Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 8/2/5

10 Sukta
28 Mantra
8/2/5
Devata- आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यं जी॑वतु॒ मा मृ॑ते॒मं समी॑रयामसि। कृ॒णोम्य॑स्मै भेष॒जं मृत्यो॒ मा पुरु॑षं वधीः ॥

अ॒यम् । जी॒व॒तु॒ । मा । मृ॒त॒ । इ॒मम् । सम् । ई॒र॒या॒म॒सि॒ । कृ॒णोमि॑ । अ॒स्मै॒ । भे॒ष॒जम्‌ । मृत्यो॒ इति॑ । मा । पुरु॑षम् । व॒धी॒: ॥२.५॥

Mantra without Swara
अयं जीवतु मा मृतेमं समीरयामसि। कृणोम्यस्मै भेषजं मृत्यो मा पुरुषं वधीः ॥

अयम् । जीवतु । मा । मृत । इमम् । सम् । ईरयामसि । कृणोमि । अस्मै । भेषजम्‌ । मृत्यो इति । मा । पुरुषम् । वधी: ॥२.५॥

Meaning
(अयं जीवतु) = यह रुग्ण पुरुष जीये, (मा मृत) = मरे नहीं। हम (इमं समीरयामसि) = इसे प्राणशक्ति से प्रेरित करते हैं। प्राणशक्ति-सम्पन्न होकर यह सब चेष्टाएँ ठीक प्रकार से करे, ऐसी व्यवस्था करते हैं। (अस्मै भेषजं कृणोमि) = इसके लिए औषध करता हूँ। हे (मृत्यो) = मृत्यु! तू (पुरुषं मा वधी:) = इस पुरुष को मत मार । 'वस्तुत:' रोग को आरम्भ में ही औषधोपचार से दूर कर दिया जाए' तभी ठीक है।
Essence
रोग को आरम्भ में ही औषधोपचार से ठीक कर दिया जाए तो उत्तम है, जिससे रोगवृद्धि होकर मृत्यु का भय न रहे।
Subject
रोग का प्रारम्भ में ही प्रतीकार

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.