होता है और सत्त्वगुण दबा रहता है तब जागने पर कहता है कि मैं दु:खपूर्वक सोया। जब सत्त्व एवं रजोगुण दोनों ही दबे रहते हैं और तमोगुण ही प्रधान रहता है तब जागने पर व्यक्ति कहता हैं कि मैं मूढ़तापूर्वक सोया। इससे यह सिद्ध होता है कि सुषुप्तावस्था में भी जीवात्मा अनेक प्रकार के अनुभव करता है। यदि निद्रावस्था में अनुभूतियाँ न होती तो जागने पर ये विविध प्रकार की स्मृतियाँ भी न होती।
जिस शरीर के द्वारा धर्मार्थकाममोक्ष की सिद्धि होती है उसको स्वस्थ रखना आवश्यक है। आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य ये शरीर को स्वस्थ बनाने के साधन हैं। अतः निद्रा शरीर को स्वस्थ रखने का एक आवश्यक साधन है। जिस प्रकार भोजन के बिना शरीर स्वस्थ, बलवान नहीं रह सकता इसी प्रकार निद्रा के बिना भी स्वस्थ, बलवान् नहीं रह सकता। इसलिए व्यवहार काल में उचित निद्रा लेना योग का साधक है, बाधक नहीं। किन्तु साधना के समय निद्रा को रोकना ही चाहिए। कुछ लोगों का यह विचार है कि जब तक साधक चौबीस घण्टे की नींद को न जीत ले तब तक समाधि सिद्ध नहीं होती। यह मान्यता योग में बाधक है, साधक नहीं।
साधना करते समय निद्रा बाधक होती है। उसका अवरोध करना अनिवार्य है। क्योंकि निद्रा की विद्यमानता में वृत्ति निरोध नहीं हो सकता। जब तक निद्रा के कारणों का परिज्ञान न हो और उनको दूर करने का प्रयत्न न किया जाय तब तक वह दूर नहीं हो सकती। अतः साधना के समय आने वाली निद्रा के कुछ कारणों का यहाँ पर उल्लेख किया जाता है। -
(१) रात्रि में निद्रा की पूर्ति न होना।
(२) पेट की शुद्धि न होना।
(३) शारीरिक परिश्रम अथवा व्यायाम अपने सामर्थ्य से अधिक करना वा व्यायाम को छोड़ देना।
(४) भोजन का प्रतिकूल होना, गरिष्ठ होना वा मात्रा में अधिक होना।
(५) मादक द्रव्यों का सेवन करना।
(६) शरीर में ज्वर आदि रोगों का होना।
(७) शरीर में निर्बलता का होना।
(८) आसन को ठीक प्रकार से न लगाना।
(९) उपासना से पूर्व शौच - स्नान न करना।
(१०) शीतकाल में वस्त्रों को आवश्यकता से अधिक धारण करना।
(११) अध्ययन आदि में मानसिक परिश्रम अधिक करना।
(१२) सन्ध्या वा जप वाक्यों के अर्थों को न जानना अथवा उन पर चिन्तन न करना।
(१३) प्राणायाम को उचित मात्रा में न करना।
(१४) ईश्वर के विषय में पर्याप्त ज्ञान, श्रद्धा, रुचि का न होना।
(१५) योगाभ्यास के लाभ को और उसके न करने से होने वाली हानियों को न समझना।
(१६) आलसी व्यक्तियों का सङ्ग करना, इत्यादि॥१०॥